Q. हाल ही में, सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए निर्णय में ‘100 मीटर की परिधि’ की अवधारणा ने अरावली के संरक्षण को सीमित कर दिया है। यह विखंडन और अतिक्रमण दिल्ली के वायु प्रदूषण, भूजल समस्या और अत्यधिक गर्मी को कैसे बढ़ाता है? शहर की ओर रेगिस्तान के विस्तार को रोकने वाले एक प्राकृतिक अवरोध के रूप में अरावली की भूमिका पर प्रकाश डालिए। (15 अंक, 250 शब्द)

प्रश्न की मुख्य माँग

  • कैसे अरावली का विखंडन दिल्ली के वायु प्रदूषण को बढ़ाता है। 
  • कैसे अरावली का विखंडन भूजल संकट को बढ़ाता है। 
  • कैसे अरावली का विखंडन अत्यधिक उष्मन को बढ़ाता है। 
  • रेगिस्तान के विस्तार के विरुद्ध अरावली का अवरोधक के रूप में भूमिका दीजिए |

उत्तर

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा हाल ही में पर्यावरण मंत्रालय (समिति) की एक  सिफारिश को स्वीकार किया गया। इसमें अरावली पहाड़ियों को स्थानीय भू-स्तर से 100 मीटर या अधिक ऊँचाई वाले स्थलस्वरूप के रूप में परिभाषित किया गया  है, जो अरावली के संरक्षण को अत्यंत सीमित कर देती है। यह सीमा अरावली की 90% से अधिक पारिस्थितिक रूप से महत्त्वपूर्ण कम ऊँचाई वाली पहाड़ियों और झाड़ीदार भूभाग को संरक्षण के दायरे से बाहर कर सकती है। इससे न केवल व्यापक खनन और अतिक्रमण को बढ़ावा मिल सकता है बल्कि दिल्ली–एनसीआर क्षेत्र में पर्यावरणीय क्षरण भी तेजी से बढ़ सकता है।

कैसे अरावली का विखंडन दिल्ली के वायु प्रदूषण को बढ़ाता है –

  • धूल में वृद्धि : कम ऊँची पहाड़ियों और वनस्पति के नष्ट होने से मृदा की ऊपरी परत अनावृत हो जाती है, जो धूल के स्रोत में परिवर्तित होकर दिल्ली में कण प्रदूषण में वृद्धि करती है।
  • हरित आवरण का नुकसान: कम ऊँची पहाड़ियों में वनों की कटाई प्रदूषकों और धूल की वायु-शोधन क्षमता को कम करती है।
  • धूल प्रवेश के विरुद्ध अवरोध का कमजोर होना: कम ऊँचाई वाली पहाड़ियों के नष्ट होने से आसपास के शुष्क क्षेत्रों की हवाओं के माध्यम से रेगिस्तानी धूल आसानी से दिल्ली  में प्रवेश कर पाती है, जिससे वायु प्रदूषण में वृद्धि होती है।
  • स्थानीय उत्सर्जनों का बढ़ता संकेंद्रण: कम ऊँचाई वाले क्षेत्र जब बस्तियों या उद्योगों में बदल जाते हैं, तो अनुपयुक्त वायु निकासी प्रणाली  के कारण उत्सर्जन इन क्षेत्रों में फँस जाते हैं, जिससे स्मॉग की घटनाएँ बढ़ती हैं।

कैसे अरावली का विखंडन भूजल संकट को बढ़ाता है

  • भूजल पुनर्भरण में बाधा: पहाड़ी ढलान और प्राकृतिक भूमि वर्षाजल को सोखकर भूजल पुनर्भरण करती है, इनके नष्ट होने से पुनर्भरण क्षेत्र नष्ट होते हैं और भूजलस्तर नीचे चला जाता है।
  • अपवाह में वृद्धि: वनस्पति रहित ढलानों पर वर्षाजल तेजी से बह जाता है, जिससे अवशोषण कम होता है, बाढ़ का खतरा बढ़ता है और भूजल पुनर्भरण घटता है।
  • दूषित पुनर्भरण: अतिक्रमण से अक्सर कचरे और प्रदूषकों में वृद्धि होती है, जो भू-स्तरों में रिसकर भूजल की गुणवत्ता को खराब कर देता है।
  • जलग्रहण क्षेत्रों का संकुचन: पहाड़ी आधारित जलग्रहण क्षेत्रों के नष्ट होने से स्थानीय झरने और पारंपरिक कुएँ सूख जाते हैं, जिससे दूरस्थ भूजल स्रोतों पर निर्भरता बढ़ती है।

