प्रश्न की मुख्य माँग
- चीन की बढ़ती अंतरिक्ष-प्रतिरोधी (Counter-Space) क्षमताओं के नकारात्मक प्रभावों का विश्लेषण कीजिए।
- चीन की बढ़ती अंतरिक्ष-प्रतिरोधी क्षमताओं के सकारात्मक प्रभावों की चर्चा कीजिए।
- अंतरिक्ष लचीलेपन (Space Resilience) को सुदृढ़ करने के उपाय सुझाइए।
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उत्तर
परिचय
बाह्य अंतरिक्ष (Outer Space) रणनीतिक प्रतिस्पर्द्धा का एक महत्त्वपूर्ण क्षेत्र बन चुका है, जहाँ उपग्रह संचार, नौवहन, खुफिया जानकारी संग्रहण तथा सैन्य अभियानों की आधारशिला हैं। चीन द्वारा अंतरिक्ष-प्रतिरोधी (Counter-Space) क्षमताओं का तीव्र विकास भारत की सुरक्षा और अंतरिक्ष पारिस्थितिकी तंत्र के लिए चुनौतियाँ उत्पन्न करने के साथ-साथ कुछ अवसर भी प्रस्तुत करता है।
नकारात्मक प्रभाव
- उपग्रहों की संवेदनशीलता: चीन की एंटी-सैटेलाइट (ASAT) मिसाइलें संकट की स्थिति में भारत के संचार, नौवहन और निगरानी उपग्रहों के लिए खतरा उत्पन्न कर सकती हैं।
- उदाहरण: वर्ष 2007 में चीन के ASAT परीक्षण ने Fengyun-1C उपग्रह को नष्ट कर दिया था।
- सैन्य व्यवधान: उपग्रहों पर हमले सैन्य कमान एवं नियंत्रण, खुफिया, निगरानी और टोही (C4ISR) प्रणालियों को बाधित कर सकते हैं।
- उदाहरण: भारतीय सशस्त्र बल नेटवर्क-केंद्रित युद्धक क्षमता के लिए GSAT-7 तथा GSAT-7A जैसे उपग्रहों पर निर्भर हैं।
- अंतरिक्ष प्रतिरोधक क्षमता में अंतराल: चीन का उन्नत अंतरिक्ष-प्रतिरोधी शस्त्रागार रणनीतिक असमानता उत्पन्न कर सकता है तथा भारत की प्रतिरोधक क्षमता को कमजोर कर सकता है।
- आर्थिक जोखिम: उपग्रह सेवाओं में व्यवधान से भारत में दूरसंचार, बैंकिंग, आपदा प्रबंधन और लॉजिस्टिक्स जैसी महत्त्वपूर्ण सेवाएँ प्रभावित हो सकती हैं।
- अंतरिक्ष मलबे का खतरा: ASAT परीक्षणों से उत्पन्न अंतरिक्ष मलबा नागरिक और सैन्य दोनों प्रकार के उपग्रहों को नुकसान पहुँचा सकता है।
सकारात्मक प्रभाव
- क्षमता निर्माण: चीन की प्रगति ने भारत को अंतरिक्ष सुरक्षा और रक्षा तैयारियों में निवेश बढ़ाने के लिए प्रेरित किया है।
- उदाहरण: भारत ने वर्ष 2019 में मिशन शक्ति का सफल परीक्षण कर अपनी ASAT क्षमता का प्रदर्शन किया।
- संस्थागत सुधार: बढ़ते खतरों के कारण अतरिक्ष सुरक्षा से संबंधित विशेष संस्थानों की स्थापना को बढ़ावा मिला है।
- उदाहरण: सैन्य अंतरिक्ष अभियानों के समन्वय हेतु वर्ष 2019 में रक्षा अंतरिक्ष एजेंसी (DSA) की स्थापना की गई।
