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Q. सर्वोच्च न्यायालय ने 'मतदान के अधिकार' की कानूनी स्थिति पर बार-बार मतभेद व्यक्त किए हैं। इस अधिकार के संबंध में न्यायिक व्याख्या के विकास पर चर्चा कीजिए और विश्लेषण कीजिए कि क्या इसे संवैधानिक अधिकार के रूप में मान्यता दी जानी चाहिए। (15 अंक, 250 शब्द)

December 5, 2025

GS Paper IIndian Polity

प्रश्न की मुख्य माँग

  • ‘मतदान के अधिकार’  के संबंध में न्यायिक व्याख्या के विकास पर चर्चा कीजिए |
  • क्या यह एक संवैधानिक अधिकार के रूप में मान्यता पाने योग्य है।
  • विपक्ष में  तर्क 

उत्तर

सर्वोच्च न्यायालय का मतदान के अधिकार पर दृष्टिकोण वैधानिक, संवैधानिक और मौलिक ढाँचे के बीच परिवर्तित होता रहा है। जहाँ अनुच्छेद-326 वयस्क मताधिकार की व्याख्या करता है, वहीं सर्वोच्च न्यायलय की विभिन्न पीठों ने समय–समय पर इसकी स्थिति को और मजबूत किया है या सीमित किया है, जिससे विकसित होता न्यायशास्त्र और चुनावी सुधारों के बीच उपचारों और लोकतांत्रिक संरक्षणों का स्वरूप तय हुआ है।

‘मतदान के अधिकार  के संबंध में न्यायिक व्याख्या का विकास

  • संवैधानिक गारंटी (अनुच्छेद-326): अनुच्छेद-326 वयस्क मताधिकार प्रदान करता है, जिससे प्रत्येक नागरिक (18 वर्ष से अधिक, अयोग्यताओं के अधीन) को मतदाता के रूप में पंजीकृत होने का अधिकार प्राप्त होता है।
  • प्रारंभिक न्यायिक दृष्टिकोण:  कुलदीप नैयर बनाम भारत संघ मामले (वर्ष 2006) में, न्यायालय ने माना कि मतदान का अधिकार ( चुनाव लड़ने का अधिकार) “पूर्णतः और सरल रूप से वैधानिक अधिकार” है, न मौलिक अधिकार।
  • वैधानिक स्थिति की पुनर्पुष्टि: इससे पहले ज्योति बसु बनाम देवी घोषाल (वर्ष 1982) में, न्यायालय ने इसी प्रकार “निर्वाचन का अधिकार” को वैधानिक बताया था, न कि मौलिक या सामान्य विधिक अधिकार।
  • लोकतांत्रिक महत्त्व की मान्यता: इसे वैधानिक कहते हुए भी, न्यायालय ने मतदान को लोकतंत्र के केंद्र में माना, उसने यह स्वीकार किया कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव संविधान की मूल संरचना का हिस्सा हैं।
  • वर्तमान परिवर्तन संवैधानिक स्थिति की ओर: वर्ष 2023 में, अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ (EC चयन मामला) में पाँच-न्यायाधीशीय पीठ ने मतदान को “संवैधानिक अधिकार” बताया।

इसके संवैधानिक अधिकार के रूप में मान्यता के गुण

  • लोकतांत्रिक मूल: मतदान लोकतंत्र का मूल आधार है; इसे संविधान की एक मूल विशेषता के रूप में मान्यता देना नागरिकों के अधिकारों तथा लोकतांत्रिक संरचना के संवैधानिक संरक्षण को और सुदृढ़ करेगा।
  • अनुच्छेद 19 से संबंध: सूचित मतदान एक अभिव्यक्तिक गतिविधि है; अतः अनुच्छेद 19(1)(a) इसे मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता देने के संवैधानिक आधार को सशक्त करता है।
  • अनुच्छेद-21: सार्वजनिक मामलों में भागीदारी जीवन और गरिमा का अभिन्न हिस्सा है।
  • उपचारात्मक स्पष्टता: “मताधिकार की मौलिक स्थिति अनुचित या मनमाने मताधिकार के विरुद्ध प्रत्यक्ष संवैधानिक उपचार (रिट) की उपलब्धता सुनिश्चित करेगी।”
  • समावेशी राजनीतिक भागीदारी: संवैधानिक अधिकार राज्य की जवाबदेही सुनिश्चित करता है कि वह प्रवासी, शहरी गरीब, दिव्यांग मतदाताओं और दूरस्थ नागरिकों के लिए पहुँच सक्षम करे।

इसके संवैधानिक अधिकार के रूप में मान्यता न देने के कारण

  • मतदाता सूची, अयोग्यताएँ, परिसीमन तथा निर्वाचन प्रक्रियाएँ स्वभावतः परिवर्तनशील विषय हैं; अतः इन्हें कठोर संवैधानिक प्रावधानों के बजाय लचीले वैधानिक विनियमन के अंतर्गत ही अधिक प्रभावी रूप से संचालित किया जा सकता है।
  • अत्यधिक वाद-विवाद का जोखिम: मतदान को संवैधानिक बनाने से प्रत्येक बूथ-स्तरीय या प्रक्रियागत विवाद न्यायालयों में पहुँच सकता है, जिससे न्यायपालिका पर भार बढ़ेगा।
  • निर्वाचन आयोग की स्वायत्तता: पूर्ण संवैधानिककरण से निर्वाचन आयोग के संचालन क्षेत्र में न्यायिक अतिक्रमण की संभावना बढ़ सकती है, जिससे संस्थागत संतुलन और कार्यात्मक स्वायत्तता प्रभावित हो सकती है।

निष्कर्ष

लोकतंत्र की संवैधानिक प्रधानता और इस अधिकार का अनुच्छेद-19 और 21 से संबंध देखते हुए, मताधिकार को मौलिक गारंटी के रूप में न्यायिक मान्यता देना प्रभावी है, परंतु न्यायिक अतिक्रमण और प्रशासनिक व्यवधान से बचने के लिए इसे पूर्वनिर्णयों, संस्थागत क्षमता और व्यावहारिक परिणामों के संतुलन के साथ अपनाया जाना चाहिए।

The Supreme Court has repeatedly differed on the legal status of the ‘right to vote’. Discuss the evolution of judicial interpretation regarding this right and analyse whether it merits recognition as a constitutional right. in hindi

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