Q. मणिपुर संकट जैसे नृजातीय संघर्षों को संबोधित करने में राजनीतिक नेतृत्व एवं शासन की भूमिका का विश्लेषण कीजिये। क्षेत्र में लंबे समय से चल रहे संघर्ष से क्या सबक लिया जा सकता है, तथा स्थायी शांति सुनिश्चित करने के लिए विभाजित समुदायों के बीच विश्वास का पुनर्निर्माण कैसे किया जा सकता है? (15 अंक, 250 शब्द)

प्रश्न की मुख्य माँग

  • मणिपुर संकट जैसे नृजातीय संघर्षों का समाधान करने में राजनीतिक नेतृत्व और शासन की भूमिका का विश्लेषण कीजिए।
  • क्षेत्र में लंबे समय से चल रहे संघर्ष से सीखे जा सकने वाले उद्देश्यों पर चर्चा कीजिए।
  • स्थायी शांति सुनिश्चित करने के लिए विभाजित समुदायों के बीच विश्वास का पुनर्निर्माण कैसे किया जा सकता है, इसका परीक्षण कीजिए।

उत्तर

मणिपुर संकट जैसे नृजातीय संघर्ष, गहरी जड़ें जमाए हुए ऐतिहासिक समस्याओं और सामाजिक-राजनीतिक विभाजन को दर्शाते हैं। राजनीतिक नेतृत्व और शासन, न्याय सुनिश्चित करके, समावेशिता को बढ़ावा देकर और विश्वास का पुनर्निर्माण करके ऐसे संकटों को हल करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। मणिपुर संघर्ष संवेदनशील, न्यायसंगत और निरंतर प्रयासों की आवश्यकता को रेखांकित करता है और इस तरह से यह विविध समाजों में शांति-निर्माण के लिए महत्त्वपूर्ण परिदृश्य प्रदान करता है।

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राजनीतिक नेतृत्व और शासन की भूमिका

  • नेतृत्व में समावेशिता: राजनीतिक नेतृत्व को समावेशी शासन को प्राथमिकता देनी चाहिए, अलगाव को रोकने और नृजातीय शिकायतों को प्रभावी ढंग से संबोधित करने के लिए सभी समुदायों का प्रतिनिधित्व करना चाहिए। 
    • उदाहरण के लिए: त्रिपुरा में समावेशी कैबिनेट प्रतिनिधित्व ने भूमि अधिकारों और सांस्कृतिक संरक्षण पर निष्पक्ष नीतियों के माध्यम से आदिवासी अशांति को कम करने में मदद की।
  • संघर्ष-संवेदनशील नीति-निर्माण: शासन को संघर्ष-संवेदनशील नीतियों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए ताकि संसाधनों का समान वितरण सुनिश्चित हो और संघर्षों को बढ़ावा देने वाले ऐतिहासिक अन्याय को संबोधित किया जा सके। 
    • उदाहरण के लिए: नागालैंड की शांति प्रक्रिया ने जनजातीय समूहों के बीच संसाधन-साझाकरण समझौतों पर बल दिया, जिससे सामंजस्य को बढ़ावा मिला।
  • कुशल संकट प्रबंधन: राजनीतिक नेतृत्व को संकट के दौरान त्वरित उपाय लागू करने चाहिए, जिसमें संचार चैनल और पुनर्वास योजनाएँ शामिल हों, ताकि स्थिति को अधिक गंभीर होने से रोका जा सके। 
    • उदाहरण के लिए: वर्ष 2012 में असम में जातीय हिंसा के दौरान राहत शिविरों की त्वरित तैनाती ने दीर्घकालिक विस्थापन प्रभावों को कम किया।
  • संस्थाओं को मजबूत बनाना: शासन को संघर्ष क्षेत्रों में सामान्य स्थिति बहाल करने के लिए मध्यस्थता और संघर्ष समाधान हेतु स्थानीय संस्थागत ढाँचे को सशक्त बनाना चाहिए।
    • उदाहरण के लिए: पूर्वोत्तर भारत में स्वायत्त जिला परिषदों ने स्थानीय विवाद समाधान तंत्र के माध्यम से नृजातीय तनाव को कम किया है।
  • जवाबदेही और पारदर्शिता: प्रशासनिक विफलताओं को खुले तौर पर संबोधित करके और निर्णय लेने में नागरिकों को शामिल करके राजनीतिक नेतृत्व को जवाबदेही बनाए रखनी चाहिए।
    • उदाहरण के लिए: वर्ष 1984 के बाद पंजाब के नेतृत्व ने पारदर्शी शासन पर जोर दिया, जिससे जनता को विश्वास निर्माण में मदद मिली।

