प्रश्न की मुख्य माँग
- होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) के माध्यम से भारत की ऊर्जा आपूर्ति शृंखलाओं में निहित रणनीतिक कमजोरियाँ
- समुद्री मार्गों के विविधीकरण तथा वैकल्पिक संपर्क गलियारों का महत्व
- संयुक्त अरब अमीरात (UAE) की “जीरो होर्मुज डिपेंडेंसी” (Zero Hormuz Dependency) रणनीति से प्राप्त होने वाली अंतर्दृष्टि
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उत्तर
परिचय
होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) भारत के लिए एक महत्त्वपूर्ण रणनीतिक चोकपॉइंट है, जिसके माध्यम से भारत के LPG तथा कच्चे तेल आयात का बड़ा हिस्सा गुजरता है। हाल के भू-राजनीतिक घटनाक्रमों, जिनमें ईरान द्वारा पारगमन पर नियंत्रण स्थापित करना तथा पर्शियन गल्फ स्ट्रेट अथॉरिटी का गठन शामिल है, ने भारत के समयबद्ध आयात तंत्र (ऊर्जा आपूर्ति) तथा सीमित भारतीय-ध्वजांकित जहाजी बेड़े से जुड़ी कमजोरियों को उजागर किया है।
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भारत की ऊर्जा आपूर्ति शृंखला की रणनीतिक कमजोरियाँ
- सिंगल चोकपॉइंट पर अत्यधिक निर्भरता: भारत की ऊर्जा आपूर्ति होर्मुज जलडमरूमध्य पर अत्यधिक निर्भर है, जिससे संघर्ष या प्रतिबंधों के दौरान आपूर्ति बाधित होने का जोखिम बढ़ जाता है।
- उदाहरण: अप्रैल 2026 के ईरान–अमेरिका संघर्ष ने यह स्पष्ट किया कि ईरान ऊर्जा निर्यात प्रवाह को प्रभावित कर सकता है, जिससे आपूर्ति में अनिश्चितता उत्पन्न होती है।
- सीमित भारतीय-ध्वज वाहक जहाज और भंडारण क्षमता: भारत के पास पर्याप्त जहाजी बेड़े और दीर्घकालिक भूमिगत भंडारण की कमी है, जिससे परिवहन में देरी की स्थिति में जोखिम बढ़ जाता है।
- उदाहरण: भारत का रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार (SPR) केवल लगभग 9.5 दिनों के शुद्ध आयात के बराबर सीमित है।
- पारगमन राज्यों का भू-राजनीतिक प्रभाव: पारगमन मार्गों पर नियंत्रण रखने वाले देश ऊर्जा सुरक्षा को प्रभावित कर सकते हैं।
- उदाहरण: पर्शियन गल्फ स्ट्रेट अथॉरिटी द्वारा होर्मुज से होकर होने वाली सभी शिपिंग का प्रबंधन भारत की एकतरफा नियंत्रण क्षमता को सीमित करता है।
विविधीकरण की रणनीतिक आवश्यकता
- वैकल्पिक बंदरगाह और गलियारे: होर्मुज पर निर्भरता कम करने के लिए वैकल्पिक समुद्री एवं स्थलीय मार्गों का विकास आवश्यक है, जिससे भू-राजनीतिक अस्थिरता के जोखिम को कम किया जा सके।
- उदाहरण: ईरान का चाबहार बंदरगाह अफगानिस्तान तक एक भूमि–समुद्री मार्ग प्रदान करता है, जो होर्मुज को बायपास करता है। साथ ही, फुजैरा (UAE), दुक़म (ओमान) और सलालाह (ओमान) जैसे बंदरगाहों पर ऑफलोडिंग साझेदारियाँ चोकपॉइंट से बाहर स्थित होकर प्रायद्वीप-पार पाइपलाइनों से सीधे जुड़कर ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत कर सकती हैं।
- मौजूदा अवसंरचना और रणनीतिक भंडारण का उपयोग: भूमिगत भंडारण, टैंक फार्म और आंतरिक परिवहन नेटवर्क में निवेश से ऊर्जा आपूर्ति की लचीलापन क्षमता बढ़ती है।
- उदाहरण: संयुक्त अरब अमीरात (UAE) की “जीरो होर्मुज डिपेंडेंसी” रणनीति पाइपलाइनों और आंतरिक भंडारण के माध्यम से होर्मुज पर निर्भरता के बिना निर्बाध ऊर्जा प्रवाह सुनिश्चित करती है।
- रणनीतिक साझेदारियाँ: खाड़ी देशों एवं मित्र राष्ट्रों के साथ सहयोग से जोखिम का विविधीकरण होता है और वैकल्पिक आपूर्ति मार्ग सुनिश्चित होते हैं।
- उदाहरण: भारत–युएई ऊर्जा सहयोग तथा ओमान के साथ समझौते वैकल्पिक समुद्री पहुँच और ऊर्जा सुरक्षा को सुदृढ़ कर सकते हैं।
आगे की राह
- वैकल्पिक बंदरगाहों और गलियारों में निवेश: चाबहार, सलालाह तथा अन्य रणनीतिक बंदरगाहों की क्षमता का विस्तार किया जाए ताकि LPG और कच्चे तेल के आयात का सुरक्षित रूप से प्रबंधन किया जा सके।
- रणनीतिक भंडारण को सुदृढ़ करना: आपूर्ति व्यवधानों से निपटने हेतु दीर्घकालिक भूमिगत कैवर्न भंडारण तथा टैंक फार्मों का विकास किया जाए।
- अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों को मजबूत करना: खाड़ी देशों एवं अन्य मित्र राष्ट्रों के साथ औपचारिक समझौते कर वैकल्पिक समुद्री एवं स्थलीय आपूर्ति मार्ग सुनिश्चित किए जाएँ।
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निष्कर्ष
समुद्री मार्गों का विविधीकरण, रणनीतिक भंडारण का विकास तथा अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों को मजबूत करना भारत की ऊर्जा सुरक्षा को सुरक्षित रखने के लिए अत्यंत आवश्यक है। संयुक्त अरब अमीरात (UAE) का “जीरो होर्मुज डिपेंडेंसी” मॉडल से प्राप्त अनुभव यह दर्शाता है कि चोकपॉइंट आधारित कमजोरियों को कम करते हुए भी निर्बाध ऊर्जा आपूर्ति सुनिश्चित की जा सकती है। यह दृष्टिकोण भारत को अधिक लचीली और सुरक्षित ऊर्जा व्यवस्था की दिशा में अग्रसर करता है।