Q. स्थानीय स्वशासन की संस्थाओं में महिलाओं के लिए सीटों के आरक्षण का भारतीय राजनीतिक प्रक्रिया के पितृसत्तात्मक स्वरूप पर सीमित प्रभाव पड़ा है।" टिप्पणी कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)

April 16, 2026

GS Paper IIIndian Polity

प्रश्न की मुख्य माँग

  • सीमित प्रभाव के कारणों का उल्लेख कीजिए।
  • गहन प्रभावों का उल्लेख कीजिए। 
  • आगे की राह सुझाइए।

उत्तर

स्थानीय स्वशासन में महिलाओं के लिए आरक्षण, जिसे 73वें और 74वें संविधान संशोधनों द्वारा अनिवार्य किया गया, का उद्देश्य मूलभूत स्तर पर लोकतंत्रीकरण करना था। यद्यपि इससे महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है, लेकिन गहराई से जड़ जमाए पितृसत्तात्मक ढाँचों को गौण बनाने पर इसका प्रभाव अभी भी विवादित बना हुआ है।

सीमित प्रभाव 

  • प्रॉक्सी नेतृत्व: निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों के निर्णयों को अक्सर पुरुष नियंत्रित करते हैं।
    • उदाहरण: पंचायती राज मंत्रालय के अध्ययन कई राज्यों में “प्रधान पति” जैसी प्रवृत्ति को दर्शाते हैं।
  • सामाजिक बाधाएँ: पितृसत्तात्मक मान्यताएँ महिलाओं की गतिशीलता, आवाज और स्वायत्तता को सीमित करती हैं।
    • उदाहरण: राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे (NFHS) डेटा घरेलू निर्णय-निर्माण में लैंगिक असमानता को दर्शाता है।
  • क्षमता की कमी: प्रशिक्षण और जागरूकता के अभाव में महिलाओं की प्रभावी भागीदारी सीमित रहती है।
  • प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व: आरक्षण कभी-कभी वास्तविक अधिकार के बिना केवल औपचारिक उपस्थिति तक सीमित रह जाता है।
  • संरचनात्मक बाधाएँ: पंचायतों के सीमित वित्तीय और प्रशासनिक अधिकार उनके परिवर्तनकारी प्रभाव को कम करते हैं।
    • उदाहरण: वित्त आयोग की रिपोर्टें स्थानीय निकायों की राज्य सरकारों पर निर्भरता को उजागर करती हैं।

गहन प्रभाव 

  • राजनीतिक प्रवेश: आरक्षण ने महिलाओं के बड़े पैमाने पर राजनीति में प्रवेश को संभव बनाया।
    • उदाहरण: पंचायती राज संस्थाओं में 14 लाख से अधिक महिलाएँ निर्वाचित (पंचायती राज मंत्रालय)।
  • नीतिगत प्राथमिकताएँ: महिला प्रतिनिधि स्वास्थ्य, शिक्षा और स्वच्छता जैसे कल्याणकारी मुद्दों पर अधिक ध्यान देती हैं।
    • उदाहरण: महिला-नेतृत्व वाली पंचायतों में पेयजल और स्वच्छता के बेहतर परिणाम देखे गए हैं।
  • सामाजिक परिवर्तन: महिलाओं का नेतृत्व पारंपरिक लैंगिक भूमिकाओं और रूढ़ियों को चुनौती देता है।
    • उदाहरण: बिहार और राजस्थान जैसे राज्यों में सार्वजनिक भूमिकाओं में महिलाओं की स्वीकृति बढ़ी है।
  • नेतृत्व विकास: जमीनी स्तर का अनुभव भविष्य के राजनीतिक नेतृत्व के लिए आधार तैयार करता है।
    • उदाहरण: कई महिला विधायकों और सांसदों  ने अपने कॅरियर की शुरुआत पंचायत प्रतिनिधि के रूप में की।
  • समावेशी शासन: विशेषकर SC/ST महिलाओं सहित वंचित समूहों की बेहतर भागीदारी सुनिश्चित होती है।
    • उदाहरण: आरक्षण से मूलभूत स्तर पर बहु-आयामी प्रतिनिधित्व सुनिश्चित होता है।

आगे की राह

  • क्षमता निर्माण: महिलाओं के लिए निरंतर प्रशिक्षण और नेतृत्व विकास कार्यक्रम आवश्यक हैं।
    • उदाहरण: राष्ट्रीय ग्राम स्वराज अभियान (RGSA) कौशल विकास को बढ़ावा देता है।
  • कानूनी सुरक्षा: प्रॉक्सी प्रतिनिधित्व को रोकने के लिए सख्त कानूनी प्रावधान बनाए जाएँ।
    • उदाहरण: “प्रधान पति” के हस्तक्षेप के विरुद्ध राज्य स्तर पर कार्रवाई।
  • वित्तीय सशक्तीकरण: स्थानीय निकायों की वित्तीय स्वायत्तता को मजबूत करना।
    • उदाहरण: वित्त आयोग अनुदानों का सीधे पंचायतों को हस्तांतरण।
  • सामाजिक जागरूकता: पितृसत्तात्मक मान्यताओं को चुनौती देने के लिए लैंगिक संवेदनशीलता को बढ़ावा देना।
    • उदाहरण: बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ अभियान।
  • संस्थागत समर्थन: महिला नेताओं के लिए मार्गदर्शन, नेटवर्क और प्रशासनिक सहयोग सुनिश्चित करना।

निष्कर्ष

महिलाओं के लिए आरक्षण ने भारत की राजनीतिक व्यवस्था में एक मौन परिवर्तन की शुरुआत की है, लेकिन गहराई से जड़ जमाए पितृसत्तात्मक ढाँचे इसके पूर्ण प्रभाव को सीमित करते हैं। संस्थागत समर्थन को सुदृढ़ करना और सामाजिक परिवर्तन को बढ़ावा देना आवश्यक है, ताकि वर्णनात्मक प्रतिनिधित्व को वास्तविक लैंगिक समानता में परिवर्तित किया जा सके।

The reservation of seats for women in the institutions of local self-government has had a limited impact on the patriarchal character of the Indian Political Process.” Comment. in hindi

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