Q. जनजातीय क्षेत्रों में प्रचुर संसाधन उपलब्धता अक्सर 'विकास बनाम विस्थापन' को जन्म देती है। पूर्वी भारत में बॉक्साइट खनन के संदर्भ में चिंताओं का विश्लेषण कीजिए। विकास और स्वदेशी अधिकारों के बीच सामंजस्य स्थापित करने के उपाय सुझाइए। (15 अंक, 250 शब्द)

प्रश्न की मुख्य माँग

  • संसाधन–विस्थापन संबंधों की चर्चा कीजिए।
  • खनन से जुड़ी चिंताओं को रेखांकित कीजिए।
  • आगे की राह सुझाइए।

उत्तर

भारत के खनिज-संपन्न जनजातीय क्षेत्र, विशेषकर पूर्वी भारत, ‘विकास बनाम विस्थापन’ की दुविधा को उजागर करते हैं, जहाँ संसाधन-आधारित विकास अक्सर आदिवासी अधिकारों, आजीविकाओं और पर्यावरणीय संतुलन के साथ संघर्ष की स्थिति उत्पन्न हो जाती है, जैसा कि ओडिशा में हाल के बॉक्साइट खनन विवादों में देखा गया है।

मुख्य भाग

संसाधन–विस्थापन संबंध

  • संसाधनों का संकेंद्रण: जनजातीय क्षेत्रों में खनिज संपदा की प्रचुरता बड़े पैमाने पर खनन परियोजनाओं को आकर्षित करती है।
    • उदाहरण: ओडिशा में भारत के लगभग 41% बॉक्साइट संसाधन पाए जाते हैं (भारतीय खान ब्यूरो, 2022)।
  • भूमि अधिग्रहण: खनन के लिए वन भूमि और सामुदायिक भूमि का उपयोग परिवर्तन आवश्यक होता है।
    • उदाहरण: सिजिमाली परियोजना रायगढ़ और कालाहांडी में लगभग 1,500 हेक्टेयर क्षेत्र को कवर करती है।
  • आजीविका की हानि: वन-आधारित समुदाय अपने पारंपरिक संसाधनों तक पहुँच खो देते हैं।
    • उदाहरण: रायगढ़ में जनजातीय समुदायों ने अपनी आजीविका पर खतरे के कारण खनन का विरोध किया।
  • राज्य–कॉरपोरेट गठजोड़: विकास परियोजनाएँ अक्सर स्थानीय सहमति के बजाय औद्योगिक विकास को प्राथमिकता देती हैं।
    • उदाहरण: वर्ष 2023 में बॉक्साइट खदान को वेदांता लिमिटेड को नीलामी के माध्यम से आवंटित किया गया।
  • संघर्ष का उभरना: विश्वास और सहभागिता की कमी विरोध और हिंसा को जन्म देती है।

खनन से जुड़ी चिंताएँ 

  • सहमति संबंधी समस्याएँ: ग्राम सभा की स्वीकृति की निष्पक्षता पर अक्सर प्रश्न उठते हैं।
    • उदाहरण: वन अधिकार अधिनियम के तहत ग्राम सभा की सहमति में जाली हस्ताक्षरों के आरोप लगाए गए।
  • अधिकारों का उल्लंघन: कार्यान्वयन के दौरान जनजातीय अधिकारों का हनन होता है।
    • उदाहरण: सड़क निर्माण से पहले उचित परामर्श न किए जाने के आरोप।
  • सांस्कृतिक खतरा: खनन पवित्र स्थलों और सांस्कृतिक पहचान को प्रभावित करता है।
    • उदाहरण: नियमगिरी मामले में डोंगरिया कोंध समुदाय नियम राजा की पूजा करता है।
  • पर्यावरणीय क्षति: खनन से वन, जैव विविधता और जल संसाधनों का क्षरण होता है।
  • बलपूर्वक कार्रवाई: बल प्रयोग से राज्य और समुदायों के बीच अविश्वास बढ़ता है।
    • उदाहरण: विरोध प्रदर्शनों के दौरान पुलिस छापे, बिजली कटौती और बल प्रयोग के आरोप।

आगे की राह

  • स्वतंत्र एवं सूचित सहमति: ग्राम सभा की वास्तविक, पूर्व और सूचित सहमति सुनिश्चित की जाए।
    • उदाहरण: सर्वोच्च न्यायालय (2013) ने नियमगिरी मामले में ग्राम सभा की स्वीकृति को अनिवार्य किया।
  • अधिकारों का प्रवर्तन: वन अधिकार अधिनियम के प्रावधानों का कड़ाई से पालन कर मंजूरी प्रक्रिया को सुनिश्चित किया जाए।
  • लाभ साझेदारी: स्थानीय समुदायों को खनन से होने वाले लाभ और रोजगार में भागीदारी दी जाए।
    • उदाहरण: जिला खनिज फाउंडेशन (DMF) के माध्यम से जनजातीय कल्याण के लिए निधि।
  • सतत् खनन: न्यूनतम विस्थापन के साथ पर्यावरण-संवेदनशील खनन को अपनाया जाए।
    • उदाहरण: वन स्वीकृति के प्रथम चरण में प्रतिपूरक वनीकरण को अनिवार्य करना।
  • सहभागी शासन: निर्णय-निर्माण और निगरानी में जनजातीय समुदायों की भागीदारी सुनिश्चित की जाए।
    • उदाहरण: परियोजनाओं की स्वीकृति से पहले बहु-हितधारक परामर्श।

निष्कर्ष

विकास और विस्थापन के बीच संतुलन स्थापित करने के लिए संसाधन, शासन में न्याय, सहमति और सततता को समाहित करना आवश्यक है। जनजातीय समुदायों को पीड़ित के बजाय हितधारक के रूप में सशक्त बनाकर खनिज-संपन्न क्षेत्रों में समावेशी और समानतापूर्ण विकास सुनिश्चित किया जा सकता है।

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