प्रश्न की मुख्य माँग
- बढ़ते राजकोषीय संतुलन से सहकारी संघवाद कैसे कमजोर हो रहा है।
- बढ़ते राजकोषीय संतुलन से प्रतिस्पर्धी संघवाद कैसे कमजोर हो रहा है।
- सुझावात्मक उपाय।
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उत्तर
भारत की संघीय संरचना केंद्र और राज्यों के बीच एक सूक्ष्म राजकोषीय संतुलन पर आधारित है। हालाँकि, उपकर (Cesses), अधिभार (Surcharges), और ऋण प्रतिबंधों के माध्यम से बढ़ती केंद्रीकरण प्रवृत्ति ने राज्यों की राजकोषीय स्वायत्तता को कमजोर किया है। इससे संविधान द्वारा परिकल्पित सहकारी और प्रतिस्पर्द्धी संघवाद दोनों की भावना प्रभावित हो रही है।
सहकारी संघवाद पर बढ़ते राजकोषीय असंतुलन का प्रभाव
- कराधान शक्तियों का केंद्रीकरण: वस्तु एवं सेवा कर (GST) की शुरुआत से प्रमुख कराधान शक्तियाँ राज्यों से GST परिषद को स्थानांतरित हो गईं, जहाँ केंद्र का प्रभाव अधिक है।
- उदाहरण: GST लागू होने के बाद राज्यों ने प्रवेश कर (Entry Tax) और स्थानीय उपकर जैसे राजस्व स्रोत खो दिए।
- कर हिस्सेदारी में गिरावट: वित्त आयोग की सिफारिशों के बावजूद राज्यों को सकल कर राजस्व का वास्तविक हिस्सा घोषित 41% से कम मिल रहा है।
- उदाहरण: उपकर और अधिभार जो साझा नहीं किए जाते राज्यों की वास्तविक हिस्सेदारी को घटा रहे हैं।
- केंद्रीय हस्तांतरण पर निर्भरता: राज्यों की राजस्व व्यवस्था केंद्रीय अनुदानों पर अत्यधिक निर्भर होती जा रही है, जिससे वे नीतिगत विलंब और राजनीतिक पक्षपात के प्रति संवेदनशील बनते हैं।
- उदाहरण: कई राज्यों के कुल राजस्व का 44% से अधिक हिस्सा केंद्रीय हस्तांतरणों से आता है बिहार में यह 72% तक पहुँच जाता है।
- राजकोषीय स्वायत्तता में कमी: केंद्रीय प्रायोजित योजनाओं (CSS) की बढ़ती संख्या ने राज्यों की व्यय स्वायत्तता सीमित कर दी है।
- उदाहरण: स्वास्थ्य और शिक्षा क्षेत्रों में CSS के विस्तार ने खर्च का बोझ बढ़ाया है परंतु निर्णय स्वायत्तता नहीं दी।
- संस्थागत कमजोरी: वित्त आयोग और GST परिषद में केंद्र का प्रभुत्व समान भागीदारी की भावना को कमजोर करता है।
- उदाहरण: राज्यों की शिकायत कि जनसंख्या नियंत्रण और कर दक्षता में बेहतर प्रदर्शन करने पर उन्हें वित्तीय रूप से दंडित किया जाता है।
प्रतिस्पर्द्धी संघवाद पर प्रभाव
- असमान संसाधन आधार: समृद्ध राज्य अधिक कर एकत्र करते हैं लेकिन उन्हें केंद्रीय हस्तांतरण में अनुपातिक रूप से कम लाभ मिलता है, जिससे प्रतिस्पर्धात्मक विकास क्षमता घटती है।
- विकृत प्रोत्साहन संरचना: केंद्रीय अनुदानों पर अत्यधिक निर्भरता राज्यों को अपने स्वयं के कर संग्रह सुधारने से हतोत्साहित करती है।
- राजकोषीय अनिश्चितता: केंद्रीय निधियों की अनियमित उपलब्धता राज्यों की दीर्घकालिक योजना और प्रतिस्पर्धात्मकता को बाधित करती है।
- उदाहरण: कोविड-19 के दौरान GST मुआवजा भुगतान में देरी से कई राज्यों में तरलता संकट उत्पन्न हुआ।
- नीतिगत नवाचार में कमी: सीमित राजकोषीय स्वतंत्रता के कारण राज्य स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप नवोन्मेषी नीतियाँ नहीं बना पाते।
- राजनीतिक केन्द्रीकरण: वित्तीय निर्भरता राज्यों की सौदेबाजी क्षमता को घटाती है, जिससे सहकारी प्रतिस्पर्धा का संतुलन बिगड़ता है।
- उदाहरण: विपक्ष शासित राज्यों द्वारा भेदभावपूर्ण वित्तीय आवंटन की बार-बार शिकायतें।
राज्यों की राजकोषीय स्वायत्तता बढ़ाने के उपाय
- GST संरचना में सुधार: GST परिषद में राज्यों को समान मतदान अधिकार दिया जाए और कुछ राज्य-स्तरीय करों को पुनः लागू किया जाए ताकि राजस्व विविधता बढ़ सके।
- उपकर और अधिभार को विभाज्य पूल में मिलाना: इससे कुल केंद्रीय राजस्व का समान वितरण सुनिश्चित होगा और राज्यों की आय पूर्वानुमेय बनेगी।
- राज्यों को अधिभार या अतिरिक्त कर लगाने की शक्ति देना: राज्यों को व्यक्तिगत आयकर या GST पर सीमित अधिभार लगाने की अनुमति दी जाए ताकि राजकोषीय लचीलापन बढ़े।
- वित्त आयोग के मानदंडों में सुधार: ऐसा स्थिर और पारदर्शी सूत्र अपनाया जाए जो राजकोषीय जिम्मेदारी और नवाचार को प्रोत्साहित करे तथा राजनीतिक विवेकाधिकार घटाए।
- राजकोषीय पारदर्शिता और विकेंद्रीकरण को बढ़ावा देना: नियमित केंद्र-राज्य संवाद और स्वतंत्र निगरानी तंत्र स्थापित किए जाएँ।
निष्कर्ष
राज्यों की राजकोषीय स्वतंत्रता का क्षरण न केवल सहकारी संघवाद को बल्कि प्रतिस्पर्द्धी संघवाद की भावना को भी कमजोर करता है। राज्यों को पूर्वानुमेय, पारदर्शी और लचीले राजस्व तंत्र प्रदान करना एक मजबूत, आत्मनिर्भर संघीय व्यवस्था के लिए आवश्यक है। विकेन्द्रीकृत निर्णय-प्रक्रिया और राजकोषीय विश्वास की पुनर्स्थापना से भारत का संघीय ढाँचा और अधिक संतुलित और सशक्त बन सकता है।