Q. POSH अधिनियम, 2013 को प्रगतिशील कानून के रूप में मान्यता दी जाती है, फिर भी कार्यस्थलों पर इसका कार्यान्वयन असंगत बना हुआ है। यौन उत्पीड़न के पीड़ितों के लिए न्याय में बाधा उत्पन्न करने वाली प्रमुख संरचनात्मक और प्रक्रियात्मक कमियों का विश्लेषण कीजिए। (10 अंक, 150 शब्द)

प्रश्न की मुख्य माँग

  • संरचनात्मक कमियाँ।
  • प्रक्रियात्मक कमियाँ।
  • पीड़ितों को न्याय दिलाने के तरीके।

उत्तर

यद्यपि POSH अधिनियम, 2013 कार्यस्थलों पर सुरक्षित वातावरण सुनिश्चित करने वाला एक महत्त्वपूर्ण  कानून है, फिर भी विविध संस्थानों में न्याय का समान क्रियान्वयन सुनिश्चित करने में इसे निरंतर चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। विशेषकर जब भावनात्मक दबाव, डिजिटल उत्पीड़न तथा शक्ति-असंतुलन जैसी स्थितियाँ शिकायत दर्ज करने, साक्ष्य जुटाने तथा निष्पक्ष जाँच को कमजोर करती हैं।

संरचनात्मक कमियाँ

  • अपरिभाषित “सूचित सहमति”: प्रभाव, धोखे या अधिकार-असमानता के कारण प्राप्त सहमति को अधिनियम में मान्यता नहीं है।
    • उदाहरण: शिक्षित एवं प्रभावशाली व्यक्ति भरोसा, अधिकार और अधूरी जानकारी का दुरुपयोग कर उत्पीड़न को सहमति-आधारित व्यवहार के रूप में प्रस्तुत कर देते हैं।
  • भावनात्मक एवं डिजिटल उत्पीड़न पर मौन:  मनोवैज्ञानिक दबाव तथा डिजिटल माध्यम से होने वाला उत्पीड़न स्पष्ट कानूनी परिभाषा से बाहर है, जिससे संरक्षण कमजोर होता है।
    • उदाहरण: भावनात्मक छल, अदृश्य संदेश, एन्क्रिप्टेड चैट जैसे डिजिटल साक्ष्य जाँच में कठिनाई पैदा करते हैं, क्योंकि अपराधी “कानूनी रूप से अस्पष्ट क्षेत्र” में कार्य करते हैं।
  • अंतर-संस्थागत शिकायत तंत्र का अभाव:  कई परिसरों या संगठनों में फैले दुर्व्यवहार को जोड़कर सुनवाई करने की कोई व्यवस्था नहीं है, जिससे बार-बार अपराध करने वालों को लाभ मिलता है।
    • उदाहरण: आगंतुक फैकल्टी के विरुद्ध दुर्व्यवहार को ट्रैक करने का POSH अधिनियम में “कोई तंत्र नहीं है”।

प्रक्रियागत कमियाँ

  • शिकायत दर्ज करने की सीमित समय सीमा: न्याय को समय सीमा में बाँधना उपयुक्त नहीं, विशेषकर विश्वविद्यालयों में जहाँ आघात वर्षों में उभरता है।
    • उदाहरण: 3 माह की समय सीमा उन पीड़िताओं को रोकती है, जो देर से वास्तविकता समझती हैं या साहस जुटाती हैं।
  • साक्ष्य संबंधी अत्यधिक बोझ पीड़िता पर:  अस्पष्ट परिभाषाओं के कारण प्रत्यक्ष साक्ष्य की माँग होती है, जो व्यावहारिक उत्पीड़न के मामलों में अक्सर उपलब्ध नहीं होते, जिससे शिकायत खारिज हो जाती है।
  • “दुर्भावनापूर्ण शिकायत” दंड का भय:  झूठे मामलों को रोकने हेतु बनाई गई यह धारा असल पीड़िताओं को डराती है तथा रिपोर्टिंग को हतोत्साहित करती है।
    • उदाहरण: यह प्रावधान पीड़िताओं को “पुनः-आघात” पहुँचाता है।

पीड़िताओं को न्याय दिलाने के उपाय

  • कानूनी परिभाषाएँ विस्तृत करना:  सूचित सहमति, भावनात्मक छल, डिजिटल उत्पीड़न जैसी श्रेणियों को स्पष्ट रूप से शामिल किया जाए तथा प्रत्यक्ष साक्ष्य से परे व्यावहारिक पैटर्न को भी मान्यता दी जाए।
    • उदाहरण: रिश्तों में धोखे को उत्पीड़न के रूप में मान्यता देने से सूक्ष्म दुर्व्यवहार को भी शामिल किया जा सकेगा।
  • शिकायत दर्ज अवधि बढ़ाना:  3 माह की समय सीमा को हटाया/शिथिल किया जाए, ताकि विलंबित रिपोर्टिंग से अपराधी दंड-मुक्त न हो सकें।
    • उदाहरण: शैक्षणिक परिसरों में पीड़िताएँ अक्सर कई सेमेस्टर बाद साहस और साक्ष्य जुटा पाती हैं।
  • आंतरिक शिकायत समिति (ICC) को मजबूत करना: अनिवार्य विधिक-तकनीकी प्रशिक्षण और बाहरी विशेषज्ञों के पैनल की व्यवस्था की जाए।
    • उदाहरण: बेहतर प्रशिक्षित ICC एन्क्रिप्टेड डिजिटल संचार एवं व्यावहारिक पैटर्न को सक्षम रूप से समझ सकेगी।
  • अंतर-संस्थागत शिकायत तंत्र विकसित करना: गतिशीलता वाले पेशों में बार-बार अपराध करने वालों को ट्रैक करने हेतु संयुक्त तंत्र की स्थापना आवश्यक है।
  • पीड़िता-केंद्रित प्रक्रियाएँ: भय उत्पन्न करने वाली भाषा हटाई जाए (“प्रतिवादी” की जगह “आरोपित” जैसे सरल शब्द), प्रतिशोध से सुरक्षा दी जाए और मनोवैज्ञानिक सहयोग अनिवार्य किया जाए।
    • उदाहरण: “दुर्भावनापूर्ण शिकायत” दंड हटाने से पीड़िताएँ प्रक्रिया के दौरान पुनः-आघात से बच सकेंगी।

निष्कर्ष

POSH अधिनियम को प्रभावी और न्यायसंगत बनाने के लिए आवश्यक है कि इसकी परिभाषाएँ विस्तृत हों, शिकायत-अवधि यथार्थपरक हो, पीड़िताओं की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए तथा ICC की क्षमता को सुदृढ़ किया जाए। डिजिटल और भावनात्मक उत्पीड़न को स्पष्ट रूप से मान्यता देने के साथ-साथ संस्थानों को सक्षम उपकरण तथा स्पष्ट जवाबदेही प्रदान करनी होगी, ताकि प्रत्येक कार्यस्थल गरिमा, सुरक्षा एवं समान अवसरों का वातावरण सुनिश्चित कर सके।

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