प्रश्न की मुख्य माँग
- डिजिटल स्वास्थ्य एवं कल्याण-केंद्रित पहलों की सीमाएँ।
- हाल की सार्वजनिक स्वास्थ्य पहलों का समालोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए।
- आगे की राह।
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उत्तर
परिचय
भारत में आयुष्मान भारत स्वास्थ्य एवं कल्याण केंद्र (AB-HWCs) तथा आयुष्मान भारत डिजिटल स्वास्थ्य मिशन (AB-DHM) जैसी डिजिटल स्वास्थ्य एवं कल्याण संबंधी पहलें स्वास्थ्य सेवा वितरण के आधुनिकीकरण की दिशा में महत्त्वपूर्ण कदम हैं। तथापि, पहुँच, गुणवत्ता तथा संस्थागत क्षमता से संबंधित विद्यमान कमियों के कारण ये पहलें मजबूत प्राथमिक स्वास्थ्य अवसंरचना की आवश्यकता का विकल्प नहीं बन सकती हैं।
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डिजिटल एवं कल्याण-केंद्रित पहलों की सीमाएँ
- संस्थागत दायित्वों में अस्पष्टता: उप-स्वास्थ्य केंद्रों (SCs), प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (PHCs) तथा सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (CHCs) को स्वास्थ्य एवं कल्याण केंद्रों (HWCs) के रूप में पुनर्नामित करने से उनकी भूमिकाओं एवं अपेक्षित परिणामों को लेकर भ्रम उत्पन्न हुआ है।
- कल्याण संबंधी मानकों की व्यक्तिपरकता: कल्याण के परिणामों को वस्तुनिष्ठ रूप से मापना कठिन है, जिससे उनके मूल्यांकन एवं सुधार में बाधा आती है। स्वास्थ्य प्रशिक्षकों तथा सोशल मीडिया आधारित कल्याण संदेशों पर अत्यधिक बल, ठोस स्वास्थ्य सेवा प्रदायगी का विकल्प नहीं बन सकता।
- सेवा उपलब्धता के बिना डिजिटल अभिलेख: आयुष्मान भारत डिजिटल स्वास्थ्य मिशन (ABDM) स्वास्थ्य आईडी एवं डिजिटल स्वास्थ्य रजिस्ट्रियों का निर्माण तो करता है, परंतु यह वास्तविक स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच की गारंटी नहीं देता है।
- व्यक्तिगत उत्तरदायित्व पर अत्यधिक निर्भरता: कल्याण-केंद्रित दृष्टिकोण व्यक्तिगत विकल्पों एवं व्यवहार पर अत्यधिक बल देता है, जबकि स्वास्थ्य के सामाजिक एवं संरचनात्मक निर्धारकों की उपेक्षा करता है।
प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच संबंधी चुनौतियाँ
- सार्वजनिक क्षेत्र में वहनीयता एवं गुणवत्ता की कमी: निजी स्वास्थ्य सेवाओं की बढ़ती लागत तथा सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं की निम्न गुणवत्ता स्वास्थ्य असमानताओं को और बढ़ाती है।
- उदाहरण: अनेक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (PHCs) में आवश्यक मानव संसाधन एवं उपकरणों का अभाव है, जिससे लोगों को महँगी निजी स्वास्थ्य सेवाओं पर निर्भर होना पड़ता है।
- विखंडित सेवा प्रदायगी: विभिन्न सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यक्रम अलग-अलग ढंग से संचालित होते हैं, जिससे समन्वय एवं प्रभावशीलता प्रभावित होती है।
- उदाहरण: डिजिटल मानचित्रण के बावजूद स्वास्थ्य संस्थान, स्वास्थ्यकर्मी तथा बीमा योजनाएँ परस्पर पर्याप्त रूप से एकीकृत नहीं हैं।
हाल की सार्वजनिक स्वास्थ्य पहलों का समालोचनात्मक मूल्यांकन
- आयुष्मान भारत स्वास्थ्य एवं कल्याण केंद्र (AB-HWCs): इनका उद्देश्य उप-स्वास्थ्य केंद्रों, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (PHCs) तथा सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (CHCs) को उन्नत बनाना था।
- उदाहरण: स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार “कल्याण” और पारंपरिक जनस्वास्थ्य उद्देश्यों के मध्य भ्रम के कारण निवारक एवं प्रोत्साहक स्वास्थ्य सेवाओं की अपेक्षा व्यक्तिगत कल्याण पर अधिक बल दिया जाने लगा है।
- आयुष्मान भारत डिजिटल स्वास्थ्य मिशन (ABDM): यह ABHA डिजिटल स्वास्थ्य आईडी प्रदान करता है, स्वास्थ्य संस्थानों एवं पेशेवरों का मानचित्रण करता है तथा स्वास्थ्य डेटा का केंद्रीकरण करता है। तथापि, सार्वभौमिक ABHA कवरेज के बावजूद स्वास्थ्य अवसंरचना एवं सेवा गुणवत्ता की कमियों के कारण रोगियों को स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। केवल डिजिटलीकरण उपचार की उपलब्धता एवं वहनीयता सुनिश्चित नहीं कर सकता है।
- जनस्वास्थ्य से कल्याण-केंद्रित दृष्टिकोण की ओर झुकाव: व्यक्तिपरक कल्याण पर अत्यधिक बल देने से स्वास्थ्य के संरचनात्मक निर्धारकों, जैसे- स्वच्छता, पोषण एवं दीर्घकालिक रोगों के प्रबंधन, की उपेक्षा होने की संभावना रहती है।
आगे की राह
- प्राथमिक स्वास्थ्य अवसंरचना को सुदृढ़ बनाना: उप-स्वास्थ्य केंद्रों (SCs), प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (PHCs) तथा सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (CHCs) को प्रशिक्षित मानव संसाधन, आवश्यक औषधियों एवं नैदानिक उपकरणों से सुसज्जित किया जाए।
- डिजिटल साधनों को जमीनी स्तर की सेवा प्रदायगी से जोड़ना: ABHA आईडी को वास्तविक स्वास्थ्य सेवाओं, जैसे निवारक, उपचारात्मक तथा मातृ-शिशु स्वास्थ्य सेवाओं से प्रभावी रूप से जोड़ा जाए।
- जनस्वास्थ्य परिणामों पर ध्यान केंद्रित करना: सफलता का आकलन टीकाकरण कवरेज, मातृ एवं शिशु मृत्यु दर तथा रोगों की घटनाओं जैसे ठोस जनस्वास्थ्य संकेतकों के आधार पर किया जाए।
- वहनीयता एवं पहुँच में सुधार: आवश्यक स्वास्थ्य सेवाओं पर सब्सिडी प्रदान की जाए, प्रभावी रेफरल प्रणाली विकसित की जाए तथा आपातकालीन स्वास्थ्य सेवाओं की कार्यक्षमता सुनिश्चित की जाए।
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निष्कर्ष
डिजिटल एवं कल्याण-केंद्रित पहलें स्वास्थ्य सेवा प्रणाली को सशक्त बनाने के महत्त्वपूर्ण साधन हैं, किंतु वे प्राथमिक स्वास्थ्य संस्थानों के बुनियादी सुदृढ़ीकरण का विकल्प नहीं बन सकती हैं। केवल मजबूत स्वास्थ्य अवसंरचना, प्रशिक्षित मानव संसाधन तथा एकीकृत सेवा प्रदायगी के माध्यम से ही भारत जनस्वास्थ्य परिणामों में सार्थक एवं स्थायी सुधार सुनिश्चित कर सकता है।