प्रश्न की मुख्य माँग
- राहत उपाय के रूप में PMGKAY का महत्त्व।
- PMGKAY के कार्यान्वयन में आने वाली चुनौतियाँ।
- अधिक लक्षित ढाँचे के लिए सुधारों का सुझाव दीजिए।
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उत्तर
वर्ष 2020 में कोविड-राहत उपाय के रूप में शुरू की गई प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना (PMGKAY) लगभग 80 करोड़ लोगों को निशुल्क खाद्यान्न उपलब्ध कराती है, जो सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (NFSA) के अतिरिक्त है। संकट की घड़ी में इसने खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित की, किंतु गरीबी में गिरावट के बावजूद इसकी सार्वभौमिक कवरेज ने दक्षता और राजकोषीय बोझ से जुड़े प्रश्न खड़े कर दिए हैं।
राहत उपाय के रूप में PMGKAY का महत्त्व
- संकट के दौरान तात्कालिक खाद्य सुरक्षा: कोविड-19 महामारी के समय जब रोजगार और आय अचानक समाप्त हो गई थी, तब PMGKAY ने करोड़ों परिवारों को निश्चित खाद्यान्न उपलब्ध कराकर लाइफलाइन का कार्य किया।
- उदाहरण के लिए: प्रत्येक अंत्योदय अन्न योजना (AAY) परिवार को प्रति माह 35 किलोग्राम खाद्यान्न मिला, जबकि प्रत्येक प्राथमिकता परिवार (PHH) के सदस्य को 5 किलोग्राम खाद्यान्न प्रदान किया गया।
- विश्व के सबसे बड़े खाद्य सुरक्षा जाल का निर्माण: भारत की लगभग दो-तिहाई आबादी को कवर करके, PMGKAY, भारत की महामारी कल्याण संरचना का एक महत्त्वपूर्ण अंग बन गई।
- उदाहरण के लिए: योजना को दिसंबर 2028 तक बढ़ा दिया गया, जिससे लाभार्थियों को निरंतर इस योजना के माध्यम से सहायता मिलती रहेगी।
- सर्वाधिक गरीब वर्गों की सुरक्षा: यह विशेष रूप से अंत्योदय परिवारों (सर्वाधिक गरीब वर्ग) की सुरक्षा करता है, जो भूख और कुपोषण के प्रति सबसे अधिक संवेदनशील हैं।
- उदाहरण के लिए: आज भी लगभग 8.1 करोड़ AAY लाभार्थियों को अन्य लोगों की तुलना में अधिक खाद्यान्न उपलब्ध कराया जा रहा है।
- सामाजिक अस्थिरता की रोकथाम: मूलभूत आजीविका सुनिश्चित कर इस योजना ने संभावित खाद्य की कमी से होने वाले दंगों, मजबूरी में होने वाले पलायन और सामाजिक अशांति की आशंका को कम किया।
- अप्रत्यक्ष आर्थिक राहत: इस योजना के कारण जब परिवारों की खाद्य आवश्यकताएँ पूर्ण हुईं, तो वे अपनी सीमित आय को स्वास्थ्य, शिक्षा और अन्य जरूरी खर्चों में लगा सके। इससे व्यापक आर्थिक समस्याओं को कुछ हद तक कम करने में मदद मिली।
PMGKAY के कार्यान्वयन में चुनौतियाँ
- अस्थायी न रह पाने वाला राजकोषीय बोझ: इस योजना से सरकार के खजाने पर भारी दबाव पड़ता है। केवल खाद्य सब्सिडी पर ही प्रतिवर्ष लगभग ₹2.36 लाख करोड़ का व्यय होता है।
- उदाहरण के लिए: पाँच वर्षों में अनुमानित ₹11.8 लाख करोड़ का सब्सिडी बिल सामने आया है, जो दीर्घकालीन रूप से वित्तीय स्थिरता पर प्रश्न खड़ा करता है।
- अपात्र लाभार्थियों का समावेशन और दुरुपयोग: इस योजना का एक बड़ा हिस्सा उन परिवारों को भी लाभ दे रहा है, जो वास्तव में पात्र नहीं हैं। इससे वास्तविक गरीबों पर होने वाला प्रभाव कमजोर हो जाता है और संसाधनों का असमान वितरण होता है।
- केन्द्र–राज्य समन्वय में तनाव: इस योजना के विस्तार का राजनीतिक श्रेय तो केंद्र सरकार को मिल जाता है, लेकिन अपात्र लाभार्थियों की पहचान और बहिष्कार की कठिन जिम्मेदारी राज्यों पर आ जाती है। इससे अक्सर राजनीतिक असहमति और आपसी संघर्ष देखने को मिलता है।
