Q. 'भूल जाने का अधिकार' (Right to Be Forgotten) सूचनात्मक आत्म-निर्धारण और प्रेस की स्वतंत्रता के जटिल मिलन बिंदु पर कार्य करता है। हाल के न्यायिक निर्णयों के आलोक में, आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिए कि क्या भारत को 'गैग ऑर्डर्स' (Gag Orders) के माध्यम से RTBF के दुरुपयोग को रोकने के लिए एक वैधानिक संतुलन परीक्षण की आवश्यकता है। (15 अंक, 250 शब्द)

April 20, 2026

GS Paper IIIndian Polity

प्रश्न की मुख्य माँग

  • वैधानिक परीक्षण के लाभों की चर्चा कीजिए। 
  • वैधानिक परीक्षण से संबंधित चिंताओं को रेखांकित कीजिए।
  • आगे की राह सुझाइए।

उत्तर

अनुच्छेद-21 के तहत विकसित हो रहा ‘भूल जाने का अधिकार’ सूचनात्मक आत्म-निर्णय को दर्शाता है, लेकिन अनुच्छेद-19 के तहत प्रेस की स्वतंत्रता के साथ इसका संघर्ष बढ़ता जा रहा है। हालिया न्यायिक जाँच से यह बात सामने आई है कि परस्पर विरोधी अधिकारों को संतुलित करने के लिए संरचित कानूनी मानकों की आवश्यकता है या नहीं, इसकी जाँच करना आवश्यक है।

वैधानिक परीक्षण के लाभ

  • स्पष्ट मानक: एक वैधानिक संतुलन परीक्षण न्यायालयों को RTBF दावों के निर्णय में एकरूप और पूर्वानुमेय मानदंड प्रदान करेगा।
    • उदाहरण: दिल्ली उच्च न्यायालय (2025) के एक निर्णय में सही रिपोर्टिंग के बावजूद सामग्री हटाने का आदेश दिया गया, जो असंगति को दर्शाता है।
  • दुरुपयोग की रोकथाम: यह सत्य और सार्वजनिक महत्त्व की जानकारी को हटाने को सीमित करेगा।
    • उदाहरण: आईई ऑनलाइन मीडिया सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड बनाम भारत संघ RTBF मामले में अत्यधिक संख्या में समान दावों/याचिकाओं के अनियंत्रित रूप से बढ़ने की संभावना के प्रति चेतावनी व्यक्त की। 
  • प्रेस की सुरक्षा: एक संरचित ढाँचा RTBF दावों के माध्यम से मीडिया स्वतंत्रता पर मनमाने प्रतिबंधों से सुरक्षा प्रदान करेगा।
    • उदाहरण: सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि RTBF का उपयोग प्रेस स्वतंत्रता पर भय उत्पन्न करने के लिए नहीं किया जा सकता है।
  • अधिकारों का संतुलन: यह गोपनीयता के अधिकार और सूचना के अधिकार के बीच व्यवस्थित संतुलन स्थापित करने में सहायक होगा।
    • उदाहरण: न्यायालय ने RTBF को अनुच्छेद-21 का हिस्सा माना, परंतु इसे पूर्ण अधिकार नहीं माना है।
  • अभिलेखों का संरक्षण: यह सुनिश्चित करेगा कि सही ऐतिहासिक अभिलेख और जनहित की जानकारी अनावश्यक रूप से हटाई न जाए।

वैधानिक परीक्षण से संबंधित चिंताएँ

  • कठोर ढाँचा: एक संहिताबद्ध परीक्षण RTBF मामलों की विविध और जटिल प्रकृति को समुचित रूप से संबोधित करने में कठोरता दिखा सकता है।
    • उदाहरण: सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिल्ली उच्च न्यायालय के आदेश पर रोक यह दर्शाती है कि संदर्भानुसार लचीलापन आवश्यक है।
  • विवेकाधिकार में कमी: यह न्यायिक विवेक को सीमित कर सकता है, जबकि वर्तमान में अदालतें सत्य, समय और जनहित जैसे कारकों का प्रकरण-आधारित मूल्यांकन करती हैं।
  • अपरिपक्व कानून: RTBF के अभी विकसित होते चरण में इसे संहिताबद्ध करना इसके दायरे को स्थिर कर सकता है और भविष्य में सुधार की संभावना को सीमित कर सकता है।
    • उदाहरण: सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि वर्तमान टिप्पणियाँ “एक मिसाल” नहीं हैं।
  • गोपनीयता जोखिम: एक कठोर परीक्षण प्रतिष्ठा हानि और गरिमा से जुड़े वास्तविक दावों को कमजोर कर सकता है।
    • उदाहरण: दिल्ली उच्च न्यायालय ने व्यक्ति के बरी होने के बावजूद “स्थायी कलंक” को रेखांकित किया।
  • प्रवर्तन संबंधी मुद्दे: डिजिटल प्लेटफॉर्म्स और विभिन्न अधिकार-क्षेत्रों में एकसमान मानकों को लागू करना कठिन हो सकता है।
    • उदाहरण: ऑनलाइन डेटा की स्थायित्व और सर्च इंडेक्सिंग प्रभावी प्रवर्तन को जटिल बनाते हैं।

आगे की राह

  • दिशा-निर्देश आधारित दृष्टिकोण: कठोर वैधानिक प्रावधानों के बजाय न्यायिक रूप से विकसित सिद्धांतों को अपनाया जाना चाहिए।
    • उदाहरण: सर्वोच्च न्यायालय में चल रही कार्यवाही आनुपातिकता आधारित मानकों को विकसित कर सकती है।
  • जनहित मानदंड: सत्य, प्रासंगिकता, और सामाजिक महत्त्व के आधार पर एक स्पष्ट परीक्षण को संस्थागत रूप दिया जाना चाहिए।
  • स्तरीय समाधान: हटाने के बजाय डी-इंडेक्सिंग या प्रासंगिक अद्यतन जैसे सूक्ष्म समाधान अपनाएँ।
  • समय कारक: सूचना की निरंतर उपलब्धता का निर्णय करते समय, समय की प्रासंगिकता को शामिल करें।
  • युक्तिसंगत आदेश: न्यायालयों को विस्तृत और पारदर्शी तर्क प्रस्तुत करने चाहिए, ताकि अनुच्छेद-19 और अनुच्छेद-21 के बीच संतुलन स्पष्ट रूप से स्थापित हो सके।

निष्कर्ष

यद्यपि एक वैधानिक संतुलन परीक्षण स्पष्टता बढ़ाने और दुरुपयोग को रोकने में सहायक हो सकता है, अत्यधिक कठोरता न्यायिक सूक्ष्मता को कमजोर कर सकती है। विकसित होती न्यायिक व्याख्या, आनुपातिकता और पारदर्शिता पर आधारित एक संतुलित दृष्टिकोण ही डिजिटल युग में गोपनीयता और प्रेस की स्वतंत्रता के बीच प्रभावी सामंजस्य स्थापित कर सकता है।

The Right to Be Forgotten operates at the complex intersection of informational self-determination and the freedom of the press. In light of recent judicial pronouncements, critically analyze whether India needs a statutory balancing test to prevent the misuse of RTBF through ‘gag orders’. in hindi

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