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Q. अध्यादेशों के माध्यम से विधायी जाँच को दरकिनार करना भारत के संसदीय लोकतंत्र में गहरी जड़ें जमा चुकी संस्थागत गिरावट को दर्शाता है। विश्लेषण कीजिए। संसद की विचार-विमर्श क्षमता को बहाल करने के लिए संरचनात्मक सुधारों का सुझाव दीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)

June 3, 2026

GS Paper IIIndian Polity

प्रश्न की मुख्य माँग

  • बार-बार अध्यादेश (Ordinances) जारी किए जाने से परिलक्षित संस्थागत क्षरण का विश्लेषण कीजिए।
  • अध्यादेशों का नियमित रूप से सहारा लेने के संसदीय लोकतंत्र पर पड़ने वाले प्रभावों की चर्चा कीजिए।
  • विचार-विमर्श आधारित विधायी क्षमता को पुनर्स्थापित करने हेतु आवश्यक संरचनात्मक सुधारों का सुझाव दीजिए।

उत्तर

परिचय

अनुच्छेद-123 अध्यादेशों को केवल आपात एवं तात्कालिक परिस्थितियों से निपटने हेतु एक असाधारण विधायी उपाय के रूप में परिकल्पित करता है। किंतु इनका नियमित उपयोग तथा संसदीय जाँच-पड़ताल में गिरावट, विचार-विमर्श आधारित लोकतंत्र के कमजोर होने का संकेत देती है और कानून-निर्माण तथा कार्यपालिका की जवाबदेही सुनिश्चित करने में संसद की घटती भूमिका को लेकर चिंताएँ उत्पन्न करती है।

बार-बार अध्यादेश जारी किए जाने से परिलक्षित संस्थागत क्षरण

  • विधायी प्रक्रिया का परिहार: अध्यादेश नियमित विधायी प्रक्रिया का विकल्प बनते जा रहे हैं, जिससे संसद की भूमिका केवल पश्चात् अनुमोदन (Post-facto Ratification) तक सीमित हो रही है।
    • उदाहरण: सर्वोच्च न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन अध्यादेश, 2026 को, प्रस्ताव पहले ही विधेयक के रूप में स्वीकृत होने के बावजूद, जारी किया गया, जिससे पूर्व संसदीय बहस को दरकिनार कर दिया गया।
  • कार्यपालिका का प्रभुत्व: अध्यादेशों का बार-बार उपयोग संसदीय सर्वोच्चता की कीमत पर कार्यपालिका की कानून-निर्माण शक्ति को सुदृढ़ करता है।
  • विचार-विमर्श में क्षरण: महत्त्वपूर्ण नीतिगत निर्णय विस्तृत चर्चा, संशोधन तथा सहमति-निर्माण की प्रक्रिया से वंचित रह जाते हैं।
  • समितियों की भूमिका में गिरावट: विधायी जाँच-पड़ताल में कमी से साक्ष्य-आधारित कानून-निर्माण तथा हितधारकों से परामर्श की प्रक्रिया कमजोर होती है।
    • उदाहरण: हाल के वर्षों में विभाग-संबंधित स्थायी समितियों को भेजे जाने वाले विधेयकों का अनुपात उल्लेखनीय रूप से घटा है।
  • जवाबदेही का कमजोर होना: जब जाँच-पड़ताल की संस्थागत व्यवस्थाओं को दरकिनार किया जाता है, तब संसद की निगरानी भूमिका प्रभावित होती है।
    • उदाहरण: प्रश्नकाल, जो पारंपरिक रूप से कार्यपालिका को जवाबदेह ठहराने का संसद का प्रमुख साधन रहा है, उसके महत्त्व में लगातार गिरावट देखी गई है।

