Q. भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) द्वारा संशोधित भूकंप क्षेत्र निर्धारण ढांचे को हाल ही में वापस लेने से आपदा प्रतिरोध, आर्थिक व्यवहार्यता और जलवायु परिवर्तन को कम करने के बीच जटिल संतुलन उजागर होता है। भारत के बढ़ते शहरी अवसंरचना के संदर्भ में इस कथन का विश्लेषण करें और भूकंपीय सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए एक समग्र दृष्टिकोण सुझाएं। (15 अंक, 250 शब्द)

प्रश्न की मुख्य माँग

  • आपदा प्रत्यास्थता, आर्थिक व्यवहार्यता और जलवायु शमन के बीच जटिल संतुलन की चर्चा कीजिए।
  • भूकंपीय सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए समग्र दृष्टिकोण का उल्लेख कीजिए।

उत्तर

भारत में तेजी से बढ़ते शहरीकरण और अवसंरचना विस्तार के कारण मजबूत आपदा प्रबंधन ढाँचे की आवश्यकता बढ़ गई है। हाल ही में भारतीय मानक ब्यूरो द्वारा संशोधित भूकंप क्षेत्रीकरण ढाँचे को वापस लेने की घटना यह दर्शाती है कि अवसंरचना योजना में भूकंपीय सुरक्षा सुनिश्चित करने, आर्थिक व्यवहार्यता बनाए रखने और जलवायु संबंधी चिंताओं को संबोधित करने के मध्य संतुलन बनाना कितना चुनौतीपूर्ण है।

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आपदा सहनशीलता, आर्थिक व्यवहार्यता और जलवायु शमन के बीच जटिल संतुलन

  • भूकंपीय सुरक्षा को मजबूत करना बनाम बढ़ती निर्माण लागत: कड़े भूकंपीय क्षेत्रीकरण मानकों के कारण भवनों और अवसंरचना के लिए अधिक मजबूत संरचनात्मक मानकों की आवश्यकता होती है, जिससे निर्माण लागत बढ़ जाती है।
    • उदाहरण: एक क्षेत्र की श्रेणी बढ़ने से निर्माण लागत लगभग 20% तक बढ़ सकती है और दो श्रेणियाँ बढ़ने पर लगभग एक-तिहाई तक बढ़ सकती है।
  • अवसंरचना की मजबूती बनाम क्षेत्रीय विकास की बाधाएँ: उच्च भूकंपीय श्रेणी वाले क्षेत्रों में अवसंरचना विस्तार धीमा हो सकता है, विशेषकर उन क्षेत्रों में, जो आर्थिक रूप से पहले से ही कमजोर हैं।
    • उदाहरण: प्रस्तावित जोन VI वर्गीकरण में कश्मीर, हिमालयी क्षेत्र, कच्छ और उत्तर-पूर्व के कुछ हिस्से शामिल होंगे, जिससे विकास परियोजनाएँ प्रभावित हो सकती हैं।
  • शहरी सुरक्षा मानक बनाम अनौपचारिक आवास का विस्तार: कड़े भवन मानक आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों को ऐसे अनौपचारिक आवास की ओर धकेल सकते हैं, जहाँ सुरक्षा मानकों का पालन नहीं होता।
    • उदाहरण: भारत के लगभग 80% आवास पहले से ही अनौपचारिक क्षेत्र में स्थित हैं।
  • आपदा तैयारी बनाम कार्यान्वयन की चुनौतियाँ: उन्नत जोखिम आकलन ढाँचों को अपनाने के लिए तकनीकी क्षमता और संस्थागत समन्वय की आवश्यकता होती है।
    • उदाहरण: भारतीय मानक ब्यूरो द्वारा प्रस्तावित संभाव्य भूकंपीय खतरा आकलन (PSHA) की ओर परिवर्तन एक वैश्विक रूप से स्वीकृत, लेकिन जटिल पद्धति है।
  • सुदृढ़ निर्माण बनाम जलवायु शमन की चिंता: अधिक मजबूत भवनों के लिए सीमेंट और स्टील जैसी सामग्रियों की अधिक आवश्यकता होती है, जिससे कार्बन उत्सर्जन बढ़ सकता है।
    • उदाहरण: निर्माण क्षेत्र भारत में कार्बन उत्सर्जन के प्रमुख स्रोतों में से एक है।

भूकंपीय सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए समग्र दृष्टिकोण

  • विज्ञान-आधारित क्षेत्रीकरण: आधुनिक जोखिम आकलन मॉडलों को अपनाते हुए क्षेत्रीय भू-वैज्ञानिक आँकड़ों को शामिल करना चाहिए।
    • उदाहरण: भारतीय मानक ब्यूरो द्वारा संभाव्य भूकंपीय खतरा आकलन (PSHA) को चरणबद्ध तरीके से लागू करना।
  • शहरी नियोजन विनियम: शहरों की योजना और अवसंरचना स्वीकृतियों में भूकंपीय जोखिम संबंधी मानकों को शामिल किया जाना चाहिए।
    • उदाहरण: स्मार्ट सिटीज मिशन के अंतर्गत शहरी परियोजनाओं में भूकंप-रोधी अवसंरचना को शामिल करना।
  • भूकंप-रोधी आवास: कम आय वाले वर्गों के लिए किफायती और लचीली निर्माण तकनीकों को बढ़ावा देना चाहिए।
  • संस्थागत समन्वय: कार्यान्वयन योग्य मानकों के लिए मंत्रालयों, नियामक संस्थाओं और इंजीनियरिंग निकायों के बीच समन्वय सुनिश्चित करना आवश्यक है।
    • उदाहरण: आवास और शहरी कार्य मंत्रालय, केंद्रीय जल आयोग और राष्ट्रीय बांध सुरक्षा प्राधिकरण के मध्य परामर्श।
  • जलवायु-सहनशील अवसंरचना का समावेशन: सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए कार्बन उत्सर्जन कम करने के लिए टिकाऊ सामग्री और डिजाइन पद्धतियों को अपनाना चाहिए।
    • उदाहरण: भारत की राष्ट्रीय अवसंरचना पाइपलाइन के अंतर्गत प्रोत्साहित की जा रही हरित अवसंरचना पहल। 

निष्कर्ष

जैसे-जैसे भारत के शहर तेजी से विस्तार कर रहे हैं और अवसंरचना का दायरा बढ़ रहा है, भूकंपीय सहनशीलता को वहनीयता और जलवायु जिम्मेदारी के साथ जोड़ना अत्यंत महत्त्वपूर्ण होगा। भूकंप क्षेत्रीकरण के लिए विज्ञान-आधारित, परामर्शात्मक और चरणबद्ध दृष्टिकोण अपनाकर सुरक्षित शहरी विकास को संभव बनाया जा सकता है। साथ ही यह आपदा प्रबंधन को सतत् विकास और दीर्घकालिक जलवायु सहनशीलता के लक्ष्यों के साथ समन्वित करने में भी सहायक होगा। 

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