प्रश्न की मुख्य माँग
- भू-राजनीतिक संकटों के दौरान नीतिगत हस्तक्षेप में विलंब का प्रभाव समझाइए।
- अचानक लागू की गई मितव्ययिता उपायों के परिणाम की चर्चा कीजिए।
- आगे की राह सुझाइए।
|
उत्तर
विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में वैश्विक संकटों के दौरान राजनीतिक बाध्यताओं और आर्थिक विवेक के मध्य संतुलन स्थापित करना कठिन हो जाता है। सुधारों में विलंब तथा अचानक लागू किए गए सुधारात्मक कदम अक्सर इसी तनाव को प्रतिबिंबित करते हैं, जिससे नीतिगत प्रतिक्रियाओं की गुणवत्ता एवं समयबद्धता पर महत्त्वपूर्ण प्रश्न उठते हैं।
भू-राजनीतिक संकटों के दौरान नीतिगत हस्तक्षेप में विलंब का प्रभाव
- ईंधन मूल्य संशोधन में देरी: चुनावी कारणों से ईंधन कीमतों में संशोधन टालने से बाद में सब्सिडी का बोझ एवं राजकोषीय दबाव बढ़ जाता है।
- उदाहरण: पश्चिम एशिया संकट के बाद कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि के बावजूद चुनावों से पूर्व पेट्रोल और डीजल की कीमतों में परिवर्तन नहीं किया गया।
- विदेशी मुद्रा पर दबाव: बाह्य झटकों के प्रति विलंबित प्रतिक्रिया मुद्रा स्थिरता को कमजोर करती है तथा विदेशी मुद्रा भंडार को कम करती है।
- उदाहरण: वर्ष 2026 में रुपये के लगभग ₹95 प्रति अमेरिकी डॉलर तक गिरने पर RBI ने रुपये को समर्थन देने हेतु डॉलर भंडार का उपयोग किया।
- निवेशकों का पलायन: संकट के दौरान नीतिगत अनिश्चितता विदेशी निवेशकों की निकासी को बढ़ावा देती है तथा पूँजी बाजार को कमजोर करती है।
- मुद्रास्फीति में वृद्धि: सुधारात्मक कदमों को टालने से ईंधन एवं खाद्य क्षेत्र में आयातित मुद्रास्फीति और अधिक बढ़ जाती है।
- उदाहरण: तेल की बढ़ती कीमतों तथा अल-नीनो के जोखिम ने खाद्य एवं परिवहन क्षेत्रों में मुद्रास्फीति संबंधी चिंताओं को बढ़ाया।
- उपभोग पर नकारात्मक प्रभाव: समय पर चेतावनी न देने से लोगों को धीरे-धीरे व्यवहार में परिवर्तन का अवसर नहीं मिल पाता और बाद में अचानक माँग में संकुचन करना पड़ता है।
- उदाहरण: चुनावों के बाद ईंधन उपयोग एवं विदेशी यात्रा कम करने की अपील में देरी की गई।
अचानक लागू की गई मितव्ययिता उपायों के परिणाम
- माँग में गिरावट: अचानक लागू किए गए मितव्ययिता उपाय घरेलू उपभोग को कम करते हैं तथा आर्थिक विकास की गति को धीमा कर देते हैं।
- कृषि उत्पादन पर प्रभाव: उर्वरकों के उपयोग में तत्काल कटौती से कृषि उत्पादकता घट सकती है तथा खाद्य मुद्रास्फीति बढ़ सकती है।
- उदाहरण: प्रधानमंत्री द्वारा रासायनिक उर्वरकों के उपयोग को कम करने की अपील ऐसे समय की गई जब अल-नीनो पहले ही फसल उत्पादन के लिए खतरा बना हुआ था।
- सोने की ओर झुकाव: वित्तीय बाजारों में संरचनात्मक विश्वास स्थापित किए बिना लगाए गए प्रतिबंधात्मक सुझाव लोगों के व्यवहार में अपेक्षित परिवर्तन नहीं ला पाते हैं।
- उदाहरण: सोने की खरीद कम करने की अपील प्रभावी नहीं हो सकती, क्योंकि अनिश्चितता के समय परिवार सोने को सुरक्षित परिसंपत्ति मानते हैं।
- आयात संबंधी दबाव: पर्याप्त घरेलू आपूर्ति सुनिश्चित किए बिना “स्थानीय खरीदें” अभियान चलाने से वस्तुओं की कमी एवं कीमतों में वृद्धि हो सकती है।
- कॉरपोरेट क्षेत्र में मंदी: अचानक मितव्ययिता के संकेत निजी निवेश एवं व्यावसायिक विश्वास को कमजोर कर देते हैं।
आगे की राह
- समय रहते संकेत देना: सरकारों को राजनीतिक सुविधा के लिए चेतावनियों को टालने के बजाय जोखिमों के बारे में समय पर जानकारी देनी चाहिए।
- उदाहरण: चुनावों से पहले ईंधन संरक्षण संबंधी समयबद्ध परामर्श बाद के आर्थिक झटकों को कम कर सकते थे।
- क्रमिक मूल्य निर्धारण: ईंधन एवं सब्सिडी सुधारों को टालकर अचानक लागू करने के बजाय चरणबद्ध तरीके से लागू किया जाना चाहिए।
- उदाहरण: चुनावों के बाद अचानक मूल्य वृद्धि की तुलना में ईंधन कीमतों में मासिक संतुलित संशोधन अधिक उपयुक्त हैं।
- राजकोषीय सुरक्षा कवच: विदेशी झटकों का सामना करने के लिए भंडार एवं राजकोषीय सुरक्षा तंत्र को मजबूत करना आवश्यक है, ताकि घबराहट में कठोर कदम उठाने की आवश्यकता न पड़े।
- उदाहरण: RBI का भंडार प्रबंधन तथा FRBM सिद्धांतों के अंतर्गत राजकोषीय अनुशासन आर्थिक लचीलापन प्रदान करते हैं।
- लक्षित सहायता: व्यापक लोकलुभावन सब्सिडियों के बजाय कमजोर वर्गों को प्रत्यक्ष सहायता प्रदान की जानी चाहिए।
- उदाहरण: LPG एवं खाद्य सहायता हेतु प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT), सार्वभौमिक मूल्य नियंत्रण की तुलना में अधिक प्रभावी है।
- आपूर्ति संबंधी सुधार: दीर्घकालिक लचीलापन सुनिश्चित करने के लिए ऊर्जा, खाद्य एवं विनिर्माण क्षेत्रों में घरेलू क्षमता निर्माण आवश्यक है।
- उदाहरण: PLI योजनाएँ एवं नवीकरणीय ऊर्जा का विस्तार अस्थिर वैश्विक बाजारों पर निर्भरता कम करते हैं।
निष्कर्ष
समष्टि आर्थिक विवेक समय पर लिए गए निर्णयों की माँग करता है, न कि राजनीतिक सुविधा के लिए किए गए विलंब की। संकट की स्थितियों में सुधारों को टालना और बाद में अचानक मितव्ययिता लागू करना कमजोरियों को और बढ़ा देता है। स्थिर शासन के लिए पारदर्शी कार्रवाई, क्रमिक सुधार तथा दीर्घकालिक आर्थिक लचीलापन आवश्यक है।