Q. महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (MGNREGA) एक माँग-आधारित, अधिकार-आधारित सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रम है। इस संदर्भ में, प्रस्तावित विकसित भारत-रोजगार और आजीविका मिशन (ग्रामीण) विधेयक, 2025 पर उठाई गई चिंताओं का विश्लेषण कीजिए। (10 अंक, 150 शब्द)

प्रश्न की मुख्य माँग

  • प्रस्तावित विधेयक, 2025 की प्रमुख चिंताएँ
  • आगे की राह

उत्तर

मनरेगा एक माँग-आधारित, अधिकार-आधारित सामाजिक सुरक्षा कानून है, जो वैधानिक प्रावधानों के माध्यम से ग्रामीण रोजगार की गारंटी देता है। प्रस्तावित विकसित भारत गारंटी रोजगार और आजीविका मिशन (ग्रामीण) (VB-G RAM G) विधेयक, 2025 इस ढाँचे के पुनर्गठन का प्रयास करता है, जिससे कानूनी गारंटी के क्षरण, विकेंद्रीकरण और श्रमिक संरक्षण को लेकर गंभीर चिंताएँ उत्पन्न हुई हैं।

प्रस्तावित विधेयक, 2025 से संबंधित चिंताएँ

  • अधिकारों का क्षरण: वैधानिक अधिकार को मिशन-आधारित योजना से प्रतिस्थापित करना प्रवर्तनीयता को कमजोर करता है और नागरिकों की कानूनी रूप से रोजगार माँगने की क्षमता को समाप्त करता है।
    • उदाहरण: “गारंटी” से “मिशन” ढाँचे की ओर प्रस्तावित परिवर्तन।
  • माँग का ह्रास: रोजगार उपलब्धता, आपूर्ति-आधारित बनने का जोखिम रखती है, जिससे श्रमिकों के अपनी इच्छा से कार्य माँगने के अधिकार को आघात पहुँचता है।
  • मजदूरी असुरक्षा: मजदूरी भुगतान में दीर्घकालिक विलंब आय सुरक्षा को कमजोर करता है और सबसे गरीब परिवारों की भागीदारी को हतोत्साहित करता है।
    • उदाहरण: कई राज्यों में बड़ी मात्रा में लंबित वेतन देनदारियों की सूचना मिली है।
  • केंद्रीकरण की प्रवृत्ति: अत्यधिक  नौकरशाही नियंत्रण पंचायती राज संस्थाओं को कमजोर कर सकता है और कार्य चयन में स्थानीय लचीलापन घटा सकता है।
    • उदाहरण: मनरेगा कार्यों की योजना में ग्राम सभाओं की घटती भूमिका।
  • बहिष्करण का जोखिम: प्रौद्योगिकी पर आधारित कार्यान्वयन से आधार, बायोमेट्रिक या कनेक्टिविटी विफलताओं के कारण कमजोर श्रमिकों के बाहर होने का खतरा रहता है।
  • संपत्ति निर्माण का क्षरण: अल्पकालिक आजीविका मिशनों पर बल देने से ग्रामीण अनुकूलन बढ़ाने के लिए आवश्यक सतत् परिसंपत्तियों के निर्माण को कमजोर कर सकता है।

इन चिंताओं को दूर करने के उपाय

  • कानूनी निरंतरता: वैधानिक रोजगार गारंटी और बेरोजगारी भत्ता बनाए रखकर प्रवर्तनीय सामाजिक सुरक्षा अधिकारों को संरक्षित किया जाए।
  • माँग संरक्षण: श्रमिक-प्रेरित माँग पंजीकरण सुनिश्चित किया जाए तथा निश्चित समय-सीमा में अनिवार्य रोजगार उपलब्ध कराया जाए।
  • मजदूरी सुधार: स्वचालित क्षतिपूर्ति और विकेंद्रीकृत निधि उपलब्धता लागू कर भुगतान में होने वाली दीर्घकालिक विलंब को समाप्त किया जाए।
  • विकेंद्रीकृत शासन: ग्राम सभा की योजना निर्माण संबंधी भूमिका और पंचायतों के क्रियान्वयन को सुदृढ़ कर स्थानीय जवाबदेही और प्रासंगिकता बनाए रखी जाए।
  • समावेशी प्रौद्योगिकी: डिजिटल साधनों का उपयोग सहायक माध्यम के रूप में किया जाए, साथ ही ऑफलाइन विकल्प उपलब्ध हों ताकि श्रमिकों का बहिष्करण न हो।
    • उदाहरण: कठिन परिस्थितियों में आधार-आधारित उपस्थिति में शिथिलता।

निष्कर्ष

मनरेगा में सुधार ऐसे होने चाहिए जो दक्षता बढ़ाएँ, परंतु इसके अधिकार-आधारित मूल स्वरूप को कमजोर न करें। किसी भी पुनर्गठन में माँग-आधारित रोजगार, विकेंद्रीकृत शासन और मजदूरी सुरक्षा को सुदृढ़ करना अनिवार्य है, ताकि विकास की बदलती प्राथमिकताओं के अनुरूप ढलते हुए भी ग्रामीण आजीविकाएँ सुरक्षित बनी रहें।

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