प्रश्न की मुख्य माँग
- ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने में सामरिक साझेदारियों का महत्त्व
- पश्चिम एशिया के साथ भारत की सहभागिता तथा अन्य ऊर्जा आपूर्तिकर्ताओं की ओर विविधीकरण
- संस्थागत एवं नीतिगत उपायों का उल्लेख कीजिए।
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उत्तर
परिचय
भारत की ऊर्जा सुरक्षा भू-राजनीतिक स्थिरता से घनिष्ठ रूप से जुड़ी हुई है, क्योंकि भारत अपनी कच्चे तेल की लगभग 90% आवश्यकता आयात के माध्यम से पूरी करता है तथा तेल, गैस एवं उर्वरकों के लिए पश्चिम एशिया पर अत्यधिक निर्भर है। हॉर्मुज जलडमरूमध्य के आस-पास उत्पन्न हालिया तनाव ने यह स्पष्ट किया है कि कूटनीतिक साझेदारियाँ एवं ऊर्जा स्रोतों का विविधीकरण वैश्विक आपूर्ति व्यवधानों के विरुद्ध एक महत्त्वपूर्ण सुरक्षा कवच के रूप में कार्य कर सकते हैं।
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ऊर्जा सुरक्षा के स्तंभ के रूप में सामरिक साझेदारियाँ
- कूटनीतिक संबंध संकट के समय ऊर्जा आपूर्ति की निरंतरता सुनिश्चित करते हैं: दीर्घकालिक राजनीतिक सहभागिता से आपसी विश्वास बढ़ता है तथा संघर्ष की परिस्थितियों में भी ऊर्जा आपूर्ति बनाए रखने में सहायता मिलती है।
- उदाहरण: पश्चिम एशिया संकट के दौरान ईरान ने भारतीय जहाजों के आवागमन को सुगम बनाया, जबकि खाड़ी के उत्पादक देशों ने क्षेत्रीय तनाव के बावजूद ऊर्जा आपूर्ति जारी रखी।
- ऊर्जा साझेदारियाँ भू-राजनीतिक निर्भरता को कम करती हैं: अनेक ऊर्जा आपूर्तिकर्ताओं के साथ सहयोग किसी एक क्षेत्र पर अत्यधिक निर्भरता को कम करता है।
- उदाहरण: रूस, अमेरिका, अफ्रीका एवं लैटिन अमेरिका के साथ भारत की ऊर्जा साझेदारियों ने खाड़ी क्षेत्र के ऊर्जा मार्गों में व्यवधान के दौरान वैकल्पिक स्रोत उपलब्ध कराए हैं।
- समुद्री सुरक्षा सहयोग ऊर्जा आपूर्ति मार्गों की रक्षा करता है: आयातित ऊर्जा का अधिकांश भाग संवेदनशील समुद्री मार्गों से होकर आता है, इसलिए इन मार्गों की सुरक्षा अत्यंत आवश्यक है।
- उदाहरण: हिंद महासागर में भारतीय नौसेना की तैनाती वाणिज्यिक समुद्री मार्गों की सुरक्षा सुनिश्चित करने में सहायक है।
- सामरिक साझेदारियाँ व्यापक ऊर्जा सहयोग को बढ़ावा देती हैं: कच्चे तेल के आयात के अतिरिक्त, ये साझेदारियाँ रिफाइनिंग, एलएनजी, नवीकरणीय ऊर्जा तथा प्रौद्योगिकी में निवेश को भी प्रोत्साहित करती हैं।
- उदाहरण: भारत–संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ऊर्जा सहयोग के अंतर्गत तेल भंडारण, नवीकरणीय ऊर्जा तथा ऊर्जा अवसंरचना में निवेश शामिल है।
पश्चिम एशिया तथा अन्य ऊर्जा आपूर्तिकर्ताओं के साथ भारत की सहभागिता
- खाड़ी देशों के साथ साझेदारियों को सुदृढ़ करना: भौगोलिक निकटता एवं स्थापित आपूर्ति शृंखलाओं के कारण खाड़ी देश भारत की ऊर्जा सुरक्षा के केंद्र में बने हुए हैं।
- उदाहरण: सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (UAE) एवं कतर भारत को कच्चे तेल एवं प्राकृतिक गैस के प्रमुख आपूर्तिकर्ता हैं।
- प्रतिस्पर्द्धी क्षेत्रीय शक्तियों के साथ संतुलित संबंध बनाए रखना: सामरिक स्वायत्तता के लिए भारत को अमेरिका-समर्थित खाड़ी देशों तथा ईरान दोनों के साथ संतुलित संबंध बनाए रखने की आवश्यकता है।
