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Q. बहुपक्षीय व्यापार समझौतों और वैश्विक आर्थिक शासन के भविष्य पर अमेरिकी सहयोगियों के साथ चीन की रणनीतिक साझेदारी के संभावित परिणामों का आकलन कीजिए। इन घटनाक्रमों के उत्तर में भारत को क्या रुख अपनाना चाहिए? (15 अंक, 250 शब्द)

April 17, 2025

GS Paper IIInternational Relations

प्रश्न की मुख्य माँग

  • बहुपक्षीय व्यापार समझौतों पर अमेरिकी सहयोगियों के साथ चीन की रणनीतिक साझेदारी के संभावित परिणामों का उल्लेख कीजिए।
  • वैश्विक आर्थिक शासन पर अमेरिकी सहयोगियों के साथ चीन की रणनीतिक साझेदारी के संभावित परिणामों का उल्लेख कीजिए।
  • इन घटनाक्रमों के जवाब में भारत को क्या रुख अपनाना चाहिए?

उत्तर

यूरोपीय संघ, ऑस्ट्रेलिया और प्रमुख ASEAN देशों जैसे अमेरिकी सहयोगियों के साथ चीन की बढ़ती आर्थिक भागीदारी, वैश्विक व्यापार में रणनीतिक पुनर्संतुलन का प्रतिनिधित्व करती है। इन साझेदारियों का बहुपक्षीय व्यापार गतिशीलता और वैश्विक आर्थिक शासन की संरचना के लिए महत्त्वपूर्ण निहितार्थ हैं।

