प्रश्न की मुख्य माँग
- निवारण तंत्रों की कमियों पर चर्चा कीजिए।
- छात्रों के लिए समावेशी एवं सुरक्षित स्थान सुनिश्चित करने हेतु सुधार सुझाइए।
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उत्तर
ओडिशा में 19 वर्षीय छात्र की आत्महत्या जैसे हालिया मामलों ने भारतीय विश्वविद्यालयों में गहरी जड़ें जमाए हुए लिंग एवं जाति आधारित संरचनात्मक भेदभाव तथा उदासीनता को उजागर किया है। ये मामले न केवल निवारण तंत्रों की विफलता को रेखांकित करते हैं, बल्कि शैक्षणिक संस्थानों में हाशिए पर पड़े छात्रों को लगातार चुप कराए जाने को भी दर्शाते हैं।
निवारण तंत्रों में कमियाँ
- आंतरिक शिकायत समितियों (Internal Complaints Committees- ICCs) में स्वायत्तता एवं प्रभावकारिता का अभाव है: अधिकांश ICCs को प्रशासनिक नियंत्रण में कार्य करने वाली प्रतीकात्मक संस्थाओं के रूप में देखा जाता है, जो पीड़ितों के अधिकारों की रक्षा करने में विफल रहती हैं।
- उदाहरण: ओडिशा मामले में, पूर्व शिकायतों के बावजूद ICC निष्क्रिय रही, जिससे यौन उत्पीड़न रोकने में इसकी अक्षमता उजागर हुई।
- SC/ST प्रकोष्ठ संरचनात्मक रूप से कमजोर एवं संसाधनों से वंचित हैं: UGC द्वारा अधिदेशित SC/ST प्रकोष्ठों में संसाधनों, स्वायत्तता एवं जवाबदेही का अभाव है तथा अक्सर वे नौकरशाही औपचारिकताओं तक सीमित रह जाते हैं।
- छात्रों एवं अपराधियों के बीच शक्ति असंतुलन: पीड़ितों को अक्सर संकाय सदस्यों या अपने साथियों से उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है, जिससे निवारण मुश्किल हो जाता है।
- संस्थागत उदासीनता के माध्यम से हाशिए पर पड़ी आवाजों को दबाना: दलित, आदिवासी एवं महिला छात्रों द्वारा उठाई गई चिंताओं की उपेक्षा तथा उन्हें खारिज करने का एक चलन है।
- समयबद्ध एवं स्वतंत्र शिकायत प्रक्रियाओं का अभाव: निवारण में अक्सर स्पष्ट समय सीमा या स्वतंत्र निगरानी का अभाव होता है, जिससे पीड़ित न्याय पाने से हतोत्साहित होते हैं।
- लोकतांत्रिक एवं समावेशी तंत्रों का अभाव: वर्तमान तंत्र छात्रों की भागीदारी को बाहर रखते हैं एवं हाशिए पर पड़े छात्रों की वास्तविकताओं को नजरअंदाज करते हुए ऊपर से नीचे की ओर काम करते हैं।
- उदाहरण: JNU के GSCASH की जगह ICC ने एक लोकतांत्रिक, छात्र-भागीदारी मॉडल से प्रशासनिक मॉडल में बदलाव को चिह्नित किया।
समावेशी एवं सुरक्षित शैक्षणिक स्थानों के लिए सुझाए गए सुधार
- जाति आधारित जवाबदेही के लिए ‘रोहित अधिनियम’ का अधिनियमन: जाति आधारित भेदभाव एवं छात्र आत्महत्याओं में संस्थागत उत्तरदायित्व को संबोधित करने वाले एक व्यापक कानून की आवश्यकता है।
- GSCASH जैसे सहभागी निवारण तंत्रों का पुनरुद्धार: संस्थानों को लिंग आधारित शिकायतों से निपटने के लिए लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व एवं स्वायत्तता वाले मॉडल अपनाने चाहिए।
- अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति प्रकोष्ठों की स्वायत्तता एवं संसाधनों को मजबूत करना: इन निकायों को जाति आधारित शिकायतों के समाधान हेतु स्वतंत्र दर्जा, पर्याप्त धन एवं वास्तविक अधिकार प्रदान किए जाने चाहिए।
- उदाहरण: UGC को अपने दिशा-निर्देशों में संशोधन करना चाहिए ताकि अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति प्रकोष्ठों को औपचारिकता आधारित प्रतिक्रियाओं के बजाय सक्रिय सहभागिता हेतु सशक्त बनाया जा सके।
- क्रांतिकारी जाति-लैंगिक संवेदीकरण कार्यक्रमों का एकीकरण: जागरूकता के प्रयास भावनात्मक रूप से परिवर्तनकारी एवं नैतिक सहभागिता पर आधारित होने चाहिए, न कि केवल नियमों के अनुपालन पर।
- प्रतिशोध के विरुद्ध कानूनी एवं संस्थागत सुरक्षा: पीड़ितों एवं मुखबिरों को बिना किसी डर के दुर्व्यवहार की रिपोर्ट करने के लिए मजबूत सुरक्षा तंत्र की आवश्यकता है।
- अभिव्यक्ति एवं एकजुटता के लिए सुरक्षित स्थानों का निर्माण: शैक्षणिक संस्थानों को ऐसे मंचों का निर्माण करना चाहिए, जहाँ हाशिए पर स्थित छात्र अपने अनुभवों और आघात को खुलकर साझा कर सकें तथा उन्हें सामुदायिक समर्थन और सहानुभूति पूर्ण वातावरण प्राप्त हो।
- विश्वविद्यालयों का जवाबदेही ऑडिट: शिकायत तंत्र एवं समावेशिता मानकों का आवधिक तृतीय पक्ष ऑडिट अनिवार्य होना चाहिए।
निष्कर्ष
भारत के शैक्षणिक संस्थानों में छात्रों की आत्महत्या और उत्पीड़न की बढ़ती घटनाएँ वहाँ व्याप्त गहरी संरचनात्मक समस्याओं को उजागर करती हैं। इस संकट से निपटने के लिए ‘रोहित अधिनियम’ जैसे प्रभावी कानूनी प्रावधानों, सहभागी और पारदर्शी शिकायत निवारण तंत्र, तथा संस्थागत संस्कृति में सहानुभूति और न्याय आधारित दृष्टिकोण को अपनाना अत्यंत आवश्यक है। जब हाशिए पर खड़े छात्रों की वास्तविक रूप से सुनवाई होगी, उन्हें सुरक्षित वातावरण और सशक्तिकरण प्राप्त होगा, तभी शैक्षणिक परिसर शिक्षा और सम्मान के समावेशी केंद्र बन सकेंगे।