Q. आधिकारिक समारोहों में वंदे मातरम के सभी छह श्लोकों का पाठ अनिवार्य करने वाला हालिया निर्देश एक ऐतिहासिक रूप से स्थापित संवैधानिक स्थिति को फिर से खोलता है। धर्मनिरपेक्षता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर इसके प्रभावों की चर्चा कीजिए। (10 अंक, 150 शब्द)

February 13, 2026

GS Paper IIGovernance

प्रश्न की मुख्य माँग

  • पंथनिरपेक्षता के लिए निहितार्थ
  • व्यक्तिगत स्वतंत्रता के लिए निहितार्थ

उत्तर

केंद्रीय गृह मंत्रालय का ‘वंदे मातरम’ के सभी छह छंदों/श्लोकों के पाठ को अनिवार्य करने संबंधी निर्देश एक ऐसे संवैधानिक प्रश्न को फिर से जीवित करता है, जो स्पष्ट रूप से 1937 में सुलझ गया था और 1950 में जिसकी पुन: पुष्टि की गई थी। यह विवाद पंथनिरपेक्षता और व्यक्तिगत अंतरात्मा की रक्षा के प्रति भारत की प्रतिबद्धता की परीक्षा लेता है।

पंथनिरपेक्षता के लिए निहितार्थ

  • 1937 के राजनीतिक समझौते से विचलन: 1937 के कांग्रेस प्रस्ताव ने राष्ट्रीय गीत को पहले दो श्लोकों तक सीमित कर दिया था, जिसमें बाद के श्लोकों पर आपत्तियों को स्वीकार किया गया था।
  • संविधान सभा के चयन का विरोधाभास: 1950 में, केवल दो-श्लोकों वाले संस्करण को राष्ट्रीय गीत के रूप में अपनाया गया था; चार भक्तिपूर्ण श्लोकों को बाहर रखा गया था।
    • उदाहरण: 24 जनवरी, 1950 को भारत के पूर्व राष्ट्रपति श्री राजेंद्र प्रसाद द्वारा इसकी घोषणा की गई।
  • बाद के श्लोकों में धार्मिक सामग्री: बाद के छंदों/श्लोकों में देवी दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती का आह्वान किया गया है, जो स्पष्ट धार्मिक चित्रण प्रस्तुत करते हैं।
  • अनुच्छेद 51A से जानबूझकर हटाना: मौलिक कर्तव्यों में केवल राष्ट्रगान और ध्वज का उल्लेख है, राष्ट्रीय गीत का नहीं।
    • उदाहरण: 42वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम, 1976 ने ‘वंदे मातरम’ को इससे बाहर रखा था।
  • कोई वैधानिक संरक्षण नहीं: राष्ट्रगान के विपरीत, राष्ट्रीय गीत ‘राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम, 1971’ के तहत संरक्षित नहीं है।

व्यक्तिगत स्वतंत्रता के लिए निहितार्थ

  • अंत:करण की स्वतंत्रता का उल्लंघन: अनुच्छेद 25 व्यक्तियों को अनिवार्य धार्मिक अनुष्ठानों से सुरक्षा प्रदान करता है।
  • अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के तहत मौन रहने का अधिकार: सर्वोच्च न्यायालय ने राष्ट्रगान तक को न गाने के अधिकार को मान्यता दी है।
    • उदाहरण: बिजोय इमैनुएल बनाम केरल राज्य मामले में, सम्मानपूर्वक खड़े रहने वाले लेकिन राष्ट्रगान गाने से इनकार करने वाले छात्रों को संवैधानिक रूप से संरक्षित किया गया था।
  • सम्मानजनक असहमति का न्यायिक संरक्षण: चुपचाप खड़े रहना अनादर की श्रेणी में नहीं आता।
    • उदाहरण: 1986 के मामले में न्यायमूर्ति ओ. चिनप्पा रेड्डी ने व्यवस्था दी थी कि “खड़े होकर उचित सम्मान प्रदर्शित किया जाता है,” और गायन में शामिल न होना अनादर नहीं है।
  • कार्यपालिका का अतिरेक: संवैधानिक संशोधन या संसदीय कानून के बिना जारी किया गया निर्देश।
  • अनिवार्य रूढ़िवादिता: राज्य धार्मिक रूप में राष्ट्रवाद को निर्धारित नहीं कर सकता।

निष्कर्ष

एक संवैधानिक गणराज्य को देशभक्ति और बहुलवाद के बीच सामंजस्य बिठाना चाहिए। दो श्लोंकों के अभ्यास को बहाल करना, न्यायिक मिसाल का सम्मान करना और कार्यपालिका के अतिरेक से बचना, राष्ट्रीय भावना और व्यक्तिगत अंत:करण दोनों की रक्षा कर सकता है। पंथनिरपेक्षता मजबूरी से नहीं, बल्कि संवैधानिक नैतिकता में निहित स्वैच्छिक सम्मान से जीवित रहती है।

The recent directive mandating the recitation of all six stanzas of Vande Mataram at official functions reopens a historically settled constitutional position. Discuss its implications for secularism and individual freedom. in hindi

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