प्रश्न की मुख्य माँग
- सामाजिक-आर्थिक निहितार्थ
- राज्य की भूमिका
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उत्तर
यद्यपि अनुच्छेद 21A निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा की गारंटी प्रदान करता है, तथापि निजी विद्यालयों के तीव्र विस्तार और निजी ट्यूशन पर व्यापक निर्भरता ने भारतीय परिवारों पर वित्तीय बोझ को काफी बढ़ा दिया है। इससे सामाजिक-आर्थिक असमानताएँ गहरी हुई हैं तथा समान और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित करने में राज्य की भूमिका पर प्रश्न उत्पन्न हुए हैं।
सामाजिक-आर्थिक प्रभाव
- बढ़ती असमानता: निजी विद्यालयों की अत्यधिक फीस गुणवत्तापूर्ण शिक्षा को गरीब परिवारों की पहुँच से बाहर कर देती है, जिससे वर्ग-आधारित विभाजन मजबूत होता है और सामाजिक उन्नयन की संभावनाएँ सीमित होती हैं।
- ट्यूशन पर निर्भरता: ट्यूशन का अनिवार्य होना परिवारों का मासिक व्यय बढ़ा देता है, जिससे विशेष रूप से निम्न-आय वर्ग को नुकसान होता है और बच्चों पर पढ़ाई का दबाव बढ़ता है।।
- उदाहरण: शहरी क्षेत्रों में 70% छात्र सशुल्क ट्यूशन पर निर्भर (ASER आधारित विश्लेषण)।
- लैंगिक बहिष्करण: आर्थिक दबाव के समय परिवार प्रायः लड़कों की निजी शिक्षा को प्राथमिकता देते हैं, जिससे लड़कियों की बेहतर शैक्षणिक अवसरों तक पहुँच घटती है।
- ग्रामीण हानि: ग्रामीण परिवारों को निजी विद्यालयों तक पहुँचने में आवागमन, वर्दी और शिक्षण सामग्री जैसे अप्रत्यक्ष खर्च अधिक उठाने पड़ते हैं।
- उदाहरण: निजी संस्थानों में स्थानांतरण के बाद ग्रामीण परिवारों का विद्यालयी खर्च 3–4 गुना बढ़ना।
- अधिगम अंतर का विस्तार: अधिक खर्च गुणवत्ता की गारंटी नहीं प्रदान करता; निजी ट्यूशन प्रशिक्षित और अप्रशिक्षित बच्चों के बीच प्रदर्शन अंतराल को बढ़ाती है।
- उदाहरण: ASER निष्कर्षों में प्रशिक्षित छात्रों का आधारभूत कौशल में बेहतर प्रदर्शन।
- घरेलू ऋण: शिक्षा खर्च पूरा करने के लिए माता-पिता उधार या ऋण लेने को मजबूर हो रहे हैं, जिससे परिवार दीर्घकालिक आर्थिक असुरक्षा में फँस रहे हैं और विद्यालय-स्तर के शिक्षा ऋण में वृद्धि हो रही है।
राज्य की भूमिका
- सरकारी विद्यालयों का सुदृढ़ीकरण: अवसंरचना, शिक्षकों की उपलब्धता और डिजिटल पहुँच में सुधार निजी विकल्पों की ओर ले जाने वाले कारकों को कम करता है।
- उदाहरण: राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अनुरूप अवसंरचना सुधार में PM श्री विद्यालय।
- शुल्क संरचना का विनियमन: राज्य-स्तरीय शुल्क नियमन तंत्र मनमानी वृद्धि पर अंकुश लगाकर विभिन्न सामाजिक-आर्थिक वर्गों के लिए वहन-योग्यता सुनिश्चित कर सकता है।
- गुणवत्ता आश्वासन मानक: समान अधिगम मानक और परिणामों की निगरानी से सभी विद्यालयों में न्यूनतम गुणवत्ता सुनिश्चित होती है।
- उदाहरण: निपुण भारत के अंतर्गत आधारभूत साक्षरता एवं संख्यात्मकता की निगरानी।
- विद्यालय-समुदाय उत्तरदायित्व तंत्र का सशक्तीकरण: विद्यालय प्रबंधन समितियाँ और सामाजिक अंकेक्षण जवाबदेही में वृद्धि करते हैं और समुदाय-विद्यालय समन्वय को मजबूत करते हैं।
- उदाहरण: समग्र शिक्षा के अंतर्गत सुदृढ़ विद्यालय प्रबंधन समिति प्रावधान।
- छात्रवृत्तियों का विस्तार: वंचित समूहों के लिए लक्षित सहायता वित्तीय बहिष्करण घटाती है और निरंतर शिक्षा को समर्थन देती है।
- उदाहरण: अनुसूचित जाति/जनजाति/अन्य पिछड़ा वर्ग छात्रों हेतु PM पोषण एवं छात्रवृत्ति योजनाओं का विस्तार।
- ट्यूशन क्षेत्र का विनियमन: कोचिंग संस्थानों के लिए मानक तय करने से शोषणकारी शुल्क और अत्यधिक शैक्षणिक दबाव पर रोक लगती है।
- उदाहरण: कोचिंग संस्थानों हेतु प्रस्तावित राष्ट्रीय दिशा-निर्देश।
- समावेशी डिजिटल पहुँच: निःशुल्क उपकरण, इंटरनेट और डिजिटल शिक्षण सामग्री उपलब्ध कराने से निजी एडटेक पर बढ़ी निर्भरता के कारण निर्मित अधिगम को कम किया जा सकता है।
- उदाहरण: समान डिजिटल अधिगम हेतु दीक्षा मंच का विस्तार।
निष्कर्ष
समान शिक्षा सुनिश्चित करने के लिए राज्य-नेतृत्व वाला ऐसा पारिस्थितिकी तंत्र आवश्यक है जिसमें सशक्त सार्वजनिक संस्थान, विनियमित निजी भागीदारी और सामाजिक-आर्थिक सुरक्षा उपाय साथ-साथ मौजूद हों। सतत् निवेश और पारदर्शी शासन के माध्यम से भारत शिक्षा को आर्थिक भार से परिवर्तित कर प्रत्येक बच्चे के लिए सुलभ और सशक्त सार्वजनिक हित में परिवर्तित कर सकता है।