- गरीबी के स्तर के साथ असंगति: वर्तमान में भारत में बहुआयामी गरीबी लगभग 21 करोड़ लोगों तक सीमित है, परंतु PMGKAY के अंतर्गत अब भी लगभग 76 करोड़ लोगों को शामिल किया जा रहा है। यह अत्यधिक कवरेज नीति की प्रभावशीलता पर सवाल खड़े करता है।
- अपात्र लाभार्थियों को हटाने के प्रति राजनीतिक अनिच्छा: यदि अपात्र परिवारों को योजना से बाहर भी किया जाए, तो राजकोषीय बचत बहुत सीमित होगी। किंतु इससे जनता में नाराजगी, विरोध और राजनीतिक प्रतिघात का खतरा बढ़ जाता है। यही कारण है कि नीति-निर्माताओं में सुधार की इच्छाशक्ति कमजोर दिखाई देती है।
सुझाए गए सुधार
- योजना का पुनर्लक्ष्यीकरण: योजना को सभी पर लागू करने के बजाय केवल अंत्योदय अन्न योजना (AAY) परिवारों अथवा जनसंख्या के सबसे निचले 25% वर्ग तक सीमित करना चाहिए, ताकि वास्तविक गरीबी स्तर के अनुरूप लाभ मिल सके।
- उदाहरण के लिए: वर्तमान में लगभग 76 करोड़ लाभार्थी हैं, जबकि इनमें से केवल 8.1 करोड़ लोग AAY श्रेणी में आते हैं। इन्हें ही सर्वोच्च प्राथमिकता मिलनी चाहिए।
- गतिशील बहिष्करण मानदंड लागू करना: आधार, आयकर अभिलेख, वाहन स्वामित्व, भूमि रिकॉर्ड जैसी सूचनाओं का उपयोग कर अपात्र परिवारों को स्वतः बाहर करने की व्यवस्था विकसित की जानी चाहिए।
- उदाहरण के लिए: लगभग 94.7 लाख राशन कार्ड धारक आयकर दाता पाए गए हैं, जिन्हें ऐसे तंत्र के माध्यम से आसानी से बाहर किया जा सकता है।
- नकद हस्तांतरण मॉडल अपनाना: खाद्यान्न सब्सिडी के एक हिस्से को प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) से बदलना चाहिए। इससे लीकेज कम होंगे, लाभार्थियों को अपनी पसंद के अनुसार ख़रीदारी की स्वतंत्रता मिलेगी और राजकोषीय व्यय का संतुलन बनेगा।
- अधिकारों को युक्तिसंगत बनाना: अंत्योदय (AAY) और प्राथमिकता परिवार (PHH) के बीच स्पष्ट अंतर रखते हुए लाभों का विवेकपूर्ण वितरण करना आवश्यक है। ऐसे परिवार जिन्हें अब पूर्ण सहायता की आवश्यकता नहीं है, उनके लिए खाद्यान्न आवंटन कम किया जा सकता है।
- सत्यापन और निगरानी को सुदृढ़ करना: नियमित अंतराल पर सर्वेक्षण, डिजिटल ऑडिट और वास्तविक समय पर लाभार्थी सत्यापन की व्यवस्था की जानी चाहिए। इससे यह सुनिश्चित होगा कि केवल वास्तविक और पात्र परिवार ही योजना का लाभ उठा सकें।
निष्कर्ष
प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना (PMGKAY) ने भारत में खाद्य सुरक्षा और सामाजिक कल्याण सुनिश्चित करने में एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यह योजना सीधे तौर पर सतत् विकास लक्ष्य (SDG) 1 – गरीबी का अंत और SDG 2 – शून्य भुखमरी के उद्देश्यों के अनुरूप है। हालाँकि, इसके प्रभाव को दीर्घकाल तक बनाए रखने के लिए इसमें कुछ सुधार आवश्यक हैं। इसमें सबसे प्रमुख है – लक्षित लाभ वितरण ताकि वास्तविक गरीब और जरूरतमंद तक ही योजना सीमित रहे; डिजिटल माध्यमों से वितरण (जैसे आधार-आधारित सत्यापन, रियल-टाइम निगरानी), जिससे पारदर्शिता और दक्षता बढ़े; तथा पोषण-केंद्रित दृष्टिकोण ताकि केवल पेट भरने की जगह संतुलित और गुणवत्तापूर्ण आहार भी सुनिश्चित हो। यदि इन सुधारों को लागू किया जाए तो यह योजना न केवल नागरिक कल्याण की एक मजबूत नींव बनेगी, बल्कि समावेशी और सतत् विकास की दिशा में भी भारत को सशक्त रूप से आगे बढ़ाएगी।