प्रश्न की मुख्य माँग
- समकालीन भू-राजनीतिक घटनाक्रमों में प्रतिरोध का उल्लेख कीजिए।
- इन घटनाक्रमों से जुड़ी चुनौतियों को रेखांकित कीजिए।
- रणनीतिक पुनर्समायोजन के रूप में आगे की राह सुझाइए।
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उत्तर
परंपरागत रूप से न्यूक्लियर प्रतिरोध की अवधारणा पारस्परिक विनाश की गारंटी (Mutually Assured Destruction) सिद्धांत पर आधारित रही है, जिसमें प्रतिशोध के भय के माध्यम से संतुलन बनाए रखा जाता है। किंतु आज के युग में असममित युद्ध और विघटनकारी प्रौद्योगिकियों के उभरने से वैश्विक सुरक्षा परिदृश्य में बुनियादी परिवर्तन आ रहा है, जिससे शीतयुद्ध के द्वैतवादी विचार को गंभीर चुनौती मिल रही है।
समकालीन भू-राजनीतिक घटनाक्रमों में प्रतिरोध
- हाइपरसोनिक हथियार प्रणालियाँ: मैक 5 से अधिक गति वाली मिसाइलों का विकास मौजूदा प्रतिरक्षा अवरोधकों को निष्प्रभावी बना देता है, जिससे राजनीतिक नेतृत्व के लिए निर्णय लेने का समय अत्यंत सीमित हो जाता है।
- उदाहरण: रूस द्वारा ‘अवांगार्ड’ हाइपरसोनिक ग्लाइडर की तैनाती ने अमेरिकी मिसाइल रक्षा प्रणाली की प्रभावशीलता पर पुनर्विचार को बाध्य किया है।
- बहुध्रुवीय जुड़ाव: द्विध्रुवीय व्यवस्था से त्रिध्रुवीय संरचना (अमेरिका–चीन–रूस) की ओर संक्रमण ने पारंपरिक ‘शक्ति संतुलन’ की गणनाओं को जटिल बना दिया है।
- उदाहरण: शिनजियांग में चीन द्वारा मिसाइल साइलो का तीव्र विस्तार ‘न्यूनतम प्रतिरोध’ से अधिक आक्रामक प्रतिरोध नीति की ओर संकेत करता है।
- जवाबी कार्रवाई में परिवर्तन: उपग्रह निगरानी और उन्नत तकनीकों के कारण परमाणु परिसंपत्तियों को छिपाना कठिन हो गया है, जिससे रणनीति शहरों को निशाना बनाने से शत्रु के परमाणु शस्त्रागार को लक्षित करने की ओर स्थानांतरित हो रही है।
- उदाहरण: आधुनिक उच्च-रिजॉल्यूशन इमेजिंग के कारण मोबाइल लॉन्चर प्लेटफॉर्म पहले प्रहार की स्थिति में अधिक असुरक्षित हो गए हैं।
- सामरिक परमाणु सामान्यीकरण: पारंपरिक हथियारों और कम क्षमता वाले परमाणु हथियारों के बीच की रेखा धुँधली होने से क्षेत्रीय संघर्षों में इनके उपयोग की संभावना कम हो गई है।
इन घटनाक्रमों से संबद्ध चुनौतियाँ
- साइबर–परमाणु अभिसरण: कमांड एंड कंट्रोल प्रणालियों को निशाना बनाने वाले साइबर हमले आकस्मिक परमाणु प्रक्षेपण की आशंका पैदा कर सकते हैं अथवा किसी देश की प्रतिशोधी क्षमता को कमजोर कर सकते हैं।
- कृत्रिम बुद्धिमत्ता के जोखिम: कृत्रिम बुद्धिमत्ता-आधारित प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियाँ डेटा की गलत व्याख्या कर सकती हैं, जिससे पर्याप्त मानवीय निगरानी के बिना स्वचालित तनाव-वृद्धि का खतरा पैदा होता है।
