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Q. संसद में महिला आरक्षण को परिसीमन प्रक्रिया से जोड़ना एक संवैधानिक आवश्यकता और राजनीतिक उपकरण, दोनों के रूप में देखा जा रहा है। 106वें संविधान संशोधन अधिनियम के आलोक में इस कथन का समालोचनात्मक विश्लेषण कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)

April 16, 2026

GS Paper IIIndian Polity

प्रश्न की मुख्य माँग

  • संवैधानिक आवश्यकता को समझाइए।
  • बताइए कि क्या महिला आरक्षण राजनीतिक रणनीति का उपकरण है।
  • आगे की राह सुझाइए।

उत्तर

106वाँ संविधान संशोधन अधिनियम विधायिकाओं में महिलाओं के लिए आरक्षण को परिसीमन से जोड़ता है। यद्यपि इसे एक संवैधानिक आवश्यकता के रूप में प्रस्तुत किया गया है, आलोचकों का तर्क है कि यह इसके कार्यान्वयन में देरी करता है, जिससे इसे राजनीतिक उपकरण के रूप में उपयोग किए जाने की आशंका उत्पन्न होती है।

संवैधानिक आवश्यकता

  • कानूनी ढाँचा: संशोधन के अनुसार, आरक्षण को परिसीमन के बाद लागू करना आवश्यक है, ताकि संवैधानिक वैधता सुनिश्चित हो सके।
  • सीट पुनर्संरचना: एक-तिहाई सीटों के आरक्षण के लिए निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्गठन आवश्यक है।
    • उदाहरण: मौजूदा सीटों को घटाए बिना आरक्षण लागू करने हेतु लगभग 850 सीटों तक विस्तार का प्रस्ताव।
  • जनसंख्या आधारित प्रतिनिधित्व: प्रतिनिधित्व को नवीनतम जनसांख्यिकीय वास्तविकताओं के अनुरूप बनाना।
    • उदाहरण: परिसीमन विधेयक में सीट आवंटन के लिए वर्ष 2011 की जनगणना का उपयोग।
  • समान क्रियान्वयन: सभी राज्यों में एक साथ लागू करने के लिए सीमाओं का पुनर्निर्धारण आवश्यक है।
    • उदाहरण: पूर्व के परिसीमन अभ्यासों ने निर्वाचन क्षेत्रों का समान आकार सुनिश्चित किया।
  • कानूनी चुनौती से बचाव: परिसीमन से जोड़ने से आरक्षण के मनमाने आवंटन पर संभावित संवैधानिक विवादों से बचा जा सकता है।

राजनीतिक रणनीति का उपकरण 

  • कार्यान्वयन में देरी: आरक्षण को जनगणना और परिसीमन से जोड़ने के कारण इसका वास्तविक क्रियान्वयन टल जाता है।
    • उदाहरण: वर्ष 2023 का अधिनियम पारित होने के बावजूद वर्ष 2024 लोकसभा चुनावों में आरक्षण लागू नहीं हुआ।
  • शर्तीय संबद्धता: आरक्षण को ऐसे प्रक्रियाओं से जोड़ा गया है, जो इसके लिए अनिवार्य नहीं थीं।
    • उदाहरण: वर्ष 2010 का महिला आरक्षण विधेयक (राज्यसभा में पारित) में ऐसी शर्त नहीं थी।
  • राजनीतिक विमर्श: बहस को इस तरह प्रस्तुत किया जाता है कि असहमति की गुंजाइश सीमित हो जाती है।
  • सीट विस्तार दृष्टिकोण: नई सीटों के निर्माण से मौजूदा निर्वाचन क्षेत्रों के पुनर्वितरण की आवश्यकता कम हो जाती है।
    • उदाहरण: लोकसभा को लगभग 850 सीटों तक बढ़ाने का प्रस्ताव, जिससे वर्तमान प्रतिनिधित्व संरचना बनी रह सके।
  • अधिकार में बदलाव: परिसीमन के लिए जनगणना के आधार के निर्धारण में संसद को अधिक विवेकाधिकार प्रदान किया गया है।
    • उदाहरण: संशोधन के तहत साधारण विधेयक के माध्यम से जनगणना वर्ष का चयन संभव है।

आगे की राह 

  • सुधार को अलग करना: महिलाओं के आरक्षण को परिसीमन से स्वतंत्र रूप से लागू किया जाए।
    • उदाहरण: वर्ष 2010 का महिला आरक्षण विधेयक परिसीमन से जुड़े बिना आरक्षण का प्रावधान करता था।
  • समयबद्ध कार्रवाई: जनगणना और परिसीमन प्रक्रियाओं के लिए स्पष्ट समय-सीमा निर्धारित की जाए।
    • उदाहरण: वर्ष 2021 के बाद जनगणना में देरी के कारण वर्ष 2023 अधिनियम का क्रियान्वयन टल गया।
  • पारदर्शी प्रक्रिया : विधेयकों पर पूर्व-विधायी परामर्श और व्यापक हितधारक सहभागिता सुनिश्चित की जाए।
    • उदाहरण: पूर्व-विधायी परामर्श नीति, 2014 ड्राफ्ट कानूनों पर जनमत लेने का प्रावधान करती है।
  • संघीय संतुलन: राज्यों की प्रतिनिधित्व संबंधी चिंताओं को ध्यान में रखा जाए।\
    • उदाहरण: तमिलनाडु जैसे दक्षिणी राज्यों ने परिसीमन के बाद सीटों में संभावित कमी पर चिंता जताई है।
  • संस्थागत सुरक्षा: परिसीमन आयोग की स्वतंत्रता और जवाबदेही सुनिश्चित की जाए।

निष्कर्ष

यद्यपि आरक्षण को परिसीमन से जोड़ने के पीछे संवैधानिक तर्क मौजूद है, लेकिन इसकी संरचना और समय-निर्धारण राजनीतिक अवसरवाद की आशंकाएँ उत्पन्न करते हैं। समयबद्ध, पारदर्शी और स्वतंत्र क्रियान्वयन सुनिश्चित करना आवश्यक है, ताकि भारत की प्रतिनिधिक लोकतंत्र में वास्तविक लैंगिक न्याय को साकार किया जा सके।

Linking women’s reservation in Parliament with the delimitation process is seen as both a constitutional necessity and a political manoeuvring tool. Critically analyse this statement in the light of the 106th Constitutional Amendment Act. in hindi

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