Q. संयुक्त राज्य अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच हालिया तनाव वैश्विक राजनीति में एक व्यापक बदलाव को दर्शाता है, जहाँ ताकतवर शक्ति अंतरराष्ट्रीय संबंधों को तेजी से आकार दे रही है। चर्चा कीजिए कि यह प्रवृत्ति बहुपक्षीय संस्थानों की प्रभावशीलता को किस प्रकार चुनौती देती है। सामरिक स्वायत्तता की नीति को देखते हुए, भारत इस तरह के भू-राजनीतिक तनावों के प्रबंधन में क्या भूमिका निभा सकता है, इसका भी विश्लेषण कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)

March 6, 2026

GS Paper IIInternational Relations

प्रश्न की मुख्य माँग

  • बताइए कि कैसे कठोर शक्ति बहुपक्षीय संस्थाओं की प्रभावशीलता को चुनौती देती है।
  • चर्चा कीजिए कि रणनीतिक स्वायत्तता के माध्यम से भारत क्या भूमिका निभा सकता है।
  • भू-राजनैतिक तनावों के प्रबंधन में भारत के सामने चुनौतियों को रेखांकित कीजिए।

उत्तर

हाल के भू-राजनैतिक घटनाक्रम, जिनमें संयुक्त राज्य अमेरिका, इजरायल और ईरान से संबंधित तनाव की तीव्रता शामिल है, वैश्विक राजनीति में कठोर शक्ति के पुनरुत्थान का संकेत देते हैं। जैसे-जैसे सैन्य क्षमता, प्रतिबंध और रणनीतिक संकेतों का महत्त्व पुनः बढ़ रहा है, संघर्षों के प्रबंधन में बहुपक्षीय संस्थाओं की क्षमता की परीक्षा और अधिक होने लगी है, जिससे नए कूटनीतिक दृष्टिकोणों की आवश्यकता उत्पन्न हो रही है।

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कठोर शक्ति किस प्रकार बहुपक्षीय संस्थाओं की प्रभावशीलता को चुनौती देती है?

  • एकतरफा सैन्य कार्रवाइयों में वृद्धि: शक्तिशाली देश बढ़ते हुए संस्थागत स्वीकृति को दरकिनार कर अपनी सुरक्षा संबंधी उद्देश्यों को स्वतंत्र रूप से आगे बढ़ा रहे हैं।
    • उदाहरण: संयुक्त राष्ट्र के औपचारिक जनादेश के बिना संयुक्त राज्य अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान के विरुद्ध संयुक्त सैन्य हमले।
  • संस्थाओं की सीमित संघर्ष-समाधान क्षमता: बहुपक्षीय संस्थाओं के पास प्रायः इतनी प्रवर्तन शक्ति नहीं होती कि वे प्रमुख शक्तियों के बीच तनाव की वृद्धि को रोक सकें।
    • उदाहरण: एकतरफा तनाव वृद्धि को सीमित करने की अपेक्षा वाली संयुक्त राष्ट्र-नेतृत्व वाली व्यवस्था वर्तमान भू-राजनैतिक परिस्थिति में दबाव में दिखाई दे रही है।
  • महाशक्तियों के बीच रणनीतिक प्रतिद्वंद्विता: भू-राजनैतिक प्रतिस्पर्द्धा अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के भीतर सहमति को कमजोर कर देती है।
    • उदाहरण: वेनेज़ुएला और क्यूबा जैसे क्षेत्रों में व्यापक भू-राजनैतिक गतिविधियाँ शक्ति प्रतिस्पर्द्धा के तीव्र होने को दर्शाती हैं।
  • आर्थिक और प्रौद्योगिकीय दबाव के बढ़ते उपयोग: देश बहुपक्षीय ढाँचों के बाहर प्रतिबंधों और प्रौद्योगिकीय प्रतिबंधों का अधिकाधिक उपयोग कर रहे हैं।
  • शक्ति प्रदर्शन का सामान्यीकरण: सैन्य क्षमता और प्रतिरोधक क्षमता कूटनीति के प्रमुख साधन बनती जा रही हैं।

