Q.
‘राइट टू वाक’ (Right to Walk) केवल परिवहन का मुद्दा नहीं है, बल्कि आधुनिक शहरी परिदृश्यों में स्थानिक न्याय और मानवीय गरिमा का एक गंभीर प्रश्न है।" अनुच्छेद 21 का विस्तार करने वाले सर्वोच्च न्यायालय के हालिया निर्णय के संदर्भ में इस कथन का विश्लेषण कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)
July 7, 2026
GS Paper IIIndian Polity
प्रश्न की मुख्य माँग
- पैदल चलने के अधिकार को कानूनी और संवैधानिक मान्यता
- स्थानिक न्याय, शहरी नियोजन और मानवीय गरिमा पर इसके प्रभाव
- आगे की राह।
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उत्तर
परिचय
भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में ‘चिह्नित फुटपाथों पर सुरक्षित चलने के अधिकार’ (Right to Walk Safely on Demarcated Footpaths) को एक स्वतंत्र मौलिक अधिकार के रूप में स्थान दिया है और इसे अनुच्छेद-21 के साथ पढ़े जाने वाले अनुच्छेद-19(1)(d) और अनुच्छेद-19(1)(a)-(c) का एक स्वाभाविक संश्लेषण घोषित किया है। चलना अब केवल परिवहन की चिंता नहीं है; यह स्थानिक न्याय का विषय बन गया है, जो शहरी स्थान के न्यायसंगत आवंटन और नागरिकों की गरिमा की मान्यता को दर्शाता है।
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कानूनी और संवैधानिक महत्त्व
- अनुच्छेद-21 का विस्तार: ‘पैदल चलने के अधिकार’ अब जीवन के अधिकार का एक हिस्सा है, जो सुरक्षा और पहुँच की गारंटी देता है। पैदल यात्री अतिक्रमण और वाहनों के प्रभुत्व वाले स्थानों पर प्राथमिकता का दावा कर सकते हैं।
- आवागमन की स्वतंत्रता: अनुच्छेद-19(1)(d) का संरक्षण यह सुनिश्चित करता है कि व्यक्ति राज्य या कॉरपोरेट प्रतिबंधों के बिना शहरी क्षेत्रों में आवागमन कर सकें।
- राज्य का कर्तव्य: न्यायालय ने स्पष्ट रूप से नगर पालिकाओं, शहरी विकास प्राधिकरणों और पंचायतों को पूर्ण कर्तव्य-धारक के रूप में नामित किया है। न्यायालय ने व्यवस्था दी है कि नागरिक मोटर वाहन अधिनियम के दावों से पूरी तरह स्वतंत्र होकर, रिट याचिकाओं (अनुच्छेद-226/32) या विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम, 1963 (Specific Relief Act, 1963) की धाराओं 38-40 के तहत दीवानी (सिविल) कार्रवाइयों के माध्यम से इसे लागू करवा सकते हैं।
स्थानिक न्याय और मानव गरिमा
- शहरी असमानता: सुरक्षित चलने के स्थानों की कमी महिलाओं, बच्चों और अनौपचारिक क्षेत्र के श्रमिकों को असमान रूप से प्रभावित करती है।
- उदाहरण: मुंबई और दिल्ली में भीड़भाड़ वाले फुटपाथ पैदल यात्रियों को सड़कों पर चलने के लिए मजबूर करते हैं, जिससे दुर्घटना का खतरा बढ़ जाता है।
- समानता के रूप में सार्वजनिक बुनियादी ढाँचा: फुटपाथ समावेशी शहरी डिजाइन के लिए आवश्यक हैं, जो कार्यस्थलों, स्कूलों और स्वास्थ्य देखभाल तक सुरक्षित पहुंच सक्षम बनाते हैं।
- सांस्कृतिक और ऐतिहासिक मान्यता: नागरिक और राजनीतिक अभिव्यक्ति के रूप में चलना।
- उदाहरण: गांधी जी का दांडी मार्च, सुभाष चंद्र बोस का ‘दिल्ली चलो’ अभियान अधिकारों के सार्वजनिक प्रकटीकरण के रूप में चलने के उदाहरण हैं।
आगे की राह
- पैदल यात्रियों को प्राथमिकता देने वाले शहरी नियोजन को वरीयता देना: शहरों के लिए सुरक्षित फुटपाथों के साथ सड़कों को पुनः डिजाइन करना अनिवार्य किया जाए।
- उदाहरण: पुणे की पैदल यात्री-अनुकूल पहल एक मॉडल के रूप में कार्य कर सकती है।
- स्मार्ट सिटी ढाँचे में पैदल यात्रियों के अधिकारों को एकीकृत करना: शहरी गतिशीलता योजनाओं को सुरक्षा ऑडिट और GIS मैपिंग से जोड़ना।
- कानूनी प्रवर्तन और निगरानी: यह सुनिश्चित करना कि फुटपाथ पर अतिक्रमण के उल्लंघनों पर कड़ा जुर्माना लगाया जाए।
- जन जागरूकता अभियान: पैदल यात्रियों के अधिकारों और जिम्मेदारियों पर नागरिकों को शिक्षित करना।
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निष्कर्ष
सर्वोच्च न्यायालय द्वारा मान्यता प्राप्त ‘पैदल चलने के अधिकार’ (Right to Walk) इस बात पर जोर देता है कि गतिशीलता को मनुष्य की गरिमा और स्थानिक न्याय से अलग नहीं किया जा सकता है। भारत के शहरों में इसका प्रभावी कार्यान्वयन शहरी जीवन को परिवर्तित कर देगा, जिससे सुरक्षा, समानता और सहभागी नागरिकता सुनिश्चित होगी।