प्रश्न की मुख्य माँग
- राजनीतिक संरेखण से शासन में संभावित लाभों की चर्चा कीजिए।
- राजनीतिक संरेखण के नकारात्मक प्रभावों का उल्लेख कीजिए।
- सहकारी संघवाद पर इसके प्रभावों को रेखांकित कीजिए।
|
उत्तर
राजनीतिक संरेखण से तात्पर्य है कि केंद्र और राज्यों में एक ही दल की सरकार हो, जिसे अक्सर बेहतर समन्वय से जोड़ा जाता है। यद्यपि यह सहकारी संघवाद को बढ़ावा दे सकता है, परंतु इससे निष्पक्षता, स्वायत्तता और संवैधानिक संतुलन को लेकर चिंताएँ भी उत्पन्न होती हैं।
क्यों राजनीतिक संरेखण शासन में सहायक हो सकता है?
- बेहतर नीतिगत समन्वय: एक ही दल की सरकार होने से प्राथमिकताओं में सामंजस्य स्थापित होता है और टकराव कम होता है।
- उदाहरण: ‘डबल-इंजन’ की अवधारणा तीव्र निर्णय-निर्माण और कार्यान्वयन पर बल देती है।
- परियोजनाओं का त्वरित क्रियान्वयन: अनुमोदन और स्वीकृतियों में नौकरशाही के कारण विलंब कम हो जाता है।
- उदाहरण: भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) के तहत राजमार्ग विस्तार राजनीतिक रूप से संरेखित राज्यों में भूमि अधिग्रहण के बेहतर सहयोग के कारण तेजी से आगे बढ़ा।
- धन का कुशल उपयोग: सुगम संचार से धन के निर्गमन और उपयोग में आसानी होती है।
- उदाहरण: जल जीवन मिशन के तहत संरेखित राज्यों में कम प्रशासनिक बाधाओं के कारण नल-जल कवरेज तेजी से बढ़ा।
- राजनीतिक टकराव में कमी: केंद्र-राज्य के बीच विवाद कम होते हैं, जिससे शासन पर अधिक ध्यान केंद्रित किया जा सकता है।
- उदाहरण: विपक्ष-शासित राज्यों की तुलना में संरेखित राज्यों में जीएसटी मुआवजे को लेकर कम विवाद देखे गए।
- मजबूत प्रशासनिक एकीकरण: विभिन्न स्तरों पर समन्वित शासन से सेवा वितरण में सुधार होता है।
राजनीतिक संरेखण के नकारात्मक प्रभाव
- राजकोषीय निष्पक्षता पर खतरा: संसाधनों का आवंटन पक्षपातपूर्ण प्रतीत हो सकता है, जिससे नियम-आधारित वितरण प्रणाली कमजोर होती है।
- उदाहरण: दक्षिणी राज्यों (तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक) ने वित्त आयोग के समक्ष जनसंख्या-आधारित मानदंडों के कारण अपने साथ संभावित भेदभाव की चिंता व्यक्त की।
- राज्य की स्वायत्तता का क्षरण: राज्य संवैधानिक अधिकारों के बजाय केंद्र के विवेक पर अधिक निर्भर हो सकते हैं।
- चुनावी विकल्पों में विकृति: मतदाताओं को यह महसूस हो सकता है कि विकास लाभ प्राप्त करने के लिए केंद्र में सत्तारूढ़ दल को ही चुनना आवश्यक है।
- संवैधानिक पदों का दुरुपयोग: राज्यपाल जैसे पदों का उपयोग निर्वाचित राज्य सरकारों के कार्य में बाधा डालने के लिए किया जा सकता है।
- उदाहरण: तमिलनाडु और केरल में विधेयकों को स्वीकृति देने में लंबी देरी; तमिलनाडु राज्य बनाम तमिलनाडु के राज्यपाल (2025) में इस मुद्दे को रेखांकित किया गया।
- राजकोषीय शक्तियों का केंद्रीकरण: उपकरों (Cess) और अधिभारों के बढ़ते उपयोग से राज्यों को मिलने वाले विभाज्य निधि में हिस्सेदारी कम हो जाती है।
- उदाहरण: केंद्र द्वारा उपकर (जो साझा नहीं किए जाते) पर बढ़ती निर्भरता को राजकोषीय संघवाद की बहसों में प्रमुखता से उठाया गया है।
सहकारी संघवाद पर प्रभाव
- नियम-आधारित संघवाद का क्षरण: शासन संस्थागत मानदंडों के बजाय राजनीतिक वार्ताओं पर अधिक निर्भर हो सकता है।
- उदाहरण: वित्त आयोग का उद्देश्य वस्तुनिष्ठ मानदंडों के आधार पर संसाधनों का वितरण सुनिश्चित करना है, न कि राजनीतिक पक्षपात।
- केंद्र-राज्य के बीच विश्वास में कमी: भेदभाव की धारणा संघीय संबंधों में तनाव को बढ़ावा देती है।
- संस्थागत टकराव में वृद्धि: विधायी और प्रशासनिक प्रक्रियाओं में संघर्ष उत्पन्न होते हैं।
- उदाहरण: राज्यपाल और राज्य सरकार के बीच विवाद, जो न्यायालयों तक पहुँचते हैं।
- संघीय संबंधों का न्यायिकीकरण: केंद्र-राज्य विवादों के समाधान के लिए न्यायालयों की भूमिका बढ़ती जा रही है।
- सहयोगात्मक भावना का क्षीण होना: संघवाद सहयोगात्मक के बजाय राजनीतिक परिस्थितियों पर निर्भर हो सकता है।
निष्कर्ष
यद्यपि राजनीतिक संरेखण समन्वय को बेहतर बना सकता है, किंतु यदि विकास को दलगत संबद्धता पर निर्भर बना दिया जाए तो यह संवैधानिक संघवाद को कमजोर कर सकता है। वास्तविक सहकारी संघवाद संस्थागत निष्पक्षता, राज्यों की स्वायत्तता तथा सभी राज्यों के समान व्यवहार पर आधारित होना चाहिए।