- उदाहरण: संयुक्त अरब अमीरात के साथ सहयोग तथा ईरान में चाबहार बंदरगाह के विकास में भारत की समानांतर भागीदारी उसकी संतुलनकारी कूटनीति को दर्शाती है।
- पश्चिम एशिया के अतिरिक ऊर्जा स्रोतों का विविधीकरण: नए ऊर्जा आपूर्तिकर्ताओं के साथ संबंध विकसित करने से क्षेत्रीय संघर्षों से उत्पन्न जोखिम कम होते हैं।
- उदाहरण: वर्ष 2022 के बाद रूस से कच्चे तेल के आयात में वृद्धि ने भारत के ऊर्जा स्रोतों में विविधता का गुण प्रदर्शित किया।
- साझेदारियों के साथ घरेलू ऊर्जा लचीलापन विकसित करना: बाहरी ऊर्जा साझेदारियों की प्रभावशीलता आंतरिक ऊर्जा सुरक्षा उपायों से और अधिक मजबूत होती है।
- उदाहरण: भारत के सामरिक पेट्रोलियम भंडार तथा नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता के विस्तार ने हॉर्मुज जलडमरूमध्य से संबंधित आपूर्ति संकट के प्रभाव को कम करने में सहायता की।
आगे की राह
- ऊर्जा साझेदारियों में विविधीकरण का विस्तार: क्षेत्रीय एकाग्रता के जोखिम को कम करने के लिए विभिन्न क्षेत्रों में विश्वसनीय ऊर्जा आपूर्ति शृंखलाओं का निरंतर विकास किया जाए।
- उदाहरण: रूस, अफ्रीका, लैटिन अमेरिका तथा अमेरिका के साथ ऊर्जा सहयोग को और सुदृढ़ किया जाए।
- सामरिक पेट्रोलियम भंडार एवं भंडारण क्षमता को सुदृढ़ करना: भू-राजनीतिक व्यवधानों से निपटने हेतु आपातकालीन ऊर्जा भंडार की क्षमता बढ़ाई जाए।
- उदाहरण: भारत के सामरिक पेट्रोलियम भंडार का विस्तार किया जाए। हाल ही में ओएनजीसी (ONGC) के निदेशक मंडल ने मंगलूरू में 1.75 मिलियन मीट्रिक टन (MMT) क्षमता वाले प्रथम चरण (Phase-I) के विस्तार के वित्तपोषण को सैद्धांतिक स्वीकृति प्रदान की है।
- नवीकरणीय एवं वैकल्पिक ऊर्जा संक्रमण को गति देना: घरेलू स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन को बढ़ाकर भविष्य में आयात निर्भरता कम किए जाने का प्रयास करना चाहिए ।
- उदाहरण: भारत की ऊर्जा संक्रमण रणनीति के अंतर्गत सौर ऊर्जा क्षमता के विस्तार तथा एथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम को प्रोत्साहित किया जाए।
- समग्र सरकारी ऊर्जा शासन व्यवस्था को संस्थागत रूप देना: संकट की स्थिति में प्रभावी प्रतिक्रिया के लिए विदेश मंत्रालय, रक्षा मंत्रालय, नौवहन क्षेत्र तथा ऊर्जा मंत्रालयों के बीच समन्वित व्यवस्था विकसित की जाए।
- उदाहरण: हॉर्मुज जलडमरूमध्य संकट के दौरान विदेश मंत्रालय (MEA), पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय तथा भारतीय नौसेना के मध्य समन्वय के द्वारा भारतीय जहाजों की सुरक्षा सुनिश्चित की।
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निष्कर्ष
समकालीन भू-राजनीतिक परिदृश्य में ऊर्जा सुरक्षा केवल घरेलू ऊर्जा भंडारों से ही सुनिश्चित नहीं होती, बल्कि सामरिक साझेदारियों, ऊर्जा स्रोतों के विविधीकरण तथा संस्थागत तैयारी पर भी समान रूप से निर्भर करती है। पश्चिम एशिया संकट के दौरान भारत का अनुभव यह दर्शाता है कि कूटनीति स्वयं ऊर्जा सुरक्षा का एक प्रभावी साधन है, जो संकट की परिस्थितियों में लचीलापन प्रदान करते हुए सतत् एवं आत्मनिर्भर ऊर्जा व्यवस्था की दिशा में दीर्घकालिक परिवर्तन को भी सुदृढ़ करती है।