- तकनीकी नवाचार: प्रतिस्पर्द्धा के कारण भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) और रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) के माध्यम से निगरानी, प्रक्षेपण प्रणालियों तथा उपग्रह सुरक्षा जैसी उन्नत अंतरिक्ष प्रौद्योगिकियों के स्वदेशी विकास को प्रोत्साहन मिला है।
- रणनीतिक साझेदारियाँ: अंतरिक्ष सुरक्षा और अंतरिक्ष स्थितिजन्य जागरूकता से जुड़ी समान चिंताएँ समान विचारधारा वाले देशों के साथ सहयोग को सुदृढ़ करती हैं।
- नीतिगत प्राथमिकता: बढ़ते खतरों ने अंतरिक्ष सुरक्षा को राष्ट्रीय सुरक्षा नियोजन के मुख्य विमर्श में ला दिया है।
- उदाहरण: भारतीय अंतरिक्ष नीति-2023 राष्ट्रीय क्षमताओं के संवर्द्धन तथा अंतरिक्ष क्षेत्र में निजी भागीदारी को बढ़ावा देने पर बल देती है।
अंतरिक्ष लचीलेपन (Space Resilience) के उपाय
- उपग्रह अतिरेकता: हमलों की स्थिति में सेवाओं की निरंतरता सुनिश्चित करने के लिए बड़े उपग्रह समूहों की तैनाती की जानी चाहिए।
- अंतरिक्ष स्थितिजन्य जागरूकता का विस्तार: खतरों, अंतरिक्ष मलबे और शत्रुतापूर्ण गतिविधियों की निगरानी हेतु अंतरिक्ष स्थितिजन्य जागरूकता (Space Situational Awareness – SSA) क्षमताओं को सुदृढ़ किया जाना चाहिए।
- उदाहरण: नेत्र पहल (NETRA Project) का उद्देश्य अंतरिक्ष में मौजूद वस्तुओं और संभावित जोखिमों की निगरानी करना है।
- संपत्तियों का सुदृढ़ीकरण: उपग्रहों को साइबर सुरक्षा, गतिशीलता, एंटी-जैमिंग सुविधाओं तथा इलेक्ट्रॉनिक सुरक्षा प्रणालियों से सुसज्जित किया जाना चाहिए।
- स्वदेशी क्षमता विकास: प्रक्षेपण, उपग्रह निर्माण और रक्षा-अंतरिक्ष प्रौद्योगिकियों में घरेलू क्षमताओं को बढ़ावा दिया जाए।
- उदाहरण: भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष संवर्द्धन एवं प्राधिकरण केंद्र (IN-SPACe) तथा भारतीय अंतरिक्ष नीति, 2023 के माध्यम से आत्मनिर्भरता को प्रोत्साहित किया जा सकता है।
- वैश्विक मानदंडों को बढ़ावा: बाह्य अंतरिक्ष में उत्तरदायित्वपूर्ण आचरण और हथियारों की होड़ को रोकने के लिए कूटनीतिक प्रयासों का नेतृत्व किया जाना चाहिए।
- उदाहरण: भारत, संयुक्त राज्य अमेरिका जैसे बहुपक्षीय मंचों के माध्यम से बाह्य अंतरिक्ष के शांतिपूर्ण उपयोग का लगातार समर्थन करता रहा है।
निष्कर्ष
जैसे-जैसे अंतरिक्ष एक प्रतिस्पर्द्धी रणनीतिक क्षेत्र बनता जा रहा है, भारत को तकनीकी आत्मनिर्भरता, लचीली अंतरिक्ष संरचना, विश्वसनीय प्रतिरोधक क्षमता तथा अंतरराष्ट्रीय सहयोग का समन्वित विकास करना होगा। एक संतुलित दृष्टिकोण राष्ट्रीय हितों की रक्षा सुनिश्चित करने के साथ-साथ बाह्य अंतरिक्ष के शांतिपूर्ण एवं सतत् उपयोग को भी प्रोत्साहित करेगा।