कैसे अरावली का विखंडन अत्यधिक उष्मन को बढ़ाता है 

  • वनस्पति शीतलन का नुकसान: वृक्ष आवरण और वनस्पति नष्ट होने से वाष्पोत्सर्जन और छाया क्षेत्र कम हो जाता है, जिससे भूमि और परिवेश के तापमान में वृद्धि होती है।
  • नई बस्तियों में ऊष्मा-द्वीप प्रभाव: नगरीकरण के लिए कम ऊँचाई की पहाड़ियों को नष्ट करने से कंक्रीट सतहें बढ़ती हैं, जो अत्यधिक ऊष्मा अवशोषित कर स्थानीय शहरी ऊष्मा -द्वीप प्रभाव बढ़ाती हैं।
  • पवन अवरोध का कम होना: पहाड़ियाँ पहले हवाओं को दिशा देकर तापमान नियंत्रित करती थीं;  विखंडन से यह अवरोध समाप्त हो जाता है, जिससे हवा स्थिर और गर्म हो जाती है।
  • मृदा क्षरण और गहरे रंग की सतहें: मृदा की खुली सतह और कंक्रीट भूमि अधिक सौर विकिरण अवशोषित करती हैं, जिससे आसपास के क्षेत्र वनस्पति युक्त ढलानों की तुलना में अधिक गर्म होते हैं।

रेगिस्तान के विस्तार के विरुद्ध अरावली की अवरोधक के रूप में भूमिका

  • प्राकृतिक हरित क्षेत्र: सुरक्षित पहाड़ियाँ और वनस्पति एक अवरोध की तरह कार्य करती हैं, जो आसपास के शुष्क क्षेत्रों से आने वाली रेतीली हवाओं को दिल्ली की ओर बढ़ने से रोकती हैं।
  • मृदा और नमी संरक्षण: अरावली की मृदा और झाड़ीदार वन नमी को अवरोधित करते हैं और लवणीय रेत के प्रसार को रोकते हैं, जिससे आंतरिक क्षेत्रों की पारिस्थितिकी सुरक्षित रहती है।
  • जलवायु संतुलन: यह सूक्ष्म जलवायु को स्थिर रखते हैं, धूल के प्रवाह को नियंत्रित करते हैं, और शुष्क क्षेत्रों की चरम स्थितियों को शहरी क्षेत्रों में प्रवेश करने से रोकते हैं।
  • पारिस्थितिक निरंतरता: सतत पहाड़ी श्रेणियाँ अर्ध-शुष्क पारिस्थितिकी तंत्र की वनस्पति और जीव-जंतुओं को सहारा देती हैं, जबकि विखंडन इस निरंतरता को नष्ट कर रेगिस्तान जैसे  क्षरण में वृद्धि करती है।

निष्कर्ष

100-मीटर की परिधि’ के नियम के माध्यम से अरावली संरक्षण को सीमित करना उसकी महत्त्वपूर्ण पर्यावरणीय सेवाओं; वायु शोधन क्षमताओं, भूजल पुनर्भरण, तापमान नियन्त्रण और रेगिस्तान विस्तार रोकथाम को गंभीर रूप से खतरे में डालता है। केवल पुनर्स्थापन, सतत पहाड़ी संरक्षण और कड़े विनियमन ही दिल्ली की जलवायु और जल सुरक्षा के लिए इस जीवनरेखा को सुरक्षित रख सकते हैं।

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