Q. केवल सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में वृद्धि से जनता की आर्थिक स्वतंत्रता की गारंटी नहीं मिलती है। 'उपभोक्ता वर्ग' (भारत 1) और 'जीवन निर्वाह वर्ग' (भारत 2) के बीच बढ़ते अंतराल के संदर्भ में इस कथन का आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिए। वास्तविक समावेशी विकास सुनिश्चित करने के लिए नीतिगत उपायों का सुझाव दीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)

January 23, 2026

GS Paper IIIIndian Economy

प्रश्न की मुख्य माँग

  • बढ़ता हुआ अंतर: भारत 1 (उपभोक्ता वर्ग) बनाम भारत 2 (जीवन निर्वाह वर्ग)
  • इस बढ़ते अंतर से उत्पन्न मुद्दे
  • वास्तविक समावेशी विकास के लिए नीतिगत उपाय

उत्तर

केवल GDP में वृद्धि से जनसाधारण की आर्थिक स्वतंत्रता सुनिश्चित नहीं होती, क्योंकि यह अक्सर संरचनात्मक असंतुलनों और धन के संकेंद्रण जैसी वास्तविक समस्याओं को छिपा देती है। यद्यपि वित्त वर्ष 2026 में वास्तविक GDP वृद्धि 7.4% अनुमानित है, फिर भी यदि निम्न आय वर्ग, कम उत्पादकता के चक्र में फँसे रहे और व्यापक अर्थव्यवस्था में भागीदारी के लिए आवश्यक विवेकाधीन क्रय-शक्ति से वंचित हो, तो ऐसी समग्र वृद्धि वास्तविक अर्थों में “स्वतंत्रता” सुनिश्चित करने में असफल रहती है।

बढ़ता हुआ अंतर: भारत 1 (उपभोक्ता वर्ग) बनाम भारत 2 (जीवन निर्वाह वर्ग)

इन दोनों भारत के बीच बढ़ता अंतर एक “K-आकार की वृद्धि पथ” द्वारा चिह्नित है, जहाँ ऊपरी वर्ग संपत्ति के मूल्यों में वृद्धि से समृद्ध होता है, जबकि निचला वर्ग वास्तविक मजदूरी में स्थिरता का सामना करता है।

  • विवेकाधीन व्यय में ध्रुवीकरण: ‘उपभोक्ता वर्ग’ (शीर्ष 10%) कुल विवेकाधीन खर्च का 66% संचालित करता है, जबकि ‘जीविकोपार्जन वर्ग’ केवल आवश्यक वस्तुओं तक सीमित रहता है।
    • उदाहरण: वर्ष 2025 में लक्जरी कारों और ₹1 करोड़ से अधिक कीमत वाले अपार्टमेंट्स जैसी उच्च-स्तरीय प्रीमियम वस्तुओं की बिक्री में रिकॉर्ड वृद्धि देखी गई, जबकि प्रवेश-स्तर के दोपहिया वाहनों की बिक्री वर्ष 2019 के स्तर से नीचे बनी रही।
  • आय और संपत्ति का संकेंद्रण: आर्थिक लाभों पर अभिजात वर्ग का अधिकार होता जा रहा है, जिससे अधिकांश आबादी के हिस्से में राष्ट्रीय आय का हिस्सा सिमटता जा रहा है।
    • उदाहरण: वैश्विक असमानता रिपोर्ट, 2026 के अनुसार, भारत के शीर्ष 1% के पास कुल संपत्ति का लगभग 40% भाग है, जबकि निचले 50% को राष्ट्रीय आय का केवल 15% ही प्राप्त होता है।
  • क्षेत्रीय विकास में असंतुलन: पूँजी-प्रधान सेवा क्षेत्र (भारत 1) की वृद्धि दर 9.1% है, जबकि श्रम-प्रधान कृषि क्षेत्र (भारत 2) की वृद्धि घटकर 3.1% रह गई है।
  • मध्य-स्तरीय बाजारों का सिकुड़ना: कंपनियाँ अपने ध्यान को “उच्च-लाभ” लक्जरी सेगमेंट की ओर केंद्रित कर रही हैं, जिससे जनसाधारण के लिए आवश्यक मात्रा-आधारित “सस्ते” बाजार को प्रभावी रूप से नजरअंदाज किया जा रहा है। 
    • उदाहरण: रियल एस्टेट डेवलपर्स सस्ती आवासीय परियोजनाओं से हटकर लक्जरी गेटेड कम्युनिटीज की ओर रुख कर रहे हैं ताकि लाभप्रदता बनाए रखी जा सके।

