प्रश्न की मुख्य माँग
- एक सांविधिक अधिकार के रूप में मतदान।
- मतदान के संवैधानिक/मौलिक आयामों के प्रति बदलती न्यायिक मान्यता।
- नागरिक भागीदारी और लोकतांत्रिक शासन पर इसके प्रभाव।
|
उत्तर
परिचय
सात दशकों से भी अधिक समय से, सर्वोच्च न्यायालय का यह मत रहा है कि मतदान का कार्य सांविधिक है, जो मुख्य रूप से जनप्रतिनिधित्व अधिनियमों द्वारा शासित होता है। हालाँकि, न्यायिक निर्णयों की एक शृंखला ने धीरे-धीरे मतदान के विभिन्न पहलुओं को संवैधानिक रूप प्रदान किया है, जिससे एक ऐसा विरोधाभास उत्पन्न हो गया है, जहाँ मतदान का प्रयोग तो मौलिक अधिकारों के संरक्षण से सुसज्जित है, परंतु औपचारिक रूप से यह अधिकार अभी भी सांविधिक ही बना हुआ है। यह तनाव अनुच्छेद-326, 19(1)(क) और बुनियादी ढाँचे (मूल संरचना) के सिद्धांत के बीच परस्पर क्रिया से उत्पन्न होता है।
IAS coaching
सांविधिक अधिकार के रूप में मतदान
- संसदीय ढाँचा: अनुच्छेद-326 सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के माध्यम से लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव का आदेश देता है, जबकि संसद इसकी योग्यताओं और प्रक्रियाओं को परिभाषित करती है।
- उदाहरण: जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, मतदाता पंजीकरण, पात्रता और अयोग्यता के मानदंडों को क्रियान्वित करता है।
- प्रारंभिक न्यायिक अभिपुष्टि: एन.पी. पोन्नुस्वामी बनाम रिटर्निंग ऑफिसर (1952) और ज्योति बसु बनाम देबी घोषाल (1982) के मामलों में मतदान को सांविधिक अधिकार के रूप में स्वीकार किया गया, जिसमें पात्रता पर विधायी विवेक को रेखांकित किया गया था।
- परिचालन संबंधी तर्कसंगतता: सांविधिक श्रेणी में रखने से मतदाता सूचियों, आयु संबंधी आवश्यकताओं और निवास की शर्तों के लचीले प्रबंधन की अनुमति मिलती है।
मतदान के पहलुओं का संवैधानिकरण
- चयन की स्वतंत्रता और सूचित भागीदारी: पीयूसीएल बनाम भारत संघ (2003) के मामले में, न्यायालय ने अनुच्छेद-19(1)(a) के तहत एक सूचित चुनावी विकल्प चुनने के अधिकार को मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दी।
- उदाहरण: उम्मीदवारों की आपराधिक और वित्तीय पृष्ठभूमि का प्रकटीकरण (ADR बनाम भारत संघ, 2002)।
- गोपनीयता और अभिव्यक्ति: वर्ष 2013 के नोटा (NOTA) संबंधी ऐतिहासिक निर्णय में मतपत्र की गोपनीयता तथा सभी उम्मीदवारों को अस्वीकार करने के विकल्प को लोकतांत्रिक एवं मौलिक राजनीतिक अभिव्यक्ति का अभिन्न अंग माना गया।
- हालिया रुझान: मतदान को एक मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता देने के पक्ष में पृथक न्यायिक मत सामने आए हैं, जो बदलते न्यायिक विचारों को दर्शाते हैं।
लोकतांत्रिक शासन पर प्रभाव
- नागरिकों का सुदृढ़ सशक्तीकरण: संवैधानिक आयाम सार्थक भागीदारी और संप्रभुता के एक साधन के रूप में मतदान के अधिकार को सुदृढ़ करते हैं। सोच-समझकर निर्णय लेने के अधिकार की सुरक्षा से निर्वाचित प्रतिनिधियों की जवाबदेही मजबूत होती है।
- कानूनी और संस्थागत जवाबदेही: न्यायालयों और निर्वाचन आयोग को मतदाता सूचियों की अखंडता बनाए रखने और मतदाताओं के अधिकारों की रक्षा करने का अधिकार प्राप्त होता है।
- नीतिगत सुधार: यह मतदाता शिक्षा, पारदर्शिता और प्रौद्योगिकी-सहायता प्राप्त भागीदारी जैसी पहलों को प्रोत्साहित करता है।
- उदाहरण: इलेक्ट्रॉनिक मतदाता सूची, मतदाता जागरूकता अभियान।
Click to Know UPSC OnlyIAS Coaching Centres
निष्कर्ष
यद्यपि मतदान औपचारिक रूप से एक सांविधिक अधिकार बना हुआ है, परंतु सूचित विकल्प, गोपनीयता और अभिव्यक्ति के अधिकारों के माध्यम से इसके प्रयोग को उत्तरोत्तर संवैधानिक रूप दिया जा रहा है। बुनियादी ढाँचे के सिद्धांत के परिप्रेक्ष्य में नागरिक का मत लोकतांत्रिक वैधता का मूल आधार है, जिससे सांविधिक और संवैधानिक पदों के मध्य किया गया यह भेद क्रमशः अप्रासंगिक होता जा रहा है। भारत के न्यायालयों और नीति-निर्माताओं का दायित्व है कि वे यह सुनिश्चित करें कि सांविधिक प्रक्रियाएँ मतदान के अधिकार के संवैधानिक मूल तत्त्व को प्रभावित न करें।