प्रश्न की मुख्य माँग
- बाजारीकरण के प्रभावों को कम करने में राज्य की भूमिका
- स्वास्थ्य सेवा के बाजारीकरण के प्रतिकूल प्रभाव
- ज़मीनी स्तर पर स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच को सुदृढ़ करने के उपाय
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उत्तर
भारत की स्वास्थ्य सेवा प्रणाली बढ़ते बाजारीकरण और पहुँच एवं सामर्थ्य में बढ़ती असमानताओं का सामना कर रही है। हालाँकि निजी क्षेत्र के विकास ने क्षमता में सुधार किया है, लेकिन इसने असमानताओं को भी गहरा किया है, जिससे भारतीय संविधान के अनुच्छेद 47 के अनुरूप न्यायसंगत और सार्वभौमिक स्वास्थ्य सेवा वितरण सुनिश्चित करने के लिए एक मजबूत सरकार की भूमिका आवश्यक हो जाती है।
स्वास्थ्य सेवा के बाजारीकरण के प्रतिकूल प्रभाव
- उच्च लागत: लाभ-संचालित स्वास्थ्य सेवा इलाज के खर्चों को बढ़ाती है, जिससे गरीबों के लिए पहुँच सीमित हो जाती है।
- उदाहरण: उच्च आउट-ऑफ-पॉकेट खर्च (~48%, राष्ट्रीय स्वास्थ्य खाते)।
- शहरी झुकाव: शहरों में निजी क्षेत्र का संकेंद्रण ग्रामीण स्वास्थ्य आवश्यकताओं की उपेक्षा करता है।
- उदाहरण: 80% से अधिक डॉक्टर, 75% औषधालय और 60% अस्पताल शहरी भारत में हैं (BHI 2023)।
- अत्यधिक उपचार: नीति आयोग के अवलोकन के अनुसार, अनावश्यक प्रक्रियाओं के लिए मिलने वाले प्रोत्साहन से निजी अस्पतालों में स्वास्थ्य सेवा का बोझ बढ़ता है।
- अन्यायपूर्ण पहुँच: भुगतान करने की क्षमता ही उपचार की गुणवत्ता और गति तय करती है।
- उदाहरण: कोविड-19 के दौरान ICU और ऑक्सीजन की पहुँच में असमानताएँ देखी गईं।
- निवारक देखभाल की उपेक्षा: बाजार का फोकस निवारक स्वास्थ्य के बजाय केवल उपचारात्मक स्वास्थ्य पर बना रहता है।
- उदाहरण: टीकाकरण और प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा में निजी निवेश का कम होना।
बाजारीकरण को कम करने में सरकार की भूमिका
- नियामक निरीक्षण: निजी स्वास्थ्य सेवा में शोषण को रोकने के लिए मूल्य सीमा और गुणवत्ता मानक सुनिश्चित करना।
- उदाहरण: क्लिनिकल एस्टेब्लिशमेंट एक्ट अस्पतालों में दरों और मानकों को नियंत्रित करता है।
- सार्वजनिक प्रावधान: निजी देखभाल के किफायती विकल्प प्रदान करने के लिए सरकारी अस्पतालों को मजबूत करना।
- उदाहरण: AIIMS का विस्तार और PMSSY तृतीयक सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा तक पहुँच में सुधार करते हैं।
- वित्तीय सुरक्षा: आउट-ऑफ-पॉकेट खर्च को कम करने के लिए बीमा कवरेज का विस्तार करना।
- उदाहरण: आयुष्मान भारत-PMJAY कमजोर परिवारों को ₹5 लाख का कवरेज प्रदान करता है।
- आवश्यक सेवाएँ: मुफ्त या रियायती दरों पर आवश्यक दवाओं और डायग्नोस्टिक्स (जाँच) की गारंटी देना।
- उदाहरण: जन औषधि केंद्र स्वास्थ्य सेवा पर जेब से होने वाले खर्च को कम करने में मदद करते हैं।
- उन्नत सार्वजनिक स्वास्थ्य वित्तपोषण: सस्ती और मजबूत स्वास्थ्य सेवा के लिए सरकारी खर्च को जीडीपी के 2.5% तक बढ़ाना।
जमीनी स्तर पर स्वास्थ्य सेवा की पहुँच को मजबूत करने के उपाय
- प्राथमिक स्तर को मजबूत करना: व्यापक देखभाल के लिए स्वास्थ्य और कल्याण केंद्रों (HWCs) का विस्तार और उन्नयन करना।
- उदाहरण: आयुष्मान भारत का लक्ष्य प्राथमिक सेवाएं प्रदान करने वाले 1.5 लाख HWCs तैयार करना है।
- मानव संसाधन: ग्रामीण क्षेत्रों में प्रशिक्षित स्वास्थ्य कर्मियों की संख्या बढ़ाना।
- उदाहरण: राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) के तहत आशा (ASHA) कार्यकर्ता अंतिम मील तक स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करती हैं।
- डिजिटल स्वास्थ्य: पहुँच के अंतर को पाटने के लिए टेलीमेडिसिन और डिजिटल प्लेटफॉर्म का उपयोग करना।
- उदाहरण: ग्रामीण भारत में ई-संजीवनी टेलीकंसल्टेशन प्लेटफॉर्म का व्यापक रूप से उपयोग किया गया।
- विकेंद्रीकृत योजना: स्वास्थ्य योजना और निगरानी में स्थानीय निकायों को सशक्त बनाना।
- उदाहरण: केरल के विकेंद्रीकृत स्वास्थ्य मॉडल ने प्राथमिक स्वास्थ्य परिणामों में सुधार किया।
- बुनियादी ढाँचे को बढ़ावा: उप-केंद्रों, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (PHCs) और जिला अस्पतालों में निवेश करना।
- उदाहरण: पीएम आयुष्मान भारत स्वास्थ्य अवसंरचना मिशन (PM-ABHIM) ग्रामीण सुविधाओं को मजबूत करता है।
निष्कर्ष
सभी के लिए लचीला और सुलभ स्वास्थ्य सेवा बुनियादी ढाँचा तैयार करके SDG 3 को प्राप्त करने के साथ-साथ, समानता पर SDG 10 और बुनियादी ढाँचे पर SDG 9 को आगे बढ़ाने के लिए विनियमन, सार्वजनिक निवेश और समुदाय-आधारित वितरण को जोड़ने वाला एक संतुलित दृष्टिकोण आवश्यक है।