बहुपक्षीय व्यापार समझौतों पर संभावित परिणाम

  • वैश्विक व्यापार का विखंडन: द्विपक्षीय और क्षेत्रीय व्यापार सौदों का प्रसार, विशेष रूप से चीन द्वारा संचालित सौदे, विश्व व्यापार संगठन (WTO) के अधिकार को कम कर सकते हैं। अलग-अलग नियमों और मानकों के साथ प्रतिस्पर्द्धी व्यापार प्रणालियाँ उभर सकती हैं।
    • उदाहरण के लिए: चीन की बेल्ट एंड रोड पहल (BRI) के कारण अनेक द्विपक्षीय व्यापार समझौते हुए हैं, जो विश्व व्यापार संगठन की रूपरेखा को दरकिनार कर देते हैं, जिससे वैश्विक व्यापार सुसंगतता कम हो जाती है।
  • अमेरिकी व्यापार मानदंडों का कमजोर होना: जैसे-जैसे चीन पारंपरिक अमेरिकी सहयोगियों पर आर्थिक प्रभाव प्राप्त कर रहा है, कई देश चीन की नीतियों के अनुरूप व्यापार ढाँचे को प्राथमिकता दे सकते हैं, जिससे वैश्विक व्यापार में अमेरिकी नेतृत्व कम हो सकता है।
    • उदाहरण के लिए: फिलीपींस और कई ASEAN देशों ने अमेरिका के सहयोगी होने के बावजूद चीन के साथ आर्थिक सहयोग बढ़ाया है, तथा भू-राजनीतिक तनावों के बावजूद व्यापार और निवेश पर ध्यान केंद्रित किया है।
  • चीन-केंद्रित ब्लॉकों की ओर परिवर्तन: अमेरिकी सहयोगियों के साथ चीन की बढ़ती साझेदारी, क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी (RCEP) जैसे ब्लॉकों को मजबूत कर सकती है, तथा USMCA या अब समाप्त हो चुके TPP जैसे अमेरिकी समर्थित समझौतों को हाशिए पर धकेल सकती है।
    • उदाहरण के लिए: RCEP, जिसमें चीन, जापान, दक्षिण कोरिया और ASEAN देश शामिल हैं, दुनिया का सबसे बड़ा व्यापार समूह है, जो अमेरिका की भागीदारी के बिना वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद के लगभग एक-तिहाई हिस्से को कवर करता है।
  • क्षेत्रवाद में वृद्धि: जैसे-जैसे बहुपक्षवाद कमजोर होगा, देश क्षेत्रीय या द्विपक्षीय समझौतों को प्राथमिकता दे सकते हैं, जिनसे तीव्र समझौते संभव हो पाते हैं और जो अनुरूप लाभ प्रदान कर सकते हैं। हालाँकि, यह वैश्विक व्यापार सहयोग को कमजोर करता है।
    • उदाहरण के लिए: भारत-UAE व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौता (CEPA) एक क्षेत्रीय समझौता है, जिसका उद्देश्य विश्व व्यापार संगठन जैसे वैश्विक मंचों पर निर्भर हुए बिना द्विपक्षीय व्यापार को बढ़ाना है।
  • बढ़ता संरक्षणवाद: बदलते गठबंधनों से संरक्षणवादी उपाय शुरू हो सकते हैं, क्योंकि राष्ट्र रणनीतिक स्वायत्तता को प्राथमिकता देंगें, जिसके परिणामस्वरूप टैरिफ, व्यापार युद्ध और प्रतिबंधों में वृद्धि हो सकती है।
    • उदाहरण के लिए: अमेरिका-चीन व्यापार युद्ध के कारण सैकड़ों अरब डॉलर मूल्य की वस्तुओं पर टैरिफ लगा दिया गया, जिससे वैश्विक व्यापार प्रवाह बाधित हुआ और अनिश्चितता बढ़ गई।
  • आपूर्ति शृंखलाओं पर प्रभाव: जैसे-जैसे राष्ट्र अपने गठबंधनों का पुनर्मूल्यांकन करते हैं, वे विरोधी भागीदारों पर निर्भरता कम करने के लिए आपूर्ति शृंखलाओं का मार्ग बदल सकते हैं। इस पुनर्संरेखण से लागत बढ़ सकती है और दक्षता कम हो सकती है।
    • उदाहरण के लिए: COVID-19 महामारी और चीन के साथ बढ़ते तनाव के बाद, अमेरिका और जापान सहित कई देशों ने अपनी आपूर्ति शृंखलाओं को चीन से हटाकर वियतनाम, भारत और मैक्सिको जैसे देशों में स्थानांतरित करना शुरू कर दिया।
  • उभरती अर्थव्यवस्थाओं का बहिष्कार: चीन के नेतृत्व वाले व्यापार समझौते चीन की बाजार पहुँच और शर्तों को प्राथमिकता देकर अन्य उभरती अर्थव्यवस्थाओं को दरकिनार कर सकते हैं। भारत जैसे देश, जिन्होंने RCEP से बाहर निकलने का विकल्प चुना है, उन्हें सीमित व्यापार अवसरों का सामना करना पड़ सकता है।
    • उदाहरण के लिए: चीनी वस्तुओं से बाजार भर जाने की चिंता के कारण भारत वर्ष 2019 में RCEP से हट गया, जिससे एशिया-प्रशांत व्यापार नेटवर्क में हाशिए पर जाने की आशंका उत्पन्न हो गई।

