प्रश्न की मुख्य माँग
- राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (NFSA) संशोधन का आलोचनात्मक विश्लेषण।
- खाद्य सुरक्षा से पोषण सुरक्षा की ओर संक्रमण संबंधी चुनौतियाँ।
- पोषण-केंद्रित नीतिगत ढाँचे हेतु आगे की राह।
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उत्तर
परिचय
राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (NFSA), 2013 में प्रस्तावित संशोधन में अंत्योदय अन्न योजना (AAY) के अंतर्गत पात्रताओं को परिवार-आधारित (35 किग्रा. प्रति परिवार) से बदलकर व्यक्ति-आधारित (7 किग्रा. प्रति व्यक्ति, अधिकतम 35 किग्रा. सीमा सहित) किया गया है। यद्यपि इसका उद्देश्य घरेलू स्तर पर विद्यमान असमानताओं को सुधारना है, फिर भी इससे बड़े परिवारों के लिए कल्याण में कमी तथा जनसांख्यिकीय रूप से बड़े राज्यों में क्षेत्रीय असंतुलन की आशंकाएँ उत्पन्न हुई हैं। यह संशोधन छोटे परिवारों की राशन पात्रता में उल्लेखनीय कटौती करता है (उदाहरणतः 2 सदस्यीय निराश्रित परिवार के लिए 35 किग्रा. से घटकर 14 किग्रा.), जबकि 35 किग्रा. की कठोर अधिकतम सीमा के कारण बड़े परिवारों को लाभ से वंचित कर देता है।
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प्रस्तावित संशोधन का आलोचनात्मक विश्लेषण
- समानता सुधार बनाम कल्याण में कमी: यह संशोधन छोटे और बड़े परिवारों के मध्य विद्यमान असमानताओं को कम करने के उद्देश्य से लाया गया है, जहाँ छोटे परिवार प्रति व्यक्ति अधिक लाभ प्राप्त करते थे। तथापि, बड़े परिवारों को समग्र रूप से कम राशन मिलने की संभावना है, जिससे उनका खाद्य सुरक्षा कवरेज प्रभावित हो सकता है।
- क्षेत्रीय असमानता का जोखिम: बड़े परिवार आकार वाले राज्यों (विशेषकर उत्तर भारत) को अपेक्षाकृत अधिक लाभ मिल सकता है, जबकि छोटे परिवार आकार वाले राज्यों (जैसे दक्षिण भारत) में सापेक्षिक हानि की आशंका है। केरल के खाद्य मंत्री ने जनसांख्यिकीय संरचना के कारण आवंटन में कमी पर चिंता व्यक्त की है।
- डेटा एवं लक्षित पहचान संबंधित सीमाएँ: जनगणना में देरी के कारण AAY कवरेज अद्यतन नहीं हो पाया है, जिससे अपवर्जन त्रुटियाँ बढ़ने की संभावना है तथा नए पात्र कमजोर परिवारों के छूटने का जोखिम बना रहता है।
- नीतिगत तर्क में परिवर्तन: नीतिगत फोकस घर-आधारित कल्याण मॉडल से हटकर व्यक्ति-आधारित अंकगणितीय वितरण की ओर बढ़ रहा है, जो सामाजिक संवेदनशीलता एवं वास्तविक उपभोग पैटर्न को पर्याप्त रूप से प्रतिबिंबित नहीं करता है।
- पोषणात्मक दृष्टिकोण की अपूर्णता: आलोचकों के अनुसार केवल खाद्यान्न आधारित वितरण पर्याप्त नहीं है। दालों एवं खाद्य तेलों की कमी से पोषण सुरक्षा अधूरी रह जाती है।
खाद्य सुरक्षा से पोषण सुरक्षा की ओर संक्रमण में चुनौतियाँ
- अनाज-केंद्रित सीमित दृष्टिकोण: NFSA मुख्यतः चावल एवं गेहूँ पर केंद्रित है, जबकि प्रोटीन, विटामिन एवं सूक्ष्म पोषक तत्त्वों की आवश्यकताओं की उपेक्षा होती है।
- आहार आवश्यकताओं से असंगति: भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) की सिफारिशें केवल कैलोरी नहीं बल्कि विविध एवं संतुलित आहार पर बल देती हैं, जो वर्तमान वितरण प्रणाली से पूरी तरह मेल नहीं खाती हैं।
- सुलभता एवं वहनीयता संबंधी बाधाएँ: गरीब परिवार सब्सिडी वाले अनाज पर निर्भर रहते हैं, जबकि दालों, तेलों एवं अन्य पोषक खाद्य पदार्थों की बाजार से खरीद उनकी आर्थिक क्षमता से बाहर होती है।
- प्रशासनिक विखंडन: खाद्य वितरण (NFSA), पोषण कार्यक्रम तथा स्वास्थ्य प्रणाली अलग-अलग ढंग से कार्य करती हैं, जिससे समग्र पोषण सुरक्षा की प्रभावशीलता सीमित हो जाती है।
आगे की राह: पोषण सुरक्षा की दिशा में
- NFSA के अंतर्गत आहार विविधीकरण: सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) की बास्केट में केवल अनाज के स्थान पर दालें, मोटे अनाज (Millets) तथा खाद्य तेल को सम्मिलित किया जाए।
- उदाहरण: ओडिशा एवं तमिलनाडु जैसे राज्यों ने विविधीकृत PDS मॉडल का प्रयोगात्मक रूप से क्रियान्वयन किया है।
- जीवन-चक्र आधारित पोषण दृष्टिकोण: गर्भवती महिलाओं, बच्चों एवं वृद्धों को लक्षित करते हुए फोर्टिफाइड एवं प्रोटीन-समृद्ध पूरक आहार प्रदान किए जाएँ।
- डेटा-आधारित लक्ष्यीकरण: जनगणना अद्यतन होने तक सामाजिक-आर्थिक एवं जाति जनगणना (SECC) एवं NFHS-आधारित डेटाबेस का तत्काल उपयोग कर पात्रता निर्धारण को अधिक सटीक बनाया जाए।
- पोषण-संवेदनशील अभिसरण: NFSA को पोषण अभियान, ICDS तथा मध्याह्न भोजन योजना के साथ एकीकृत कर सतत् पोषण वितरण प्रणाली विकसित की जाए।
- स्थानीय खरीद को सुदृढ़ करना: मोटे अनाज एवं दालों की विकेंद्रीकृत खरीद को बढ़ावा देकर किसानों की आय तथा आहार विविधता दोनों को सुदृढ़ किया जाए।
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निष्कर्ष
यद्यपि यह संशोधन पात्रता वितरण में तकनीकी समानता स्थापित करने का प्रयास करता है, फिर भी यदि इसे पोषण-परिणामों के साथ समन्वित नहीं किया गया तो यह केवल एक संकीर्ण अंकगणितीय सुधार बनकर रह सकता है। भारत की खाद्य नीति को अब कैलोरी-आधारित खाद्य सुरक्षा से आगे बढ़कर विविध, सुलभ एवं वहनीय पोषण सुरक्षा सुनिश्चित करने की दिशा में विकसित होना चाहिए, जो जीवन-चक्र के सभी चरणों और विभिन्न क्षेत्रों में समान रूप से प्रभावी हो।