Q. हाल ही में, भारत के राष्ट्रपति ने ओल चिकी (Ol Chiki) लिपि का उपयोग करते हुए संथाली भाषा में भारत का संविधान जारी किया है। भाषाई न्याय और भारत में आदिवासी समुदायों के लोकतांत्रिक सशक्तिकरण के लिए इसके महत्त्व का विश्लेषण कीजिए। (10 अंक, 150 शब्द)

प्रश्न की मुख्य माँग

  • भाषायी न्याय और सशक्तीकरण के लिए महत्त्व 
  • संबंधित चिंताएँ।

उत्तर

भारत के राष्ट्रपति ने हाल ही में संथाली भाषा में, ओल चिकी (Ol Chiki) लिपि में लिखित भारत के संविधान का पहला संस्करण जारी किया है। यह पहल भारत की विविध भाषायी विरासत का सम्मान करने और आदिवासी क्षेत्रों में लोकतंत्र की जड़ों को मजबूत करने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम है।

भाषायी न्याय और सशक्तीकरण के लिए महत्त्व 

  • संवैधानिक साक्षरता सुनिश्चित करना: सर्वोच्च कानून का आदिवासी भाषा में अनुवाद करने से समुदाय भाषायी बाधाओं के बिना अपने मौलिक अधिकारों और कर्तव्यों को समझ सकता है।
    • उदाहरण: राज्य और नागरिकों के बीच यह सेतु संथाल आबादी के लिए “मेरी भाषा में मेरे अधिकार” सुनिश्चित करता है।
  • आदिवासी पहचान को मान्यता देना: पंडित रघुनाथ मुर्मू द्वारा निर्मित ओल चिकी लिपि का उपयोग एक विशिष्ट स्वदेशी सांस्कृतिक और बौद्धिक इतिहास को राज्य की औपचारिक मान्यता प्रदान करता है।
    • उदाहरण: संथाली को 92वें संशोधन (वर्ष 2003) के माध्यम से आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया था और इस संशोधन से इस स्थिति को और मजबूती मिली है।
  • लोकतांत्रिक उपनिवेशवाद से मुक्ति: औपनिवेशिक भाषा पर आधारित कानूनी ढाँचे से हटकर, दूरस्थ नागरिकों को लोकतांत्रिक प्रक्रिया में आत्मविश्वास के साथ भाग लेने का अधिकार मिलता है।
    • उदाहरण: यह कदम प्रस्तावना में दिए गए “समान दर्जे” के वादे के अनुरूप है, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि अंग्रेजी-हिंदी के प्रभुत्व के कारण आदिवासी आवाजों को हाशिए पर न डाला जाए।
  • कानूनी सशक्तीकरण: यह कानूनी अवधारणाओं को सरल बनाता है, जिससे आदिवासी समूहों को न्यायिक प्रणाली को बेहतर ढंग से समझने और अपने अधिकारों की रक्षा करने में मदद मिलती है।
    • उदाहरण: इससे समुदाय को पाँचवीं अनुसूची और पेसा (अनुसूचित क्षेत्रों में पंचायत विस्तार) अधिनियम जैसे प्रावधानों को बेहतर ढंग से समझने में मदद मिलती है।

संबंद्ध चिंताएँ

  • लिपि-ज्ञान की सीमाएँ: आधिकारिक दर्जे के बावजूद, असमान शैक्षिक व्यवस्थाओं के कारण संथाल जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा ओल चिकी लिपि में औपचारिक साक्षरता से वंचित हो सकता है।
  • कार्यान्वयन में कमियाँ: केवल संविधान का अनुवाद करने से यह स्वतः सुनिश्चित नहीं हो जाता कि स्थानीय अधिकारी या पुलिस आदिवासी नागरिकों के साथ दैनिक प्रशासनिक कार्य में उस भाषा का उपयोग करेंगे।
  • डिजिटल डिवाइड की बाधाएँ: दूरस्थ जनजातीय बस्तियों में कमजोर इंटरनेट और स्मार्टफोन की कमी के कारण इन दस्तावेज के डिजिटल संस्करणों तक पहुँच सीमित रह सकती है।
  • संरक्षण बनाम उपयोग: यदि इन पहलों को राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अंतर्गत प्राथमिक शिक्षा में एकीकृत नहीं किया गया, तो इनके प्रतीकात्मक “संग्रहालयीय वस्तु” बनकर रह जाने का जोखिम है।
    • उदाहरण: राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 मातृभाषा में शिक्षण का निर्देश देती है, परंतु ओल चिकी के लिए इसका कार्यान्वयन धीमा है।

निष्कर्ष

संथाली में संविधान का अनुवाद भाषायी न्याय का एक महत्त्वपूर्ण साधन है, जो विधिक दस्तावेज को जनजातीय समुदायों के लिए जीवंत वास्तविकता में रूपांतरित करता है। वास्तविक सशक्तीकरण हेतु आवश्यक है कि इसके साथ सशक्त शैक्षणिक परिवर्तन और प्रशासनिक सुधार हों, ताकि भारत भर में न्यायालयों, विद्यालयों और स्थानीय शासन में जनजातीय भाषाओं का प्रभावी उपयोग सुनिश्चित किया जा सके।

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