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Q. भारत में विवाह में साधारण गिरावट के बजाय संरचनात्मक और दृष्टिकोण संबंधी परिवर्तन देखने को मिल रहा है। इस संदर्भ में, समकालीन भारत में विवाह और अविवाहित जीवन के प्रति बदलती धारणाओं का परीक्षण कीजिए और भारतीय समाज पर उनके व्यापक प्रभावों पर चर्चा कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)

January 20, 2026

GS Paper IIndian Society

प्रश्न की मुख्य माँग

  • विवाह के प्रति बदलती धारणाएँ
  • अविवाहित जीवन के प्रति बदलती धारणाएँ
  • बदलती धारणाओं से उत्पन्न मुद्दे
  • भारतीय समाज पर व्यापक प्रभाव

उत्तर

भारत में विवाह केवल सांख्यिकीय गिरावट नहीं बल्कि संरचनात्मक और दृष्टिकोणगत विकास के दौर से गुजर रहा है। यद्यपि यह सामाजिक संगठन का एक केंद्रीय स्तंभ बना हुआ है, लेकिन यह अनिवार्य सामूहिक दायित्व से हटकर एक व्यक्तिगत विकल्प बनता जा रहा है, जो आर्थिक स्वायत्तता, शहरीकरण और घनिष्ठ सहचर्य की खोज से प्रभावित है।

विवाह के प्रति बदलती धारणाएँ

  • अनुबंधात्मक संबंधों की बजाय सहभागिता को प्राथमिकता: आधुनिक विवाहों में पारंपरिक जाति और परिवार आधारित विवाहों की तुलना में भावनात्मक अनुकूलता और प्रेम-आधारित चयन को अधिक महत्त्व दिया जा रहा है।
    • उदाहरण: वर्ष 2025 का “ग्राउंडेड वेडिंग” चलन उन जोड़ों को दर्शाता है, जो दिखावटी भव्यता के बजाय व्यक्तिगत जुड़ाव पर ध्यान केंद्रित करने के लिए उद्देश्यपूर्ण, अंतरंग समारोहों को चुन रहे हैं।
  • विवाह की समय-सीमा में विलंब: उच्च शिक्षा और आर्थिक स्थिरता की प्राप्ति ने विवाह की औसत आयु को बदल दिया है, विशेषकर शहरी पेशेवरों के बीच।
    • उदाहरण: NAFS-5 के आँकड़ों से पता चलता है कि शहरी महिलाओं के लिए औसत आयु में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, जो इस परिवर्तन को दर्शाती है कि अब विवाह कॅरियर स्थापित होने के बाद होता है।
  • समान भूमिका की अपेक्षाएँ: “समान साझेदारी” की माँग बढ़ रही है, जिसमें घरेलू कामों और वित्तीय निर्णयों को साझा करना वैवाहिक जीवन का नया मानदंड बन गया है।
    • उदाहरण: बंगलूरू और पुणे जैसे आईटी केंद्रों में कार्यरत जोड़े अपने दोहरे कॅरियर की स्थिरता बनाए रखने के लिए घरेलू जिम्मेदारियों पर अधिक ध्यान दे रहे हैं।

एकल जीवन के प्रति बदलती धारणाएँ

  • विकल्प-आधारित स्वायत्तता: अकेले रहना अब विवाह की प्रतीक्षा के रूप में नहीं देखा जाता, बल्कि इसे इच्छा और आत्म-संतुष्टि से परिभाषित एक वैध जीवन विकल्प के रूप में देखा जाता है।
    • उदाहरण: राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) की 2025 की रिपोर्ट बताती है कि लगभग 23% युवा पारंपरिक विवाह के बजाय स्वायत्तता को प्राथमिकता देते हैं।
  • अकेले रहने का सामाजिक कलंक कम होना: शहरीकरण ने “एकल-व्यक्ति परिवार” को सामान्य बना दिया है, जिससे सामाजिक मान्यता के लिए “बसने” का सामाजिक दबाव कम हो गया है।
  • परिकल्पित रिश्तेदारी संरचनाएँ: व्यक्ति “चुने हुए परिवारों” और दोस्ती के माध्यम से भावनात्मक सुरक्षा पा रहे हैं, जिससे सामाजिक समर्थन के लिए जीवनसाथी पर निर्भरता कम हो रही है।
    • उदाहरण: मुंबई जैसे महानगरों में अलग-अलग रहने (LAT) और दोस्ती-आधारित सहायता नेटवर्क का उदय भावनात्मक समर्थन के इस बदलाव को दर्शाता है।