रणनीतिक स्वायत्तता के माध्यम से भारत की संभावित भूमिका

  • प्रतिद्वंद्वी शक्ति केंद्रों के बीच सेतु के रूप में कार्य करना: प्रतिस्पर्द्धी शक्तियों के साथ भारत के संतुलित संबंध उसे भू-राजनैतिक विभाजनों के पार संवाद बनाए रखने की अनुमति देते हैं।
    • उदाहरण: भारत संयुक्त राज्य अमेरिका तथा पश्चिम एशिया के कई देशों के साथ रणनीतिक सहभागिता बनाए रखता है।
  • संरचित रणनीतिक संवाद को प्रोत्साहित करना: भारत प्रतिद्वंद्वी पक्षों के बीच संवाद को बढ़ावा देने के लिए ट्रैक 1, ट्रैक 1.5 और ट्रैक 2 कूटनीति को सुगम बना सकता है।
  • शांत कूटनीति के लिए विशेष दूतों की नियुक्ति: संकट की स्थितियों में संचार के चैनलों को बनाए रखने के लिए भारत विशेष दूत नियुक्त कर सकता है।
  • विश्वास-निर्माण मंचों का आयोजन: भारत ऐसे मंचों का निर्माण कर सकता है, जो विश्वास को बढ़ावा दें और तनाव की वृद्धि को रोकने में सहायक हों।
    • उदाहरण: अंतरराष्ट्रीय संवादों की मेजबानी करके भारत विश्वास-निर्माण उपायों और जोखिम-न्यूनकरण तंत्रों को प्रोत्साहित कर सकता है।
  • वैश्विक दक्षिण के हितों का प्रतिनिधित्व करना: भारत उन विकासशील देशों की चिंताओं को सामने रख सकता है, जो भूराजनैतिक अस्थिरता से प्रभावित होते हैं।
    • उदाहरण: विकासशील देशों के बीच भारत की नेतृत्वकारी भूमिका उसे एक तटस्थ कूटनीतिक अभिनेता के रूप में विश्वसनीयता प्रदान करती है।

भूराजनैतिक तनावों के प्रबंधन में भारत के सामने चुनौतियाँ

  • प्रतिस्पर्द्धी रणनीतिक साझेदारियों का संतुलन: भारत को किसी एक गुट के साथ स्पष्ट रूप से जुड़ा हुआ दिखाई दिए बिना अनेक शक्ति समूहों के साथ संबंध बनाए रखने होते हैं।
    • उदाहरण: संयुक्त राज्य अमेरिका और ईरान जैसे देशों के साथ एक साथ संबंधों का प्रबंधन सावधानीपूर्ण कूटनीति की माँग करता है।
  • पश्चिम एशिया के संघर्षों में सीमित प्रत्यक्ष प्रभाव: क्षेत्रीय संघर्ष मुख्यतः स्थानीय तथा महाशक्ति हितों द्वारा संचालित होते हैं, जिन पर भारत का प्रत्यक्ष प्रभाव सीमित है।
    • उदाहरण: इजरायल और ईरान के बीच बढ़ता तनाव मुख्य रूप से क्षेत्रीय सुरक्षा गतिशीलताओं से प्रभावित है।
  • आर्थिक और ऊर्जा आपूर्ति में व्यवधान का जोखिम: पश्चिम एशिया में भू-राजनैतिक तनाव भारत की ऊर्जा सुरक्षा और व्यापारिक मार्गों को प्रभावित कर सकते हैं।
  • अनौपचारिक मध्यस्थता में कूटनीतिक सीमाएँ: ट्रैक कूटनीति संवाद को सुगम बना सकती है, लेकिन यह बाध्यकारी समाधान लागू नहीं कर सकती।
  • क्षेत्रीय सुरक्षा प्रभावों का प्रबंधन: महाशक्तियों के बीच तनाव की वृद्धि एशिया को अस्थिर कर सकती है और भारत के रणनीतिक परिवेश को प्रभावित कर सकती है।

निष्कर्ष

ऐसी विश्व व्यवस्था में जहाँ अंतरराष्ट्रीय संबंधों को कठोर शक्ति लगातार अधिक प्रभावित कर रही है, बहुपक्षीय संस्थाओं को बदलती भू-राजनैतिक वास्तविकताओं के अनुरूप स्वयं को अनुकूलित करना होगा। भारत को अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को सुदृढ़ करना चाहिए, संवाद-आधारित कूटनीति को प्रोत्साहित करना चाहिए और समावेशी मंचों का आयोजन करना चाहिए, ताकि प्रतिरोधक क्षमता और सहयोग साथ-साथ बने रहें तथा भू-राजनैतिक प्रतिद्वंद्विताएँ दीर्घकालिक अस्थिरता में परिवर्तित न हों।

The recent escalation involving the United States, Israel and Iran reflects a broader shift in global politics where hard power is increasingly shaping international relations. Discuss how this trend challenges the effectiveness of multilateral institutions. Also examine the role India can play, given its policy of strategic autonomy, in managing such geopolitical tensions. in hindi

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