प्रश्न की मुख्य माँग
- वास्तविक समानता की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम
- प्रणालीगत कमियाँ
- आगे की राह।
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उत्तर
परिचय
सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गृहिणियों को “राष्ट्र निर्माता” के रूप में मान्यता देना तथा अवैतनिक घरेलू कार्य का मूल्य ₹30,000 प्रति माह निर्धारित करना वास्तविक समानता (Substantive Equality) की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम है। यह अदृश्य श्रम को स्वीकार करता है, लेकिन विद्यमान संरचनात्मक बाधाएँ अभी भी महिलाओं के आर्थिक सशक्तीकरण में बाधा उत्पन्न करती हैं।
वास्तविक समानता की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम
- आर्थिक मूल्य की मान्यता: अवैतनिक देखभाल कार्य का मौद्रिक मूल्य निर्धारित करना गृहिणियों के योगदान को GDP से परे अर्थव्यवस्था में मान्यता देता है।
- उदाहरण: सर्वोच्च न्यायालय (2026) ने रेशमा मामले में मुआवजा निर्धारण के दौरान गृहिणियों के घरेलू कार्य का न्यूनतम मूल्य ₹30,000 प्रति माह निर्धारित किया है।
- गरिमा एवं स्थिति: गृहिणियों को योगदानकर्ता के रूप में मान्यता देना पारंपरिक रूप से स्त्री-प्रधान कार्यों को महत्त्व देकर वास्तविक समानता को बढ़ावा देता है।
- लैंगिक न्याय: यह निर्णय समानता को केवल औपचारिक रूप से नहीं, बल्कि लैंगिक वास्तविकताओं को ध्यान में रखते हुए वास्तविक समानता को आगे बढ़ाता है।
- न्यायिक उदाहरण: मोटर दुर्घटना मामलों में अवैतनिक घरेलू देखभाल कार्य का मूल्य ₹30,000 प्रति माह निर्धारित कर एक बेंचमार्क स्थापित किया गया, जो भविष्य के मुआवजा निर्धारण को प्रभावित करेगा।
- नीतिगत दृश्यता: अवैतनिक देखभाल कार्य को सार्वजनिक नीति और साक्ष्य-आधारित निर्णय प्रक्रिया में स्थान मिलता है।
- उदाहरण: MoSPI का टाइम यूज सर्वे (2019) दर्शाता है कि महिलाएँ प्रतिदिन औसतन 289 मिनट अवैतनिक घरेलू कार्य करती हैं, जबकि पुरुष केवल 88 मिनट, जिससे 201 मिनट का लैंगिक अंतराल स्पष्ट होता है।
प्रणालीगत कमियाँ
- श्रम से बहिष्करण: मृत्यु के पश्चात् अवैतनिक कार्य का मूल्यांकन महिलाओं को रोजगार बाजार में प्रवेश से रोकने वाली बाधाओं का समाधान नहीं करता है।
- देखभाल अवसंरचना की कमी: अपर्याप्त सहायक प्रणालियों के कारण महिलाएँ अभी भी अवैतनिक देखभाल संबंधी जिम्मेदारियों का असमान भार वहन करती हैं।
- वेतन असमानता: गृहकार्य की मान्यता के बावजूद श्रम बाजार में व्याप्त भेदभाव समाप्त नहीं होता है।
- अनौपचारिक रोजगार: अधिकांश कार्यरत महिलाएँ असुरक्षित एवं निम्न वेतन वाले अनौपचारिक क्षेत्रों में ही केंद्रित हैं।
- संपत्ति एवं संसाधन की कमी: वित्तीय मूल्यांकन से महिलाओं की उत्पादक संसाधनों पर स्वामित्व एवं निर्णय-निर्माण शक्ति में सुधार नहीं होता है।
- उदाहरण: कृषि जनगणना, 2015-16 के अनुसार, महिलाओं के पास केवल लगभग 14% कृषि भूमि जोतों का संचालन है।
आगे की राह
- देखभाल अर्थव्यवस्था: अवैतनिक देखभाल भार को कम करने हेतु गुणवत्तापूर्ण बाल देखभाल, वृद्ध देखभाल एवं सामुदायिक सहायता सेवाओं का विस्तार करना।
- उदाहरण: सक्षम आंगनवाड़ी एवं पोषण 2.0 अंतर्गत आंगनवाड़ी सेवाओं को सुदृढ़ एवं सार्वभौमिक बनाना।
- रोजगार तक पहुँच: महिलाओं की कौशल, औपचारिक रोजगार एवं उद्यमिता तक पहुँच को बढ़ाना।
- उदाहरण: स्किल इंडिया मिशन तथा पीएम विश्वकर्मा जैसी पहलें महिलाओं की आजीविका को लक्षित करती हैं।
- समान वेतन: वेतन संहिता, 2019 के अंतर्गत गैर-भेदभावपूर्ण वेतन सुनिश्चित करने वाले कानूनों का प्रभावी क्रियान्वयन करना।
- संपत्ति स्वामित्व: भूमि, आवास एवं वित्तीय परिसंपत्तियों पर महिलाओं के स्वामित्व को प्रोत्साहित करना।
- उदाहरण: प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण एवं शहरी) के अंतर्गत संपत्ति का पंजीकरण महिलाओं के नाम पर करने को बढ़ावा दिया जाता है।
- लैंगिक बजटिंग: अवैतनिक देखभाल से जुड़े मुद्दों को राजकोषीय योजना एवं कार्यक्रम निर्माण में शामिल करना।
- उदाहरण: केंद्रीय बजट में लैंगिक बजट विवरण के माध्यम से लैंगिक-संवेदनशील व्यय को संस्थागत रूप दिया गया है।
निष्कर्ष
यद्यपि गृहिणियों के श्रम का न्यायिक मूल्यांकन औपचारिक समानता से आगे बढ़कर वास्तविक समानता की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन को दर्शाता है, तथापि वास्तविक आर्थिक सशक्तीकरण के लिए देखभाल अवसंरचना के विकास, समान अवसरों की उपलब्धता तथा लैंगिक-संवेदनशील संस्थागत ढाँचों के माध्यम से संरचनात्मक बाधाओं को समाप्त करना आवश्यक है।