प्रश्न की मुख्य माँग
- युद्धोत्तर ईरान के पुनरुत्थान के भू-राजनीतिक निहितार्थ।
- आर्थिक निहितार्थ।
- पुनर्संतुलित रणनीति।
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उत्तर
परिचय
हालिया अमेरिका–इजरायल संघर्ष के बाद ईरान का अस्तित्व बनाए रखना तथा उसकी सुदृढ़ होती स्थिति पश्चिम एशिया के सामरिक परिदृश्य में एक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन का संकेत है। निरंतर सैन्य दबाव के बावजूद ईरान ने अपनी प्रशासनिक स्थिरता बनाए रखी, जवाबी कार्रवाई करने की क्षमता का प्रदर्शन किया तथा क्षेत्रीय स्तर पर अपना प्रभाव और अधिक सुदृढ़ किया। इससे खाड़ी क्षेत्र की अमेरिका-केंद्रित सुरक्षा संरचना के समक्ष चुनौती उत्पन्न हुई है और भारत के लिए अपनी संतुलनकारी रणनीति का पुनर्मूल्यांकन करना आवश्यक हो गया है।
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ईरान के पुनरुत्थान के भू-राजनीतिक निहितार्थ
- अमेरिका-केंद्रित सुरक्षा प्रभुत्व में कमी: इस संघर्ष ने खाड़ी देशों की सुरक्षा सुनिश्चित करने में बाह्य सुरक्षा गारंटी की परिकल्पना को सुभेद्य बना दिया है।
- उदाहरण: क्षेत्र में स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर ईरान के हमलों ने अमेरिका के अटूट सुरक्षा कवच की धारणा को कमजोर किया।
- ईरान के क्षेत्रीय प्रभाव का सुदृढ़ होना: सैन्य दबाव का सामना करने की ईरान की क्षमता ने पश्चिम एशिया के देशों के साथ उसकी सौदेबाजी की शक्ति को बढ़ाया है।
- उदाहरण: संघर्ष के बाद सऊदी अरब, कतर एवं इराक जैसे देशों ने तेहरान के साथ अपने संवाद एवं संपर्क को बढ़ाया है।
- खाड़ी क्षेत्र की सुरक्षा रणनीति में परिवर्तन: क्षेत्रीय देश केवल संघर्ष पर निर्भर रहने के बजाय ईरान के साथ समायोजन की नीति अपना सकते हैं।
- उदाहरण: हालिया संघर्षों के बाद खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) की ईरान-विरोधी पारंपरिक संतुलन नीति का पुनर्मूल्यांकन किया जा रहा है।
- चीन एवं रूस की क्षेत्रीय भूमिका का विस्तार: गैर-पश्चिमी शक्तियों के साथ ईरान की निकटता बहुध्रुवीय पश्चिम एशिया के उदय को गति दे सकती है।
- उदाहरण: खामेनेई के अंतिम संस्कार में चीन, रूस एवं सऊदी अरब के प्रतिनिधिमंडलों की उपस्थिति, तेहरान की विस्तारित कूटनीतिक साझेदारियों को दर्शाती है।
ऊर्जा एवं कनेक्टिविटी के लिए आर्थिक निहितार्थ
- ऊर्जा सुरक्षा संबंधी अनिश्चितता: ईरान के आसपास की अस्थिरता का सीधा प्रभाव वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति मार्गों, विशेषकर हॉर्मुज जलडमरूमध्य पर पड़ता है।
- उदाहरण: हॉर्मुज जलडमरूमध्य में किसी भी प्रकार का व्यवधान भारत के कच्चे तेल की आपूर्ति को प्रभावित कर सकता है, क्योंकि भारत की ऊर्जा आपूर्ति का एक बड़ा हिस्सा खाड़ी क्षेत्र के समुद्री मार्गों से संबंधित है।
- ईरान के आर्थिक पुनरुत्थान की संभावना: प्रतिबंधों में राहत, तेल निर्यात में वृद्धि तथा विदेशी परिसंपत्तियों तक पहुँच से ईरान की अर्थव्यवस्था को मजबूती मिल सकती है।
- उदाहरण: प्रतिबंधों में ढील के बाद कच्चे तेल के निर्यात में वृद्धि, वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति की गतिशीलता को प्रभावित कर सकती है।
- क्षेत्रीय कनेक्टिविटी का सामरिक महत्त्व: भारत की क्षेत्रीय कनेक्टिविटी संबंधी महत्त्वाकांक्षाओं के लिए ईरान की भौगोलिक स्थिति अत्यंत महत्त्वपूर्ण बनी हुई है।