वैश्विक आर्थिक शासन पर संभावित परिणाम

  • शक्ति में बदलाव: चीन का बढ़ता प्रभाव IMF और विश्व बैंक जैसी अमेरिकी नेतृत्व वाली संस्थाओं को कमजोर कर सकता है, जिससे AIIB जैसे विकल्पों को बढ़ावा मिलेगा और वैश्विक आर्थिक शक्ति में बदलाव आएगा।
  • वैश्विक मानदंडों को कमजोर करना: चीन का उदय मुक्त बाजार के सिद्धांतों को चुनौती देता है, तथा राज्य-पूँजीवादी मॉडल को बढ़ावा देता है, जो बाजारों पर राज्य नियंत्रण को प्राथमिकता देता है।
  • अमेरिकी नेतृत्व वाली व्यवस्था का क्षरण: बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) जैसी चीन की पहल, पश्चिमी नेतृत्व वाली प्रणालियों को दरकिनार कर सकती है, जिससे चीन-केंद्रित वैश्विक शासन ढाँचे का निर्माण हो सकता है।
  • संस्थाओं के बीच प्रतिस्पर्द्धा: चीन के नेतृत्व वाले मंच वैश्विक आर्थिक शासन को खंडित कर सकते हैं, जिससे देश रणनीतिक हितों के आधार पर विभिन्न समूहों के साथ जुड़ सकते हैं।
  • वैश्विक मानकों में बदलाव: वैश्विक नेतृत्व के लिए चीन के प्रयास के परिणामस्वरूप नए आर्थिक मानक सामने आ सकते हैं, जिनमें उसके हितों को प्राथमिकता दी जाएगी, विशेष रूप से प्रौद्योगिकी और व्यापार के क्षेत्र में।
  • लोकतांत्रिक शासन के लिए चुनौतियाँ: चीन का प्रभाव, लोकतांत्रिक देशों की मानवाधिकारों और वैश्विक शासन में पारदर्शिता की वकालत करने की क्षमता में बाधा उत्पन्न कर सकता है।

इन घटनाक्रमों के जवाब में भारत को क्या रुख अपनाना चाहिए?

  • कूटनीतिक जुड़ाव को संतुलित करना: दोनों के साथ संबंधों को मजबूत करना, रणनीतिक स्वायत्तता सुनिश्चित करना, रक्षा, सुरक्षा और प्रौद्योगिकी पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। निष्पक्ष वैश्विक आर्थिक व्यवस्था की वकालत करने के लिए WTO, G20 और BRICS में सक्रिय रूप से भाग लेना चाहिए।
  • व्यापार संबंधों में विविधता लाना: चीन पर निर्भरता कम करने के लिए यूरोप, ASEAN और अफ्रीका के साथ व्यापार समझौते करना। बेहतर बाजार पहुँच के लिए RCEP और IPEF को मजबूत करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
  • आर्थिक प्रत्यास्थता को बढ़ावा देना: इलेक्ट्रॉनिक्स, फार्मा और नवीकरणीय ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में क्षमताओं का उन्नयन करना चाहिए। वैश्विक निवेश को आकर्षित करने के लिए बाजारों को अधिक प्रतिस्पर्द्धी बनाना चाहिए।
  • एशिया में चीन के प्रभाव का मुकाबला करना: वियतनाम, मलेशिया और थाईलैंड के साथ व्यापार और सुरक्षा संबंधों को मजबूत करना चाहिए। उभरती प्रौद्योगिकियों पर अमेरिका और यूरोप के साथ साझेदारी करना चाहिए।
  • बहुपक्षीय व्यापार वार्ता का लाभ उठाना: अनुचित चीनी व्यापार कार्रवाइयों को लक्षित करते हुए वैश्विक मंचों पर निष्पक्ष व्यवहार को बढ़ावा देना चाहिए इसके साथ ही  यह सुनिश्चित करना चाहिए कि WTO एक प्रभावी विवाद समाधान निकाय बना रहे।

चीन का बढ़ता आर्थिक प्रभाव वैश्विक व्यापार और शासन को बाधित कर सकता है, जिससे सत्ता चीन के नेतृत्व वाले ढाँचों की ओर स्थानांतरित हो सकती है। भारत को अमेरिका और चीन दोनों के साथ संबंधों को संतुलित करना चाहिए, व्यापार में विविधता लानी चाहिए और आर्थिक प्रत्यास्थता मजबूत करना चाहिए। भारत के हितों की रक्षा के लिए बहुपक्षीय मंचों में सक्रिय भागीदारी महत्त्वपूर्ण है।

Assess the potential consequences of China’s strategic partnerships with U.S. allies on the future of multilateral trade agreements and global economic governance. What stance should India adopt in response to these developments? in hindi

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