Q. 'एक राष्ट्र, एक चुनाव' (ONOE) का प्रस्ताव लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनावों को एक साथ कराने का प्रयास करता है। भारत में संसदीय लोकतंत्र, संघवाद और विधायी जवाबदेही के लिए इसके संवैधानिक निहितार्थों का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)

प्रश्न की मुख्य माँग

  • भारत में संसदीय लोकतंत्र पर संवैधानिक प्रभावों की चर्चा कीजिए।
  • भारत में संघवाद पर संवैधानिक प्रभावों का वर्णन कीजिए।
  • भारत में विधायी जवाबदेही पर संवैधानिक प्रभावों का उल्लेख कीजिए।

उत्तर

“एक राष्ट्र, एक चुनाव” का प्रस्ताव लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनावों को समकालिक करने का प्रयास करता है, जिसे संविधान (एक सौ उनतीसवाँ संशोधन) विधेयक, 2024 के माध्यम से प्रस्तावित किया गया है। यद्यपि इसका उद्देश्य प्रशासनिक दक्षता को बढ़ाना है, किंतु यह भारत में संसदीय लोकतंत्र, संघवाद और विधायी जवाबदेही से संबंधित महत्त्वपूर्ण संवैधानिक चिंताओं को भी उत्पन्न करता है। 

Also Read | UPSC Result 2025

भारत में संसदीय लोकतंत्र पर संवैधानिक प्रभाव

  • अर्द्ध-राष्ट्रपति प्रणाली की ओर झुकाव: चुनावी चक्रों के समकालिक होने से संसदीय लोकतंत्र की वह लचीलापन कम हो सकती है, जिसमें सरकारें विधायिका के विश्वास पर निर्भर रहती हैं।
    • उदाहरण: संविधान के अनुच्छेद-75 और 164 कार्यपालिका की विधायिका के प्रति सामूहिक उत्तरदायित्व को स्थापित करते हैं।
  • लचीली कार्यावधि का क्षरण: संविधान केवल अधिकतम पाँच वर्ष की अवधि प्रदान करता है, जिससे राजनीतिक विश्वास समाप्त होने पर सदन को समय से पहले भंग किया जा सकता है।
    • उदाहरण: अनुच्छेद-83 और 172 निश्चित अवधि के बजाय अधिकतम कार्यकाल का प्रावधान करते हैं।
  • लोकतांत्रिक जनादेश का संकुचन: एक राष्ट्र, एक चुनाव के कारण राष्ट्रीय चुनावों के साथ तालमेल बैठाने के लिए निर्वाचित राज्य विधानसभाओं की अवधि को कम किया जा सकता है।
    • उदाहरण: प्रस्तावित अनुच्छेद-82A विधानसभाओं की अवधि को लोकसभा चुनावों के साथ समकालिक करने के लिए घटाने की अनुमति देता है।
  • निर्वाचन जनादेश का विकृतिकरण: मध्यावधि में होने वाले “अपूर्ण अवधि के चुनाव” ऐसे सरकारों को जन्म दे सकते हैं, जिनका जनादेश छोटा हो और नीति क्षमता सीमित हो।
    • उदाहरण: संशोधन विधेयक के अनुसार नई निर्वाचित विधानसभाएँ भंग सदन की शेष अवधि तक ही कार्य करेंगी।
  • शासन में अस्थिरता: शेष अवधि के लिए बनी सरकारें संरचनात्मक सुधारों से बच सकती हैं और अल्पकालिक लोकलुभावन उपायों पर अधिक निर्भर हो सकती हैं। 

