प्रश्न की मुख्य माँग
- संवैधानिक प्रावधानों और लोकतांत्रिक ढाँचे के बावजूद भारत के शासन में क्षेत्रवाद एक सतत चुनौती क्यों बनी हुई है, इस पर टिप्पणी कीजिए।
- संघीय लचीलेपन के माध्यम से विविध पहचानों के प्रबंधन में भारत का दृष्टिकोण किस प्रकार सफल रहा है, इसका परीक्षण कीजिए।
- क्षेत्रीय आकांक्षाओं को संबोधित करने में संघीय लचीलेपन के माध्यम से विविध पहचानों के प्रबंधन के लिए भारत के दृष्टिकोण में कमियों का आकलन कीजिए।
- आगे की राह लिखिये।
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उत्तर
क्षेत्रवाद एक राजनीतिक और सामाजिक विचारधारा है जो राष्ट्रीय या केंद्रीय चिंताओं के बजाय किसी विशिष्ट क्षेत्र के हितों, संस्कृति और आवश्यकताओं को प्राथमिकता देती है। भारत में क्षेत्रवाद नृजातीय, भाषाई और सांस्कृतिक पहचानों के जटिल अंतर्संबंध को दर्शाता है, जिसके परिणामस्वरूप भारत में अक्सर अधिक स्वायत्तता और संसाधन नियंत्रण की माँग होती है। जबकि संवैधानिक प्रावधानों और संघीय ढाँचे का उद्देश्य एकता और विविधता को संतुलित करना है, क्षेत्रीय आकांक्षाएँ भारत की शासन प्रक्रिया में चुनौतियाँ उत्पन्न करती रहती हैं। इन माँगों को संबोधित करने के लिए एक सावधानीपूर्ण अपनाये गये दृष्टिकोण की आवश्यकता है, क्योंकि क्षेत्रवाद स्थानीय शासन को सशक्त कर सकता है और अगर इससे संबंधित समस्याओं का उचित समाधान नहीं किया गया तो यह राष्ट्रीय एकता को नुकसान भी पहुँचा सकता है।
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भारत की शासन-व्यवस्था में क्षेत्रवाद एक सतत चुनौती क्यों बना हुआ है?
- नृजातीय और सांस्कृतिक विविधता: भारत की विशाल विविधता के परिणामस्वरूप विशिष्ट नृजातीय और सांस्कृतिक समूह अक्सर अपनी विशिष्ट पहचान को बनाए रखने के लिए स्वायत्तता की माँग करते हैं, जिससे कभी-कभी क्षेत्रवाद को बढ़ावा मिलता है।
- क्षेत्रों के बीच आर्थिक असमानताएँ: राज्यों के बीच आर्थिक असमानताएँ क्षेत्रवाद को बढ़ावा देती हैं, क्योंकि अविकसित क्षेत्र, विकास के लिए अधिक संसाधनों और अवसरों की माँग करते हैं।
- बोली एवं भाषाई पहचान: भाषा, क्षेत्रीय पहचान में केंद्रीय भूमिका निभाती है जिससे अक्सर भाषाई मामलों में आधिकारिक मान्यता और स्वायत्तता की माँग उठती है।
- संसाधन नियंत्रण और स्थानीय प्राथमिकताएँ: कई क्षेत्र अक्सर स्थानीय संसाधनों पर नियंत्रण की माँग करते हैं ताकि स्थानीय आवश्यकताओं और आकांक्षाओं के अनुरूप विकास किया जा सके, जिससे तनाव उत्पन्न होता है।
- उदाहरण के लिए: कर्नाटक जैसे राज्यों ने अंतर-राज्यीय समझौतों के बजाय स्थानीय कृषि को प्राथमिकता देते हुए कावेरी जैसी नदियों के जल पर अपना अधिकार जताया है।
- क्षेत्रीय भावनाओं पर केंद्रित राजनीतिक लामबंदी: क्षेत्रीय दल, राजनीतिक समर्थन हासिल करने के लिए स्थानीय मुद्दों और भावनाओं का लाभ उठाते हैं, जिससे कभी-कभी क्षेत्रवाद भी बढ़ता है।
- उदाहरण के लिए: तेलंगाना के राजनीतिक अभियानों में क्षेत्रीय उपेक्षा के मुद्दों पर जोर दिया गया, जिसके परिणामस्वरूप वर्ष 2014 में एक अलग राज्य का गठन हुआ।
संघीय लचीलेपन के माध्यम से विविध पहचानों के प्रबंधन के लिए भारत के दृष्टिकोण की सफलताएँ
- नए राज्यों का गठन: भारत के संघीय लचीलेपन ने क्षेत्रीय आकांक्षाओं को संबोधित करते हुए भाषाई और सांस्कृतिक पहचान के आधार पर नए राज्यों के निर्माण की सुविधा प्रदान की।
