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Q. औद्योगिक हड़तालों की हालिया घटनाएँ नए श्रम संहिता ढाँचे के तहत संविदा श्रमिकों की असुरक्षा को उजागर करती है। भारत में 'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस' और 'श्रमिक कल्याण' के बीच संतुलन का आलोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)

April 21, 2026

GS Paper IIIIndian Economy

प्रश्न की मुख्य माँग

  • ईज ऑफ डूइंग बिजनेस और श्रमिक कल्याण के बीच संतुलन की चर्चा कीजिए।
  • संतुलन बनाए रखने में चुनौतियों को स्पष्ट कीजिए। 
  • आगे की राह सुझाइए। 

उत्तर

नोएडा में हुए विरोध प्रदर्शनों सहित हाल ही में हुई औद्योगिक अशांति ने भारत की श्रम व्यवस्था में तनाव को उजागर किया है। श्रम संहिता के तहत सुधारों का उद्देश्य निवेश को बढ़ावा देना है, लेकिन श्रमिक सुरक्षा में कमी, विशेष रूप से संविदा श्रमिकों के लिए, को लेकर चिंताएँ बनी हुई हैं।

ईज ऑफ डूइंग बिजनेस और श्रमिक कल्याण के बीच संतुलन

  • लचीली नियुक्ति: श्रम संहिताएँ उद्योगों को नियुक्ति और छँटनी में अधिक लचीलापन प्रदान करती हैं, जिससे संचालन दक्षता बढ़ती है।
    • उदाहरण: औद्योगिक संबंध संहिता में छँटनी के लिए पूर्व स्वीकृति की सीमा 100 से बढ़ाकर 300 श्रमिकों कर दी गई है।
  • अनुपालन में सरलता: अनेक कानूनों के एकीकरण से नियामकीय जटिलता और अनुपालन बोझ कम होता है।
    • उदाहरण: 29 श्रम कानूनों को मिलाकर 4 संहिताएँ बनाई गई हैं।
  • सामाजिक सुरक्षा: यह ढाँचा पहले से वंचित श्रमिकों तक कल्याणकारी कवरेज बढ़ाने का प्रयास करता है।
    • उदाहरण: सामाजिक सुरक्षा संहिता में गिग और प्लेटफॉर्म श्रमिकों को शामिल किया गया है।
  • औपचारीकरण: सुधारों का उद्देश्य अनौपचारिक रोजगार को औपचारिक संरचनाओं में लाना है।
    • उदाहरण: कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (EPFO) और कर्मचारी राज्य बीमा निगम (ESIC) का दायरा व्यापक किया गया है।
  • वेतन में समानता: वेतन के मानकीकरण से न्यूनतम आय सुरक्षा सुनिश्चित करने का प्रयास किया गया है।
    • उदाहरण: वेतन संहिता के तहत राष्ट्रीय न्यूनतम वेतन की अवधारणा लागू की गई है।

संतुलन सुनिश्चित करने में चुनौतियाँ

  • संविदा असुरक्षा: संविदा श्रमिक कमजोर नौकरी सुरक्षा और सीमित सौदेबाजी क्षमता के कारण अत्यधिक संवेदनशील बने रहते हैं।
    • उदाहरण: नोएडा श्रमिक असंतोष ने वेतन और कार्य परिस्थितियों से जुड़ी शिकायतों को उजागर किया।
  • कमजोर क्रियान्वयन: कार्यान्वयन की खामियाँ श्रम सुरक्षा प्रावधानों की प्रभावशीलता को कम करती हैं।
    • उदाहरण: सरकारें अक्सर श्रमिक असंतोष को मूल कारणों के समाधान के बजाय कानून-व्यवस्था का मुद्दा मानती हैं।
  • वेतन संकट: कानूनी प्रावधानों के बावजूद कम और अनियमित वेतन की समस्या बनी रहती है।
  • संघीय प्रतिबंध: कड़े नियमों के कारण श्रमिकों की सामूहिक सौदेबाजी की क्षमता सीमित हो जाती है।
    • उदाहरण: औद्योगिक संबंध संहिता में हड़ताल के लिए ऐसी शर्तें रखी गई हैं, जो इसे आयोजित करना कठिन बनाती हैं।

आगे की राह

  • मजबूत निगरानी: श्रम निरीक्षण और अनुपालन निगरानी तंत्र को सुदृढ़ किया जाए।
    • उदाहरण: डिजिटल निरीक्षण प्रणाली अपनाकर पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाई जा सकती है।
  • संविदा श्रमिक संरक्षण: संविदा श्रमिकों के लिए समान वेतन और कार्य परिस्थितियाँ सुनिश्चित की जाएँ।
    • उदाहरण: संविदा श्रम विनियमन का प्रभावी क्रियान्वयन।
  • सामाजिक संवाद: सरकार, नियोक्ताओं और श्रमिकों के बीच नियमित संवाद को संस्थागत रूप दिया जाए।
    • उदाहरण: औद्योगिक क्षेत्रों में त्रिपक्षीय मंच के माध्यम से विवाद समाधान।
  • संतुलित दृष्टिकोण: आर्थिक दक्षता और श्रमिक कल्याण के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए सुधारों की निरंतर समीक्षा की जाए।
    • उदाहरण: श्रम संहिताओं की समय-समय पर जमीनी परिणामों के आधार पर समीक्षा।
  • सुरक्षा का विस्तार: श्रमिकों के लिए सामाजिक सुरक्षा और कौशल विकास योजनाओं का दायरा बढ़ाया जाए।
    • उदाहरण: कर्मचारी राज्य बीमा और भविष्य निधि योजनाओं के अंतर्गत अधिक श्रमिकों को शामिल करना।

निष्कर्ष

भारत के श्रम सुधारों को दक्षता और समानता के बीच संतुलन स्थापित करना होगा। सतत् औद्योगिक विकास तभी संभव है, जब आर्थिक प्रतिस्पर्द्धात्मकता के साथ-साथ श्रमिकों की गरिमा की भी रक्षा की जाए। यह दृष्टिकोण सतत् विकास लक्ष्य 8 (सम्मानजनक कार्य) के अनुरूप समावेशी, स्थिर और उत्पादक रोजगार तंत्र सुनिश्चित कर सकता है।

The recent wave of industrial strikes exposes the vulnerability of contract labour under the new Labour Codes framework. Critically evaluate the balance between ‘Ease of Doing Business’ and ‘Worker Welfare’ in India. in hindi

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