संसदीय लोकतंत्र पर अध्यादेशों के नियमित उपयोग के प्रभाव

  • लोकतांत्रिक घाटा: पूर्व संसदीय चर्चा और सहमति-निर्माण के बिना बनाए गए कानून अपनी लोकतांत्रिक वैधता खो देते हैं।
    • उदाहरण: सर्वोच्च न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन अध्यादेश, 2026 को संसद में प्रस्ताव पर चर्चा होने से पहले ही जारी कर दिया गया।
  • शक्तियों के पृथक्करण का कमजोर होना: निर्णय-निर्माण की प्रक्रिया निर्वाचित प्रतिनिधियों से हटकर कार्यपालिका के हाथों में अधिक केंद्रित हो जाती है।
    • उदाहरण: भूमि अधिग्रहण अध्यादेश (2014-15) को बार-बार पुनः जारी किया जाना अध्यादेश-निर्माण के प्रति कार्यपालिका की प्राथमिकता को दर्शाता है।
  • नीतिगत कमजोरियाँ: समिति परीक्षण और संसदीय बहस के अभाव में विधायी त्रुटियों तथा अनपेक्षित परिणामों की संभावना बढ़ जाती है।
    • उदाहरण: कृषि कानून, 2020 को स्थायी समिति के पास भेजे बिना पारित किया गया, जिससे व्यापक चिंताएँ उत्पन्न हुईं और अंततः उन्हें निरस्त करना पड़ा।
  • आदेश आधारित शासन: अध्यादेशों का बार-बार उपयोग विचार-विमर्श आधारित संवैधानिक प्रक्रियाओं के बजाय कार्यपालिका के आदेशों के माध्यम से शासन को सामान्य बना देता है।
    • उदाहरण: डी. सी. वाधवा बनाम बिहार राज्य (1987) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने बिहार सरकार द्वारा अध्यादेशों को बार-बार पुनः जारी करने की आलोचना की थी।

विचार-विमर्श आधारित क्षमता को पुनर्स्थापित करने हेतु संरचनात्मक सुधार

  • समितियों को सशक्त बनाना: अनिवार्य समिति परीक्षण विशेषज्ञों एवं हितधारकों की समीक्षा के माध्यम से विधायी गुणवत्ता में सुधार ला सकता है।
    • उदाहरण: लेख में विशेष रूप से बहुदलीय सदस्यता (Cross-Party Membership) वाली स्थायी समितियों को सुदृढ़ करने का सुझाव दिया गया है।
  • अध्यादेशों पर सीमाएँ: स्पष्ट वैधानिक मानदंडों के माध्यम से अध्यादेशों के उपयोग को केवल वास्तविक एवं सिद्ध आपात परिस्थितियों तक सीमित किया जाना चाहिए।
  • संरक्षित बहस: विधेयकों पर सार्थक जाँच-पड़ताल सुनिश्चित करने हेतु चर्चा के लिए न्यूनतम एवं सुनिश्चित समय प्रदान किया जाना चाहिए।
  • अनुसंधान सहायता: विधायकों को जटिल होते जा रहे कानूनों का प्रभावी परीक्षण करने के लिए संस्थागत शोध सहायता उपलब्ध कराई जानी चाहिए।
    • उदाहरण: सूचित संसदीय सहभागिता के लिए विधायी अनुसंधान अवसंरचना में निवेश किया जाए।
  • निगरानी तंत्र का पुनर्जीवन: जवाबदेही संबंधी तंत्रों को मजबूत करके संसद की नियंत्रण एवं संतुलन (Checks and Balances) की भूमिका को पुनर्स्थापित किया जा सकता है।
    • उदाहरण: संविधान के कामकाज की समीक्षा के लिए राष्ट्रीय आयोग ने प्रश्नकाल तथा समिति-आधारित निगरानी की सुरक्षा एवं सुदृढ़ीकरण पर बल दिया था।

निष्कर्ष

संसदीय लोकतंत्र अपनी वैधता विचार-विमर्श, जाँच-पड़ताल तथा सहमति-निर्माण से प्राप्त करता है। समिति-आधारित जाँच-पड़ताल को पुनर्स्थापित करना, अध्यादेशों के दुरुपयोग को सीमित करना तथा संस्थागत जवाबदेही को सुदृढ़ बनाना, कार्यपालिका-केंद्रित शासन को रोकने और संसद को लोकतांत्रिक विचार-विमर्श के प्रमुख मंच के रूप में बनाए रखने के लिए अत्यंत आवश्यक है।

The routine resort to the Ordinance route and bypassing of legislative scrutiny reflects a deep-rooted institutional decay in India’s parliamentary democracy. Analyse. Suggest structural reforms to restore the deliberative capacity of the Parliament. in hindi

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