- उदाहरण के लिए: वर्ष 1956 में भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन द्वारा आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों का निर्माण हुआ जो तेलुगु भाषी आबादी की पहचान और आवश्यकताओं को बेहतर ढंग से दर्शाने के लिए किया गया था ।
- स्थानीय शासन का सशक्तिकरण: पंचायती राज प्रणाली ने स्थानीय निकायों को सशक्त बनाया है, जिससे राज्यों को जमीनी स्तर पर शासन को प्रभावी ढंग से प्रबंधित करने में मदद मिली है।
- उदाहरण के लिए: केरल में स्थानीय शासन सुधारों के माध्यम से किये गये विकेंद्रीकरण ने समुदायों को निर्णय लेने की प्रक्रिया में भाग लेने में सक्षम बनाया है, जिससे समावेशी विकास को बढ़ावा मिला है ।
- राज्यों को वित्तीय स्वायत्तता: भारत की संघीय प्रणाली राज्यों को काफी वित्तीय स्वायत्तता प्रदान करती है, जिससे वे राज्य-विशिष्ट नीतियों के माध्यम से स्वतंत्र रूप से स्थानीय आवश्यकताओं को पूरा कर सकते हैं।
- उदाहरण के लिए: महाराष्ट्र जैसे राज्यों ने क्षेत्र-विशिष्ट नीतियाँ विकसित की हैं, जैसे कि IT क्षेत्र के लिए विशेष प्रोत्साहन, जिससे स्थानीय आर्थिक विकास को बढ़ावा मिलता है।
- शिक्षा और प्रशासन में भाषाई समायोजन: राज्यों को शिक्षा और प्रशासन के क्षेत्र में क्षेत्रीय भाषाओं को बढ़ावा देने की अनुमति है, जिससे सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखते हुए एकता बनाए रखी जा सके।
- उदाहरण के लिए: NEP द्वारा लागू किया गया त्रि-भाषा फॉर्मूला छात्रों को हिंदी और अंग्रेजी के साथ-साथ क्षेत्रीय भाषाएँ सीखने में सक्षम बनाता है, जिससे क्षेत्रीय पहचान का सम्मान करते हुए भाषाई सद्भाव को बढ़ावा मिलता है।
- विकासात्मक विविधता के लिए समर्थन: संघीय लचीलापन, राज्यों को क्षेत्रीय आर्थिक आवश्यकताओं के अनुकूल नीतियों को लागू करने की अनुमति देता है, जिससे संतुलित विकास को बढ़ावा मिलता है।
- उदाहरण के लिए: भारत द्वारा औद्योगिक नीतियों पर बल देने से स्थानीय विकास आवश्यकताओं के अनुरूप कार्य किया गया है, जिससे तीव्र आर्थिक विकास और रोजगार सृजन में योगदान मिला है।
क्षेत्रीय आकांक्षाओं को संबोधित करने में भारत के दृष्टिकोण में कमियाँ
- असमान संसाधन आवंटन: संघीय लचीलेपन के बावजूद, कुछ राज्यों को लगता है कि संसाधनों का आवंटन असमान रूप से किया जाता है, जिससे असंतोष और क्षेत्रीय माँगों को बढ़ावा मिलता है।
- उदाहरण के लिए: पूर्वोत्तर राज्यों ने केंद्रीय अनुदान में देरी, क्षेत्रीय विकास पर इसके प्रभाव और वहाँ उत्पन्न हो रही असंतोष की भावना को लेकर अपनी चिंतायें व्यक्त की हैं।
- अंतर-राज्यीय जल विवाद: जल-बंटवारे के मुद्दे अभी भी विवादास्पद बने हुए हैं क्योंकि कभी-कभी व्यापक संघीय हितों की अनदेखी करते हुए राज्य, स्थानीय आवश्यकताओं को प्राथमिकता देते हैं।
- उदाहरण के लिए: तमिलनाडु और कर्नाटक के बीच कावेरी जल विवाद साझा संसाधनों को लेकर होने वाले क्षेत्रीय संघर्षों को हल करने में आने वाली चुनौतियों को रेखांकित करता है।
- कुछ नीतिगत क्षेत्रों में सीमित स्वायत्तता: केंद्र सरकार प्रमुख क्षेत्रों पर काफी अधिकार रखती है, जिससे राज्यों की क्षेत्रीय आवश्यकताओं को पूरी तरह से संबोधित करने की क्षमता सीमित हो जाती है।
- उदाहरण के लिए: हालाँकि स्वास्थ्य एक राज्य का विषय है, परंतु आयुष्मान भारत जैसी केंद्रीकृत योजनाएँ अक्सर राज्यों को स्थानीय आवश्यकताओं के अनुसार स्वास्थ्य सेवा मॉडल तैयार करने से रोकती हैं।
- विकेंद्रीकरण का असंगत कार्यान्वयन: हालाँकि कुछ राज्यों ने विकेंद्रीकरण की दिशा में प्रगति की है, अन्य राज्यों में क्षमता या राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी है, जिससे असमान क्षेत्रीय विकास होता है।