क्षेत्र में लंबे समय से चल रहे संघर्ष से प्राप्त अनुभव

  • नृजातीय एकता की कमजोरी: जब शिकायतों का समाधान नहीं किया जाता है तो नृजातीय विभाजन और अधिक होता है, जो समुदायों के बीच निरंतर संवाद की आवश्यकता को दर्शाता है।
    • उदाहरण के लिए: मई 2023 के बाद मणिपुर में तनाव को कम करने में आई विफलता, इस बात को स्पष्ट करती है।
  • सही समय पर हस्तक्षेप करने का महत्त्व: हिंसा पर देरी से प्रतिक्रिया करने से संघर्ष बढ़ता है , जिससे मानवीय संकट और भी गहरा हो जाता है। 
    • उदाहरण के लिए: गोरखालैंड विरोध प्रदर्शनों में सही समय पर हस्तक्षेप से बड़े पैमाने पर नृजातीय संघर्ष को रोका जा सका।
  • धारणा प्रबंधन की भूमिका: अंतर्निहित मुद्दों को संबोधित किए बिना उपलब्धियों को बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत करने से शासन में विश्वास कम होता है। 
    • उदाहरण के लिए: मणिपुर में बार-बार होने वाली हिंसा के विपरीत गृह मंत्रालय की आत्म-प्रशंसा वाली रिपोर्ट ने इसकी विश्वसनीयता को कम कर दिया।
  • बाह्य प्रभाव: शरणार्थियों की आमद और बाह्य सीमाओं के कारण होने वाले नृजातीय विवाद को रोकने के लिए सुरक्षा और मानवीय सहायता के बीच संतुलन स्थापित करने वाली नीतियों की आवश्यकता होती है।
  • निरंतर शांति प्रयास: दीर्घकालिक सुलह योजनाओं के बिना अल्पकालिक शांति उपायों से हिंसा की पुनरावृत्ति का खतरा रहता है। 
    • उदाहरण के लिए: सामाजिक-आर्थिक पुनर्वास पहलों की कमी के कारण पूर्वोत्तर भारत में युद्धविराम समझौते  विफल हो गए।

विभाजित समुदायों के बीच विश्वास का पुनर्निर्माण

  • अंतर-समुदाय संवाद को बढ़ावा देना: खुली चर्चाओं के लिए संगठित मंच, आपसी शिकायतों को दूर कर सकते हैं और समझ का निर्माण कर सकते हैं। 
    • उदाहरण के लिए: असम में शांति समितियों ने समुदाय-संचालित पहलों के माध्यम से बोडो और गैर-बोडो के बीच अविश्वास को कम किया।
  • आर्थिक एकीकरण: नृजातीय समूहों के बीच संयुक्त आर्थिक परियोजनाएँ सहयोग को बढ़ावा देती हैं और शत्रुता को कम करती हैं। 
    • उदाहरण के लिए: मेघालय में अंतर-समुदाय, चाय बागान परियोजनाओं ने खासी और गारो श्रमिकों को एकजुट किया।
  • सांस्कृतिक मान्यता: विविध सांस्कृतिक पहचानों का सम्मान सुनिश्चित करता है कि समुदाय सम्मानित और गौरवान्वित महसूस करें। 
    • उदाहरण के लिए: मणिपुरी को अनुसूचित भाषा के रूप में मान्यता देने से मणिपुर में सांस्कृतिक गौरव को बढ़ावा मिला।
  • युवा और नागरिक समाज की भागीदारी: युवा नेताओं और नागरिक समूहों को शामिल करने से पीढ़ियों के बीच अंतर को कम करने और मेलमिलाप को बढ़ावा देने में मदद मिल सकती है। 
    • उदाहरण के लिए: नागालैंड में युवा मंचों ने साझा विकास परियोजनाओं के माध्यम से आदिवासी गुटों के बीच दुश्मनी को सक्रिय रूप से कम किया।
  • शासन में विशवास: पारदर्शी शासन, अतीत में हुई गलतियों के लिए न्याय और समान विकास को प्राथमिकता देता है, जिससे संस्थाओं में विश्वास बढ़ता है। 
    • उदाहरण के लिए: गुजरात दंगों के पीड़ितों को संबोधित करने वाले न्याय आयोगों ने समय के साथ लोगों का विश्वास जीता।

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मणिपुर संकट के समाधान-उन्मुख दृष्टिकोण के लिए समावेशी राजनीतिक नेतृत्व की आवश्यकता है, जो समान विकास, सहानुभूतिपूर्ण शासन और मजबूत संघर्ष समाधान तंत्र को प्राथमिकता दे। विश्वास का निर्माण करने के लिए समुदाय द्वारा संचालित शांति स्थापना पहल, पारदर्शी शिकायत निवारण और निरंतर अंतर-जातीय संवाद की आवश्यकता होती है। जवाबदेही के लिए प्रौद्योगिकी का लाभ उठाना और लक्षित कल्याण योजनाओं को लागू करना, एकता को बढ़ावा दे सकता है, जिससे भविष्य के लिए सामंजस्यपूर्ण और प्रत्यास्थ सामाजिक ढाँचा सुनिश्चित हो सकता है।

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