- संधियों का क्षरण: प्रमुख शस्त्र नियंत्रण समझौतों के विघटन से वे “सुरक्षात्मक रेलिंग” समाप्त हो गई हैं, जो पारदर्शिता और विश्वास बनाए रखती थीं।
- उदाहरण: वर्ष 2023 में रूस द्वारा न्यू स्टार्ट (New START) संधि को निलंबित किए जाने से परमाणु ठिकानों के पारस्परिक निरीक्षण समाप्त हो गए।
- विश्वास की कमी: “संकट निवारण” के लिए राजनयिक चैनलों को आक्रामक संकेत और टकराव की स्थिति में तेजी से बदला जा रहा है।
- उदाहरण: ताइवान को लेकर हिंद-प्रशांत क्षेत्र में बार-बार की जा रही परमाणु बयानबाजी ने वर्ष 1990 के दशक की पूर्वानुमेयता को समाप्त कर दिया है।
आगे की दिशा: रणनीतिक पुनर्संयोजन
- बहुपक्षवाद का पुनरुद्धार: वैश्विक परमाणु संवाद की तत्काल आवश्यकता है, जिसमें उभरती शक्तियाँ और गैर-राज्यीय घटक भी शामिल हों।
- उदाहरण: भारत द्वारा निरंतर वैश्विक ‘प्रथम-प्रहार नहीं’ (No First Use – NFU) सम्मेलन की माँग तनाव-नियंत्रण के लिए एक प्रभावी प्रारूप बन सकती है।
- प्रौद्योगिकीय हथियार नियंत्रण: नए समझौतों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और हाइपरसोनिक हथियारों जैसी “द्वैत्य-प्रयोग” तकनीकों को विशेष रूप से शामिल करना आवश्यक है, ताकि आकस्मिक युद्धों को रोका जा सके।
- उदाहरण: संयुक्त राष्ट्र का शासकीय विशेषज्ञ समूह (UN GGE) वर्तमान में अंतरिक्ष और साइबरस्पेस में उत्तरदायी व्यवहार के मानकों पर कार्य कर रहा है।
- कमांड एंड कंट्रोल का सशक्तीकरण: यह सुनिश्चित करने के लिए कि स्वायत्त प्रणालियाँ परमाणु परिणामों को निर्धारित न करें, राज्यों को “मानव-सहभागिता” प्रोटोकॉल को प्राथमिकता देनी चाहिए।
- उदाहरण: भारत की सामरिक बल कमान अनधिकृत उपयोग को रोकने के लिए सख्त भौतिक “विफलता-सुरक्षा” तंत्र बनाए रखती है।
- क्षेत्रीय हॉटलाइन प्रणाली की पुनर्बहाली: परमाणु शक्ति संपन्न पड़ोसी देशों के बीच विश्वसनीय और प्रत्यक्ष संवाद माध्यमों की स्थापना आवश्यक है, ताकि स्थानीय तनावों को समय पर नियंत्रित किया जा सके।
- उदाहरण: भारत-पाकिस्तान के बीच मिसाइल परीक्षणों की पूर्व सूचना देने हेतु स्थापित हॉटलाइन यद्यपि दुर्लभ, परंतु जोखिम न्यूनीकरण का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण माध्यम है।
निष्कर्ष
परमाणु प्रतिरोध (Nuclear Deterrence) 21वीं सदी की उन्नत तकनीकी संरचना के संदर्भ में 20वीं सदी की अवधारणाएँ प्रासंगिक नहीं रह जातीं, यद्यपि इसके उपयोग पर “प्रतिबंध” पिछले आठ दशकों से कायम है, परंतु इसे बनाए रखने के लिए प्रतिस्पर्द्धात्मक शस्त्र वृद्धि से सहयोगात्मक संयम की ओर एक मूलभूत दृष्टिकोण परिवर्तन आवश्यक है। इससे यह सुनिश्चित किया जा सकेगा कि रणनीतिक स्थिरता, बहुध्रुवीय और उच्च-प्रौद्योगिकीय विश्व की जटिलताओं के अनुसार स्वयं को ढाल सके।
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