Q. संविधान के अनुसार लोक व्यवस्था और पुलिस राज्य के विषय हैं, फिर भी केंद्रीय एजेंसियों की बढ़ती भूमिका बढ़ते केंद्रीकरण को दर्शाती है। अनुच्छेद 246 और सातवीं अनुसूची के संदर्भ में चर्चा कीजिए। (10 अंक, 150 शब्द)

March 3, 2026

GS Paper IIIndian Polity

प्रश्न की मुख्य माँग

  • संवैधानिक स्थिति: एक राज्य विषय के रूप में पुलिस की व्याख्या कीजिए।
  • केंद्रीय एजेंसियों की बढ़ती भूमिका और केंद्रीकरण की प्रवृत्ति की चर्चा कीजिए।

उत्तर

अनुच्छेद-246 तथा सातवीं अनुसूची के माध्यम से संघ और राज्यों के बीच विधायी शक्तियों का वितरण किया गया है। इसमें ‘सार्वजनिक व्यवस्था’ (राज्य सूची, प्रविष्टि 1) और ‘पुलिस’ (राज्य सूची, प्रविष्टि 2) को मुख्यतः राज्य विषय के रूप में रखा गया है। हालाँकि, हाल के वर्षों में केंद्रीय जाँच और सुरक्षा एजेंसियों के बढ़ते संचालनात्मक दायरे ने संघीय संतुलन और संवैधानिक केंद्रीकरण को लेकर बहस को तेज कर दिया है।

संवैधानिक स्थिति: पुलिस एक राज्य विषय के रूप में

  • अनुच्छेद-246(3) के तहत स्पष्ट विधायी विभाजन: राज्य सूची के विषयों पर राज्यों को विशेष विधायी अधिकार प्राप्त हैं।
    • उदाहरण: सातवीं अनुसूची की सूची-II की प्रविष्टि 2 में ‘पुलिस’ को राज्यों के अधीन रखा गया है।
  • सार्वजनिक व्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा में अंतर: ‘सार्वजनिक व्यवस्था’ (राज्य सूची) ‘रक्षा’ और ‘सशस्त्र बलों’ (संघ सूची) से भिन्न है।
    • उदाहरण: राम मनोहर लोहिया मामला (1966) में सर्वोच्च न्यायालय ने ‘कानून और व्यवस्था’, ‘सार्वजनिक व्यवस्था’ और ‘राज्य की सुरक्षा’ के बीच अंतर स्पष्ट किया।
  • आपराधिक जाँच पर राज्य का नियंत्रण: एफआईआर दर्ज करना, जाँच और अभियोजन मुख्यतः राज्य पुलिस के अधिकार क्षेत्र में आते हैं।
    • उदाहरण: पालघर लिंचिंग मामला (2020) की जाँच महाराष्ट्र पुलिस द्वारा की गई।
  • CBI के अधिकार क्षेत्र के लिए राज्य की सहमति: दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना (DSPE) अधिनियम, 1946 के तहत सीबीआई को राज्य में जाँच के लिए राज्य की सहमति आवश्यक होती है।
    • उदाहरण: पश्चिम बंगाल ने वर्ष 2018 में सीबीआई को दी गई सामान्य सहमति वापस ले ली।
  • आंतरिक शांति बनाए रखने की राज्य की जिम्मेदारी: सांप्रदायिक तनाव या सामाजिक अशांति के दौरान शांति बनाए रखने का दायित्व राज्य पुलिस का होता है।
    • उदाहरण: बड़े धार्मिक आयोजनों के दौरान उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा कानून-व्यवस्था का प्रबंधन।
  • पुलिस कानून बनाने की राज्य की विधायी क्षमता: राज्य अपने स्वयं के पुलिस अधिनियम बना सकते हैं।
    • उदाहरण: केरल पुलिस अधिनियम, 2011 और महाराष्ट्र पुलिस अधिनियम, 1951।

केंद्रीय एजेंसियों की बढ़ती भूमिका और केंद्रीकरण की प्रवृत्ति

  • केंद्रीय जाँच एजेंसियों का विस्तार: केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI), राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) और प्रवर्तन निदेशालय (ED) जैसी एजेंसियाँ विभिन्न राज्यों में व्यापक रूप से कार्य कर रही हैं।
    • उदाहरण: NIA अधिनियम, 2008 के तहत एजेंसी आतंकवाद से जुड़े मामलों की जाँच करती है और वर्ष 2019 के संशोधन के बाद कई मामलों में राज्य की पूर्व सहमति के बिना भी कार्रवाई कर सकती है।
  • सुरक्षा हस्तक्षेप के लिए संघ सूची की प्रविष्टियों का उपयोग: संघ सूची की प्रविष्टि 2A नागरिक शक्ति की सहायता के लिए सशस्त्र बलों की तैनाती की अनुमति देती है।
    • उदाहरण: पश्चिम बंगाल में चुनावों के दौरान केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (CAPF) की तैनाती।
  • समवर्ती सूची का अतिव्यापी प्रभाव: आपराधिक कानून और प्रक्रिया सूची-III (प्रविष्टि 1 और 2) के अंतर्गत आते हैं, जिससे संघ को कानून बनाने का अधिकार मिलता है।
    • उदाहरण: गैर-कानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम, 2019 में संशोधन कर NIA की शक्तियों का विस्तार।
  • राज्य मामलों में केंद्रीय एजेंसियों की बढ़ती जाँच: हाल के वर्षों में ईडी और सीबीआई द्वारा राज्य स्तर के राजनीतिक नेताओं के विरुद्ध जाँच में वृद्धि हुई है।
    • उदाहरण: कई राज्यों में कथित मनी लॉण्ड्रिंग मामलों में ED द्वारा जाँच की गई।
  • न्यायिक निर्देशों द्वारा केंद्रीय जाँच: न्यायालय राज्य की सहमति के बिना भी जाँच को सीबीआई को सौंप सकते हैं।
    • उदाहरण: सोहराबुद्दीन मामले (2010) की जाँच, सर्वोच्च न्यायालय ने सीबीआई को स्थानांतरित की।
  • राष्ट्रीय सुरक्षा के आधार पर व्यापक शक्तियाँ: आतंकवाद-रोधी और मनी लॉण्ड्रिंग विरोधी ढाँचे संघ के अधिकार क्षेत्र का विस्तार करते हैं।
    • उदाहरण: धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA), 2002 के तहत प्रवर्तन निदेशालय (ED) की कार्रवाई।

निष्कर्ष

यद्यपि संविधान के अनुच्छेद-246 और सातवीं अनुसूची के अंतर्गत ‘सार्वजनिक व्यवस्था’ और ‘पुलिस’ को स्पष्ट रूप से राज्य के अधिकार क्षेत्र में रखा गया है, फिर भी बदलती सुरक्षा चुनौतियों तथा संघ द्वारा विस्तारित विधायी प्रावधानों के कारण केंद्रीय एजेंसियों की भूमिका मजबूत हुई है। इस संदर्भ में राष्ट्रीय सुरक्षा की आवश्यकताओं और संघीय स्वायत्तता के बीच संतुलन एक संवेदनशील संवैधानिक प्रश्न बना हुआ है, जिसके लिए प्रतिस्पर्द्धी केंद्रीकरण के बजाय सहकारी संघवाद की आवश्यकता है।

Public order and police are State subjects under the Constitution, yet the expanding role of central agencies reflects increasing centralisation. Discuss in the context of Articles 246 and the Seventh Schedule. in hindi

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