- उदाहरण के लिए: राज्यों को अक्सर पंचायती राज सुधारों को प्रभावी ढंग से लागू करने में चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, जिससे जमीनी स्तर पर भागीदारी की संभावना सीमित हो जाती है ।
- राजनीतिक केंद्रीकरण के रुझान: ऐसी चिंताएँ हैं कि केंद्रीय योजनाओं और नीतियों के माध्यम से बढ़ता केंद्रीकरण, राज्यों की स्वायत्तता को कमजोर कर सकता है जिससे क्षेत्रवाद को बढ़ावा मिल सकता है।
- उदाहरण के लिए: राज्यों में केंद्र द्वारा नियंत्रित योजनाओं को लागू करने का कभी-कभी विरोध किया जाता है, क्योंकि राज्य सरकारों को लगता है कि उनकी विशिष्ट आवश्यकताओं को अनदेखा किया जा रहा है।
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आगे की राह
- राजकोषीय संघवाद को मजबूत करना: राज्यों की वित्तीय स्वायत्तता को बढ़ाना चाहिए जिससे उन्हें स्थानीय आवश्यकताओं को प्रभावी ढंग से पूरा करने और आर्थिक असमानताओं को कम करने में मदद मिलेगी।
- उदाहरण के लिए: वित्त आयोग के हस्तांतरण के फार्मूले पर पुनर्विचार करने से वंचित क्षेत्रों में संसाधनों का अधिक न्यायसंगत वितरण सुनिश्चित हो सकता है।
- अंतर-राज्यीय समन्वय के लिए संस्थागत तंत्र: संसाधनों के बंटवारे और क्षेत्रीय विवादों
जैसे अंतर-राज्यीय मुद्दों का सौहार्दपूर्ण ढंग से समाधान करने के लिए स्थायी निकायों की स्थापना करनी चाहिए।
- उदाहरण के लिए: नदी बेसिन प्रबंधन प्राधिकरणों के निर्माण से सहयोगात्मक प्रबंधन के माध्यम से बार-बार होने वाले जल विवादों को सुलझाने में मदद मिल सकती है।
- क्षेत्रीय विकास योजनाओं को प्रोत्साहित करना: स्थानीय प्राथमिकताओं को संबोधित करने, संतुलित विकास सुनिश्चित करने और क्षेत्रीय असमानताओं को कम करने के लिए क्षेत्र-विशिष्ट विकास योजनाओं को बढ़ावा देना चाहिए।
- सांस्कृतिक संवाद और एकीकरण को बढ़ावा देना: क्षेत्रीय विभाजन को कम करने के लिए सांस्कृतिक आदान-प्रदान कार्यक्रमों को बढ़ावा देना चाहिए जिससे अंततः एक एकीकृत परंतु विविध राष्ट्रीय पहचान को बढ़ावा मिलेगा।
- उदाहरण के लिए: ‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’ पहल राज्यों के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान को प्रोत्साहित करती है, समझ को बढ़ावा देती है और क्षेत्रीय अलगाव को कम करती है।
- स्थानीय शासन संस्थाओं को सशक्त बनाना: स्थानीय शासन और भागीदारी को बढ़ाने के लिए पंचायती राज प्रणाली को मजबूत करना चाहिए, जिससे क्षेत्रीय आकांक्षाओं के प्रति प्रभावी प्रतिक्रियाएँ संभव हो सकें।
- उदाहरण के लिए: पंचायतों को अतिरिक्त निधि और निर्णय लेने की शक्तियाँ प्रदान करने से स्थानीय शासन को बढ़ावा मिल सकता है और क्षेत्र-विशिष्ट मुद्दों का समाधान हो सकता है।
भारत में क्षेत्रवाद की समस्या का समाधान करने के लिए एक संतुलित दृष्टिकोण की आवश्यकता है, जिसमें राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देते हुए संघीय लचीलेपन को अपनाया जाना चाहिए। राजकोषीय संघवाद को मजबूत करने, अंतर-राज्य समन्वय में सुधार करने और स्थानीय शासन को प्रोत्साहित करने से, भारत की एकता से समझौता किए बिना क्षेत्रीय आकांक्षाओं को संबोधित करने में मदद मिल सकती है। जैसे-जैसे भारत आगे बढ़ेगा उसे विविध क्षेत्रीय पहचानों को समायोजित करने के लिए अपने संघीय ढाँचे को विकसित करना होगा जिससे एक समावेशी और एकजुट समाज सुनिश्चित हो सके।