इस बढ़ते अंतर से उत्पन्न होने वाले मुद्दे

  • सामाजिक गतिशीलता में कमी: अत्यधिक वित्त का अंतर उच्च गुणवत्ता वाली स्वास्थ्य और शिक्षा तक असमान पहुँच को बढ़ावा देता है, जिससे ‘जीविकोपार्जन वर्ग’ कई पीढ़ियों तक असमान स्थिति में फँसा रहता है।
  • संस्थागत विश्वास का क्षरण: जब आर्थिक शक्ति राजनीतिक प्रभाव में बदल जाती है, तो आम जनता को लगता है कि लोकतांत्रिक संस्थाएँ अभिजात वर्ग के नियंत्रण में चली गई हैं।
  • संकट के प्रति संवेदनशीलता: भारत 2 के पास वित्तीय सुरक्षा का साधन नहीं है, जिससे वे महँगाई या जलवायु-संबंधित आपदाओं के प्रति संपत्ति-समृद्ध भारत 1 की तुलना में असमान रूप से संवेदनशील रहते हैं।

वास्तविक समावेशी विकास के लिए नीतिगत उपाय

  • प्रगतिशील संपत्ति कराधान: अत्यंत धनी व्यक्तियों पर लक्षित कर लगाना ताकि इसका उपयोग सार्वभौमिक स्वास्थ्य देखभाल और उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा जैसी सार्वजनिक सेवाओं के लिए किया जा सके।
    • उदाहरण: वैश्विक असामनता रिपोर्ट 2026 प्रगतिशील कराधान को मजबूत करने की सिफारिश करती है ताकि संसाधनों को पुनर्वितरणात्मक सामाजिक सुरक्षा के लिए जुटाया जा सके।
  • देखभाल अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करना : सस्ती बाल देखभाल और वृद्ध देखभाल में निवेश करके महिलाओं की मानव पूँजी को सक्रिय करना, जिनकी श्रम भागीदारी अभी भी कम है।
    • उदाहरण: देखभाल क्षेत्र में GDP का 2% प्रत्यक्ष सार्वजनिक निवेश भारत में लगभग 1.1 करोड़ नौकरियाँ सृजित कर सकता है।
  • मजदूरी-महँगाई सूचकांक समायोजन: औपचारिक और अनौपचारिक श्रमिकों के लिए अनिवार्य महँगाई-संबंधित वेतन समायोजन को कानून के रूप में लागू करना, ताकि जनसाधारण की वास्तविक आय की सुरक्षा की जा सके।
  • विकेंद्रीकृत औद्योगीकरण: MSMEs और ग्रामीण “फूड-प्रोसेसिंग क्लस्टर्स” को बढ़ावा देकर ग्रामीण क्षेत्रों में गैर-कृषि रोजगार सृजित करना।
    • उदाहरण: ग्रामीण आजीविका मिशन 2025 का लक्ष्य ग्रामीण श्रमिकों को उच्च-मूल्य वाली निर्माण आपूर्ति शृंखलाओं से जोड़ना है।

निष्कर्ष

आर्थिक स्वतंत्रता केवल GDP में वृद्धि तक सीमित नहीं होती, बल्कि इसका वास्तविक अर्थ बाज़ार की जबरदस्तीपूर्ण शक्ति को समाप्त करना और प्रत्येक नागरिक को सम्मानजनक जीवन जीने हेतु सशक्त बनाना है। भारत के विकसित भारत 2047 के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए ध्यान “हेडलाइन GDP” से हटकर गुणवत्तापूर्ण जीवन संकेतकों पर केंद्रित होना चाहिए। वास्तविक समृद्धि तब ही हासिल होती है, जब वृद्धि सिर्फ तीव्र नहीं बल्कि न्यायसंगत भी हो, यह सुनिश्चित करते हुए कि “भारत 1” “भारत 2” को सामाजिक सामंजस्य के स्तर से परे पीछे न छोड़ दे।

Mere increase in GDP does not guarantee the economic freedom of the masses. Critically analyze this statement in light of the widening gap between the ‘Consumer Class’ (India 1) and the ‘Survival Class’ (India 2). Suggest policy measures to ensure true inclusive growth. in hindi

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