- उदाहरण: ईरान में स्थित चाबहार बंदरगाह भारत को पाकिस्तान को बायपास करते हुए अफगानिस्तान एवं मध्य एशिया तक पहुँच प्रदान करता है।
भारत की बहु-संरेखण रणनीति का पुनर्संतुलन
- ईरान और इजरायल के साथ संतुलित संबंध बनाए रखना: भारत को पश्चिम एशिया के किसी एक गुट के साथ अत्यधिक निकटता से बचते हुए संतुलित नीति अपनानी चाहिए।
- उदाहरण: इजरायल के साथ रक्षा सहयोग जारी रखते हुए तेहरान के साथ कूटनीतिक संवाद भी बनाए रखना चाहिए।
- ऊर्जा सुरक्षा एवं प्रवासी भारतीयों के हितों की रक्षा: भारत की ऊर्जा निर्भरता तथा विदेशों में कार्यरत भारतीयों के कारण खाड़ी क्षेत्र की स्थिरता अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
- उदाहरण: 80 लाख से अधिक भारतीय खाड़ी देशों में निवास करते हैं, जिससे क्षेत्रीय स्थिरता भारत की सामरिक प्राथमिकता बन जाती है।
- क्षेत्रीय कनेक्टिविटी साझेदारियों को पुनर्जीवित करना: ईरान को शामिल करते हुए वैकल्पिक व्यापार एवं परिवहन गलियारों को सुदृढ़ किया जाए।
- उदाहरण: चाबहार बंदरगाह तथा अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा (INSTC) के विकास में तेजी लाकर यूरेशिया तक भारत की पहुँच को सुदृढ़ किया जा सकता है।
- ग्लोबल साउथ में भारत की विश्वसनीयता को सुदृढ़ करना: पश्चिम एशिया के संघर्षों पर भारत को स्वतंत्र एवं संतुलित रुख बनाए रखना चाहिए, जिससे उसकी कूटनीतिक विश्वसनीयता बनी रहे।
- उदाहरण: फिलिस्तीन के मुद्दे पर अपनी पारंपरिक प्रतिबद्धता तथा इजरायल के साथ संबंधों के बीच संतुलन बनाए रखना, ग्लोबल साउथ में भारत की व्यापक भूमिका को दर्शाता है।
आगे की राह
- संतुलित सामरिक स्वायत्तता अपनाना: कठोर भू-राजनीतिक संरेखण के बजाय मुद्दा-आधारित साझेदारियों को प्राथमिकता दी जाए।
- उदाहरण: इजरायल के साथ रक्षा सहयोग बनाए रखते हुए ईरान के साथ ऊर्जा एवं कनेक्टिविटी संबंधों को भी संरक्षित रखा जाए।
- ऊर्जा सुरक्षा तंत्र में विविधीकरण: अनेक आपूर्तिकर्ताओं तथा सामरिक पेट्रोलियम भंडार के माध्यम से खाड़ी क्षेत्र में संभावित व्यवधानों पर निर्भरता कम की जाए।
- क्षेत्रीय कनेक्टिविटी परियोजनाओं को पुनर्जीवित करना: व्यापक यूरेशियाई एकीकरण के लिए ईरान की भौगोलिक स्थिति का प्रभावी उपयोग किया जाए।
- उदाहरण: चाबहार बंदरगाह तथा अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा (INSTC) परियोजनाओं को शीघ्रता से पूर्ण करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
- पश्चिम एशिया में कूटनीतिक सक्रियता बढ़ाना: भारत को ईरान, इजरायल, खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) के देशों तथा उभरते क्षेत्रीय समूहों के साथ समानांतर रूप से सक्रिय संवाद बनाए रखना चाहिए।
- उदाहरण: भारत–संयुक्त अरब अमीरात की सामरिक साझेदारी के साथ-साथ भारत–ईरान कनेक्टिविटी सहयोग को भी सुदृढ़ किया जाए।
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निष्कर्ष
युद्धोत्तर ईरान का पुनरुत्थान पश्चिम एशिया में अधिक बहुध्रुवीय एवं प्रतिस्पर्द्धी सामरिक व्यवस्था के उभरने का संकेत देता है। भारत के समक्ष चुनौती ईरान और इजराइल में से किसी एक का चयन करना नहीं, बल्कि बहु-संरेखण, ऊर्जा स्रोतों के विविधीकरण तथा कनेक्टिविटी-केंद्रित कूटनीति के माध्यम से सामरिक लचीलापन बनाए रखते हुए, तीव्रता से बदलते क्षेत्रीय परिदृश्य में अपने राष्ट्रीय हितों की प्रभावी सुरक्षा सुनिश्चित करना है।