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Q. पश्चिम एशिया के साथ पाकिस्तान की हालिया राजनयिक पुन: सक्रियता दीर्घकालिक रणनीतिक योजना की तुलना में बदलती क्षेत्रीय भू-राजनीति से अधिक प्रेरित है। टिप्पणी कीजिए। (10 अंक, 150 शब्द)

December 24, 2025

GS Paper IIInternational Relations

प्रश्न की मुख्य माँग

  • भू-राजनीतिक कारक बनाम रणनीतिक योजना

उत्तर

पाकिस्तान का हालिया पश्चिम एशिया की ओर कूटनीतिक झुकाव, गंभीर घरेलू आर्थिक संकट से उबरने और बदलते मध्य-पूर्वी परिदृश्य के अनुरूप स्वयं को ढालने का प्रयास है। तथापि, इन पहलों का लेन-देन आधारित स्वरूप यह संकेत देता है कि ये सुसंगत, दीर्घकालिक रणनीतिक दूरदृष्टि का परिणाम न होकर तात्कालिक भू-राजनीतिक दबावों की प्रतिक्रियाएँ हैं।

भू-राजनीतिक प्रेरक बनाम रणनीतिक योजना

  • आर्थिक अस्तित्व की रणनीतियाँ: पाकिस्तान का पुनः सक्रिय होना मुख्य रूप से संप्रभुता के उल्लंघन से बचने के लिए एक “अस्तित्ववादी” प्रतिक्रिया है, जिसमें तत्काल वित्तीय सहायता के लिए अपनी रणनीतिक स्थिति का लाभ उठाया जा रहा है।
    • उदाहरण: वर्ष 2025 में पाकिस्तान को 1.2 अरब डॉलर की अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की किस्त केवल सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात से प्राप्त ऋण पुनर्गठन तथा वित्तीय गारंटियों के बाद ही मिली।
  • विशेष निवेश सुविधा परिषद: नागरिक-सैन्य निकाय SIFC का गठन, खाड़ी देशों की पूँजी को खनिज और कृषि क्षेत्रों में आकर्षित करने के लिए नौकरशाही की लालफीताशाही को दरकिनार करने का एक तात्कालिक प्रयास दर्शाता है।
    • उदाहरण: परिषद द्वारा रेको डीक स्वर्ण-ताम्र खदान में 540 मिलियन डॉलर के सऊदी निवेश को शीघ्र स्वीकृति देना, तत्काल विदेशी मुद्रा आवश्यकता से प्रेरित कदम है।
  • निवेश के बदले सुरक्षा संबंधी समझौते: सऊदी अरब के साथ हाल ही में हुए “रणनीतिक पारस्परिक रक्षा समझौते” (SMDA) से आर्थिक स्थिरता के बदले “सुरक्षा प्रदाता” की भूमिका में वापसी का संकेत मिलता है।
  • क्षेत्रीय ध्रुवीकरण की प्रतिक्रिया: संयुक्त अरब अमीरात और कतर के साथ बढ़ते संबंध प्रायः भारत की पश्चिम से जोड़ो नीति और क्षेत्रीय आर्थिक प्रभाव का प्रत्युत्तर हैं।
    • उदाहरण: वर्ष 2025 में पाकिस्तान ने संयुक्त अरब अमीरात के साथ संबंध उन्नत करते हुए रेलमार्ग और बंदरगाहों हेतु 3 अरब डॉलर के समझौते किए, ताकि भारत-मध्य-पूर्व-यूरोप गलियारे के समानांतर अपनी प्रासंगिकता बनाए रखी जा सके।
  • ईरान-सऊदी समीकरण का प्रबंधन: चीन की मध्यस्थता से हुए ईरान-सऊदी सामंजस्य के बाद पाकिस्तान अपनी तटस्थता का पुनर्संतुलन कर रहा है, ताकि किसी भी पक्ष की नाराजगी न हो।
    • उदाहरण: वर्ष 2025 में पाकिस्तान ने खाड़ी साझेदारों और तेहरान दोनों के साथ समन्वय कर क्षेत्रीय तनाव-स्थलों में युद्धविराम हेतु पार्श्व-मार्ग भूमिका निभाने का प्रयास किया।
  • आर्थिक गलियारे का द्वितीय चरण: चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) को पश्चिम एशियाई बाजारों से जोड़ने का प्रयास एक कमजोर पड़ रही परियोजना को पुनर्जीवित करने का अवसरवादी प्रयास है।
    • उदाहरण: सऊदी समर्थन से प्रस्तावित ग्वादर तेल परिशोधन परियोजना को चीन और स्थलरुद्ध मध्य एशिया के लिए ऊर्जा प्रवेशद्वार के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है।
  • सैन्य-नेतृत्व आधारित कूटनीति: सेना प्रमुख के नेतृत्व में रियाद और अबू धाबी की यात्राएँ दर्शाती हैं कि यह संलग्नता संस्थागत तथा तात्कालिक है, न कि नागरिक-केंद्रित रणनीतिक परिवर्तन।
  • बाह्य समस्याओं के प्रति संवेदनशीलता: दीर्घकालिक योजना की कमी इस बात से स्पष्ट है कि पाकिस्तान की नीति वैश्विक तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और खाड़ी देशों में श्रम की माँग पर किस प्रकार निर्भर है।

निष्कर्ष

यद्यपि पाकिस्तान कूटनीतिक अलगाव से आंशिक रूप से पुनः उभरने में सफल रहा है, फिर भी उसकी पश्चिम एशिया नीति मुख्यतः लेन-देन आधारित और प्रतिक्रियात्मक बनी हुई है। जब तक वह ऋण-आधारित मॉडल से हटकर वास्तविक संरचनात्मक सुधारों के माध्यम से निवेश-आधारित मॉडल की ओर संक्रमण नहीं करता, तब तक ये उच्च-स्तरीय संलग्नताएँ स्थायी समाधान न होकर सतत् आर्थिक और भू-राजनीतिक संकटों में फँसे राष्ट्र के लिए केवल अल्पकालिक उपचार ही सिद्ध होंगी।

Pakistan’s recent diplomatic re-engagement with West Asia is driven more by changing regional geopolitics than by long-term strategic planning. Comment. in hindi

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