भारत में संघवाद पर संवैधानिक प्रभाव

  • राज्य स्वायत्तता का क्षरण: समकालिक चुनाव राज्य की राजनीतिक समय-सारिणी को राष्ट्रीय चुनावी चक्र के अधीन कर सकते हैं।
  • राज्य विधानसभाओं के जनादेश का संकुचन: यदि विधानसभाओं की अवधि को कम किया जाता है तो राज्यों की स्वतंत्र लोकतांत्रिक समय-सीमा प्रभावित हो सकती है।
    • उदाहरण: प्रस्तावित अनुच्छेद-82A के अंतर्गत राज्य विधानसभाओं की अवधि को कम किया जा सकता है।
  • केंद्र के हस्तक्षेप की संभावनाओं में वृद्धि: चुनाव स्थगन की शक्तियाँ राज्यों पर केंद्र के नियंत्रण को बढ़ा सकती हैं।
    • उदाहरण: प्रस्तावित अनुच्छेद-82A(5) के अनुसार, भारत निर्वाचन आयोग राज्य चुनावों को स्थगित करने की अनुशंसा कर सकता है।
  • राष्ट्रपति शासन की अवधि बढ़ने की संभावना: राज्य चुनावों में विलंब होने से राज्यों में केंद्रीय शासन की अवधि लंबी हो सकती है।
  • राष्ट्रीय राजनीतिक लहरों का राज्य चुनावों पर प्रभाव: एक साथ चुनाव होने से राष्ट्रीय मुद्दे क्षेत्रीय चिंताओं पर हावी हो सकते हैं, जिससे राज्यों के विशिष्ट मुद्दों की अनदेखी हो सकती है।

भारत में विधायी जवाबदेही पर संवैधानिक प्रभाव

  • निर्वाचकीय प्रतिक्रिया की आवृत्ति में कमी: वर्तमान में चरणबद्ध चुनाव नागरिकों को समय-समय पर सरकारों के प्रदर्शन का आकलन करने का अवसर प्रदान करते हैं। समकालिक चुनावों से यह अवसर कम हो सकता है।
  • समकालिकता के दौरान संसदीय कार्यप्रणाली की सीमाएँ: समकालिक चुनावों की प्रतीक्षा कर रही कार्यवाहक सरकारों को संवैधानिक सीमाओं का सामना करना पड़ सकता है।
    • उदाहरण: अनुच्छेद-85 के अनुसार, संसद की बैठक हर छह महीने के भीतर होना अनिवार्य है।
  • राजकोषीय शासन में बाधाएँ: कार्यवाहक सरकार पूर्ण केंद्रीय बजट प्रस्तुत करने में सक्षम नहीं हो सकती।
    • उदाहरण: अनुच्छेद-112 से 117 के अंतर्गत सामान्यतः बजट प्रस्तुत किया जाता है, किंतु नए जनादेश के अभाव में सरकार केवल लेखानुदान (अनुच्छेद-116) पर निर्भर रह सकती है।
  • दीर्घकालिक शासन के प्रति प्रोत्साहन में कमी: यदि विधायी कार्यकाल छोटा हो जाए तो सरकारें संरचनात्मक सुधारों को आगे बढ़ाने के प्रति कम उत्साहित हो सकती हैं। 

निष्कर्ष

यद्यपि चुनावों का समकालिकीकरण प्रशासनिक दक्षता बढ़ाने का उद्देश्य रखता है, फिर भी किसी भी संवैधानिक सुधार में संसदीय जवाबदेही, संघीय संतुलन और लोकतांत्रिक जनादेश की रक्षा सुनिश्चित की जानी चाहिए। इसलिए किसी भी चुनावी सुधार को व्यापक राजनीतिक सहमति के आधार पर आगे बढ़ाया जाना चाहिए, राज्य स्वायत्तता की रक्षा करनी चाहिए और संस्थागत सुरक्षा तंत्र को मजबूत करना चाहिए, ताकि दक्षता की खोज भारत के लोकतांत्रिक संवैधानिक ढाँचे को कमजोर न करे। 

To get PDF version, Please click on "Print PDF" button.

Need help preparing for UPSC or State PSCs?

Connect with our experts to get free counselling & start preparing

Aiming for UPSC?

Download Our App

      
Quick Revise Now !
AVAILABLE FOR DOWNLOAD SOON
UDAAN PRELIMS WALLAH
Comprehensive coverage with a concise format
Integration of PYQ within the booklet
Designed as per recent trends of Prelims questions
हिंदी में भी उपलब्ध
Quick Revise Now !
UDAAN PRELIMS WALLAH
Comprehensive coverage with a concise format
Integration of PYQ within the booklet
Designed as per recent trends of Prelims questions
हिंदी में भी उपलब्ध

<div class="new-fform">







    </div>

    Subscribe our Newsletter
    Sign up now for our exclusive newsletter and be the first to know about our latest Initiatives, Quality Content, and much more.
    *Promise! We won't spam you.
    Yes! I want to Subscribe.