प्रश्न की मुख्य माँग
- भारत के अंतरिक्ष विकास में बाधा डालने वाली प्रमुख चुनौतियाँ
- भारत की अंतरिक्ष संबंधी कमजोरियों के रणनीतिक निहितार्थ
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उत्तर
हाल ही में PSLV-C62 मिशन की विफलता से भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम को एक गंभीर झटका लगा। तीसरे चरण (PS3) में ‘रोल-रेट डिस्टरबेंस’ के कारण DRDO के रणनीतिक EOS-N1 (अन्वेषा) सहित 16 उपग्रह नष्ट हो गए। मई 2025 में PSLV-C61 की विफलता के बाद आठ महीनों के भीतर PSLV के इस प्रमुख उपग्रह की लगातार विफलता ने अंतरिक्ष प्रभुत्व हासिल करने के भारत के प्रयासों में मौजूद प्रणालीगत कमजोरियों को उजागर कर दिया है।
भारत के अंतरिक्ष विकास में बाधा डालने वाली प्रमुख चुनौतियाँ
- गुणवत्ता नियंत्रण संकट: PS3 सॉलिड मोटर स्टेज में लगातार हो रही अनियमितताएँ मात्र डिजाइन की खामियों के बजाय विनिर्माण दोषों या पुराने प्रणोदक भंडारों की ओर इशारा करती हैं।
- उदाहरण: विफलता विश्लेषण समिति (FAC) वर्तमान में वर्ष 2025 की विफलता के समान चैंबर दाब में गिरावट की जाँच कर रही है।
- बुनियादी ढाँचे की बाधाएँ: निजी स्टार्ट-अप्स के उदय के बावजूद, महत्त्वपूर्ण परीक्षण और प्रक्षेपण सुविधाएँ ISRO के भीतर ही केंद्रित हैं।
- उदाहरण: स्काईरूट और अग्निकुल जैसी कंपनियों को अक्सर देरी का सामना करना पड़ता है क्योंकि सरकारी मिशनों को निजी वाणिज्यिक प्रक्षेपणों पर प्राथमिकता दी जाती है।
- प्रौद्योगिकी पर निर्भरता: ऑपरेशन सिंदूर जैसे महत्त्वपूर्ण समयों के दौरान उपलब्ध डेटा में चुनिंदा देरी होने के बावजूद, भारत अमेरिकी और अन्य विदेशी रिमोट सेंसिंग उपग्रह समूहों पर अत्यधिक निर्भर है।
- मानव संसाधन की कमी: हालाँकि भारत में बड़ी मात्र इंजीनियर तैयार होते हैं, लेकिन ऑप्टिकल थर्मल कंट्रोल और डाउनस्ट्रीम एनालिटिक्स जैसे विशिष्ट क्षेत्रों में विशेषज्ञ प्रतिभा की भारी कमी है।
- विधायी रिक्तता: एक औपचारिक राष्ट्रीय अंतरिक्ष अधिनियम के अभाव के कारण अंतरिक्ष में दायित्व, बीमा और दीर्घकालिक निजी संपत्ति अधिकारों के संबंध में विनियामक अनिश्चितता उत्पन्न होती है।
- संस्थागत पारदर्शिता: PSLV-C61 जैसे मिशनों की विफलता रिपोर्टों को सार्वजनिक रूप से जारी करने में ISRO की मंशा ने वैश्विक बीमाकर्ताओं और वाणिज्यिक भागीदारों के साथ “विश्वास की कमी” उत्पन्न कर दी है।
- उदाहरण: इन गुप्त प्रणालीगत जोखिमों के कारण वर्ष 2026 में भारतीय प्रक्षेपणों के लिए वाणिज्यिक बीमा प्रीमियम में उल्लेखनीय वृद्धि होने की आशंका है।
भारत की अंतरिक्ष संबंधी कमजोरियों के रणनीतिक निहितार्थ
- भरोसेमंद प्रक्षेपण यंत्र की विश्वसनीयता में गिरावट: अमेरिका (स्पेसएक्स) या चीन की तुलना में, भारत का प्रमुख प्रक्षेपण यान PSLV अपनी अत्यधिक विश्वसनीयता और लागत-प्रभावशीलता की प्रतिष्ठा खो रहा है।
- उदाहरण: ब्राजील और ब्रिटेन के व्यावसायिक ग्राहक अब रॉकेट लैब या एरियनस्पेस जैसे अधिक महँगे लेकिन विश्वसनीय विकल्पों को प्राथमिकता दे सकते हैं।
- राष्ट्रीय सुरक्षा संबंधी कमियाँ: क्षेत्रीय तनाव और रणनीतिक स्वायत्तता के खतरे के दौर में, EOS-N1 (अन्वेषा) निगरानी उपग्रह के खो जाने से भारत की सीमाओं की महत्त्वपूर्ण वास्तविक समय की हाइपरस्पेक्ट्रल निगरानी में देरी हो रही है।
- कक्षीय क्षेत्र का नुकसान: अंतरराष्ट्रीय दूरसंचार संघ (ITU) में पंजीकरण कराने में अमेरिका और चीन से पीछे रहने के कारण भारत प्रमुख कक्षीय स्लॉट और स्पेक्ट्रम खो रहा है।
- उदाहरण: चीन ने 1,000 से अधिक उपग्रह कक्षा में स्थापित किए हैं, जबकि भारत के सक्रिय उपग्रहों का बेड़ा 100 से भी कम है, जिससे “कक्षीय क्षेत्र” पर नियंत्रण स्थापित लिया गया है।
- पुन: प्रयोज्यता में तकनीकी पिछड़ापन: जहाँ अमेरिका के पास परिचालन में पुन: प्रयोज्य रॉकेट हैं, वहीं भारत का NGLV अभी भी प्रारंभिक अनुसंधान एवं विकास चरण में है, जिससे इसके मिशनों की लागत प्रतिस्पर्द्धात्मकता सीमित हो जाती है।
- कमजोर प्रतिरोधक क्षमता: NavIC में सीमाओं के कारण भारत की लंबी दूरी की मिसाइलों की सटीकता अमेरिकी GPS और चीन के बायदू की तुलना में कम हो जाती है।
- रूस/अमेरिका पर रणनीतिक निर्भरता: गगनयान जैसे स्वदेशी मिशनों में देरी के कारण भारत “अंतरनिर्भर भेद्यता” की स्थिति में आ गया है, और महत्त्वपूर्ण प्रौद्योगिकी के लिए नासा या रोस्कोस्मोस पर निर्भर है।
- उदाहरण: भारत की वर्ष 2026 मिशन योजना अब उच्च-शक्ति वाले इंजनों और जीवन-सहायक प्रणालियों के लिए विदेशी सहयोग पर निर्भर है।
निष्कर्ष
PSLV-C62 की विफलता इस बात को रेखांकित करती है कि अंतरिक्ष एक बेहद चुनौतीपूर्ण क्षेत्र है। वैश्विक अंतरिक्ष शक्ति बने रहने के लिए, भारत को मिशन-केंद्रित दृष्टिकोण से हटकर “शून्य दोष” पारिस्थितिकी तंत्र की ओर बढ़ना होगा, जिसमें निजी क्षेत्र की सक्रियता और कठोर सार्वजनिक निगरानी का लाभ उठाया जा सके। असफलताओं को गुणवत्ता-आधारित नवाचार में परिवर्तित करना वैश्विक अंतरिक्ष प्रतिस्पर्द्धा में भारत की दृढ़ता की परीक्षा होगी।
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