धारणाओं में बदलाव से उत्पन्न होने वाले मुद्दे

  • संस्थागत पिछड़ापन: वर्तमान कानूनी और कल्याणकारी प्रणालियाँ (बीमा, उत्तराधिकार) अभी भी काफी हद तक पारंपरिक दंपत्तियों के लिए ही बनी हैं, जिससे एकल व्यक्तियों को नीतिगत सुविधाओं से वंचित रहना पड़ता है।
  • मानसिक स्वास्थ्य पर तनाव: पारंपरिक माता-पिता की अपेक्षाओं और आधुनिक व्यक्तिगत आकांक्षाओं के बीच असंगति अक्सर गंभीर अंतर-पीढ़ीगत संघर्ष और अकेलेपन का कारण बनती है।
  • आर्थिक असुरक्षा: दोहरी आय वाले परिवारों के लिए बने बाजार में एकल व्यक्तियों, विशेषकर महिलाओं को, जीवन यापन की उच्च लागत और पारंपरिक “सुरक्षा जाल” की कमी का सामना करना पड़ सकता है।
  • वृद्धावस्था सुरक्षा: संयुक्त परिवारों और विवाहों के पतन के साथ, वृद्ध एकल आबादी के लिए राज्य-प्रायोजित सामाजिक सुरक्षा का अभाव एक गंभीर संकट बना हुआ है।

भारतीय समाज के लिए व्यापक निहितार्थ

  • जनसांख्यिकीय संक्रमण: देर से विवाह और अविवाहित रहने की प्रवृत्ति कुल प्रजनन दर (TFR) में गिरावट ला रही है, जिससे भारत अपेक्षा से पहले ही “वृद्ध समाज” की ओर अग्रसर हो रहा है।
    • उदाहरण: अधिकांश भारतीय राज्य (बिहार को छोड़कर) पहले ही 2.1 के प्रतिस्थापन स्तर टीएफआर तक पहुँच चुके हैं, जो भविष्य में जनसांख्यिकीय स्थिरता का संकेत है।
  • कानूनी आधुनिकीकरण: अदालतें वैकल्पिक संबंधों, जैसे कि लिव-इन रिलेशनशिप, को विवाह के समान कानूनी सुरक्षा प्रदान करने लगी हैं।
    • उदाहरण: मद्रास उच्च न्यायालय (जनवरी 2026) ने हाल ही में कहा कि कानूनी सुरक्षा के लिए लिव-इन रिलेशनशिप को “गंधर्व विवाह” की पारंपरिक दृष्टि से देखा जा सकता है।
  • उत्सवों का व्यावसायीकरण: शादी उद्योग बड़े समारोहों से हटकर अनुभव-आधारित, सीमित आयोजनों की ओर बढ़ रहा है, जिससे आतिथ्य और लक्ज़री खुदरा क्षेत्र प्रभावित हो रहे हैं।

निष्कर्ष

भारत में विवाह समाप्त नहीं हो रहा; बल्कि इस पर पुनर्विचार हो रहा है। “स्वेच्छा से अविवाहित रहना” और “पसंद से विवाह” का उदय ऐसे समाज की ओर इशारा करता है, जो सामाजिक दबाव से अधिक व्यक्तिगत स्वतंत्रता को महत्त्व देता है। इस परिवर्तन को समर्थन देने के लिए, नीतिगत ढाँचों को विविध पारिवारिक संरचनाओं को मान्यता देने के लिए विकसित होना चाहिए, यह सुनिश्चित करते हुए कि गरिमा और सामाजिक सुरक्षा वैवाहिक स्थिति से अलग हों।

Marriage in India is witnessing a structural and attitudinal shift rather than a simple decline. In this context, examine the changing perceptions towards marriage and singlehood in contemporary India and discuss their broader implications for Indian society. in hindi

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