Q. सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 'आवश्यक धार्मिक प्रथाओं' (ERP) परीक्षण पर निर्भरता ने अक्सर इसे एक धार्मिक भूमिका निभाने के लिए मजबूर किया है। यह हमारे संविधान के धर्मनिरपेक्ष लोकाचार को कमजोर करता है। प्रस्तावित 'बहिष्करण-विरोधी' परीक्षण के आलोक में इस कथन का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। नया ढाँचा सामुदायिक आस्था और व्यक्तिगत गरिमा के बीच बेहतर संतुलन कैसे स्थापित कर सकता है? (15 अंक, 250 शब्द)

February 26, 2026

GS Paper IIIndian Polity

प्रश्न की मुख्य माँग

  • आवश्यक धार्मिक प्रथा सिद्धांत की आलोचना और इसके धर्मनिरपेक्ष तनाव के बारे में बताइए। 
  • बहिष्करण-विरोधी परीक्षण और आस्था तथा व्यक्तिगत गरिमा के मध्य संतुलन का वर्णन कीजिए।

उत्तर

शिरूर मठ (1954) मामले में विकसित आवश्यक धार्मिक प्रथाओं (ERP) सिद्धांत के अनुसार, न्यायालयों को यह निर्धारित करना होता है कि क्या कोई प्रथा किसी धर्म के लिए आवश्यक है ताकि अनुच्छेद-25 और 26 के तहत संवैधानिक संरक्षण प्राप्त कर सके। आलोचकों का तर्क है कि यह न्यायाधीशों को धार्मिक भूमिका निभाने के लिए बाध्य करता है। उभरता हुआ बहिष्करण-विरोधी दृष्टिकोण, विशेष रूप से सबरीमाला (2018) मामले में व्यक्त किया गया, धार्मिक केंद्रीयता से ध्यान हटाकर संवैधानिक हानि पर केंद्रित करना चाहता है।

ERP सिद्धांत की आलोचना और उसके धर्मनिरपेक्ष तनाव

  • धार्मिक सिद्धांतों का न्यायिक निर्धारण: न्यायालय धार्मिक प्रथाओं की शास्त्रीय अनिवार्यता का परीक्षण करते हैं, जिससे वे वस्तुतः धार्मिक व्याख्याकार की भूमिका निभाते हैं।
    • उदाहरण: शिरूर मठ बनाम मद्रास राज्य (1954) में यह माना गया कि न्यायालय यह निर्धारित कर सकते हैं कि कौन-सी प्रथा “अनिवार्य धार्मिक प्रथा” है।
  • विभिन्न मामलों में असंगत अनुप्रयोग: विभिन्न पीठों द्वारा EPR सिद्धांत का भिन्न-भिन्न ढंग से प्रयोग किया गया है।
    • उदाहरण: दुर्गाह कमेटी बनाम सैयद हुसैन अली (1961) में तथाकथित “अंधविश्वासी” प्रथाओं को संरक्षण से बाहर रखकर दायरे को संकुचित किया गया।
  • लैंगिक बहिष्करण संबंधी मामलों में धार्मिक परीक्षण: न्यायालयों ने परंपराओं के शास्त्रीय आधार का परीक्षण किया।
    • उदाहरण: इंडियन यंग लॉयर्स एसोसिएशन बनाम केरल राज्य (सबरीमाला, 2018) में महिलाओं के प्रवेश-निषेध को ब्रह्मचर्य-आधारित परंपरा के संदर्भ में परखा गया।
  • बहुसंख्यक पूर्वाग्रह का जोखिम: EPR सिद्धांत किसी धर्म के भीतर प्रचलित प्रमुख व्याख्याओं को वरीयता दे सकता है।
    • उदाहरण: शायरा बानो बनाम भारत संघ (ट्रिपल तलाक मामला, 2017) में यह परीक्षण किया गया कि क्या त्वरित तलाक इस्लाम की अनिवार्य प्रथा है।
  • धर्मनिरपेक्ष न्यायालय द्वारा सिद्धांतगत विश्लेषण: न्यायिक तर्क-वितर्क में प्रायः धार्मिक ग्रंथों का हवाला दिया जाता है।
    • उदाहरण: आयशत शिफा बनाम कर्नाटक राज्य (हिजाब मामला, 2022) में यह प्रश्न उठाया गया कि क्या हिजाब इस्लाम की अनिवार्य प्रथा है।
  • संवैधानिक सर्वोच्चता का संभावित क्षरण: EPR सिद्धांत कभी-कभी मौलिक अधिकारों की अपेक्षा धार्मिक सिद्धांतों को अत्यधिक महत्त्व दे सकता है।
    • उदाहरण: सबरीमाला (2018) में असहमति मत ने न्यायिक अतिक्रमण के प्रति सावधानी बरतने की आवश्यकता पर बल दिया, साथ ही EPR की जटिलता को भी स्वीकार किया।

बहिष्करण-विरोधी परीक्षण तथा आस्था एवं व्यक्तिगत गरिमा के मध्य संतुलन

  • धर्मशास्त्र नहीं, संवैधानिक क्षति पर केंद्रित दृष्टिकोण: यह परीक्षण इस बात का आकलन करता है कि क्या कोई प्रथा व्यक्तियों को गरिमा और समानता के उल्लंघन के माध्यम से बहिष्कृत करती है।
    • उदाहरण: सबरीमाला (2018) में न्यायमूर्ति डी.वाई. चंद्रचूड़ के सहमति मत ने “अनिवार्यता” के बजाय गरिमा को प्रमुखता दी।
  • अनुच्छेद-14 के अंतर्गत समानता को प्राथमिकता: बहिष्करणकारी प्रथाओं को समानता के सिद्धांतों की कसौटी पर परखा जाता है।
    • उदाहरण: सबरीमाला (2018) में आयु-आधारित महिला प्रवेश-निषेध को निरस्त किया गया।
  • समुदायों के भीतर व्यक्तिगत स्वायत्तता का संरक्षण: समूह-आधारित प्रतिबंधों की अपेक्षा व्यक्तियों के अधिकारों को वरीयता दी जाती है।
    • उदाहरण: नवतेज सिंह जौहर बनाम भारत संघ (2018) में सामाजिक नैतिकता के स्थान पर व्यक्तिगत गरिमा को प्राथमिकता दी गई।
  • सिद्धांतगत अनिवार्यता से प्रभाव-आधारित परीक्षण की ओर परिवर्तन: न्यायालय शास्त्रीय अनिवार्यता के बजाय प्रथा के भेदभावपूर्ण प्रभाव का परीक्षण करता है।
    • उदाहरण: जोसेफ शाइन बनाम भारत संघ (2018) में व्यभिचार संबंधी कानून को धार्मिक आधार पर नहीं, बल्कि गरिमा के उल्लंघन के कारण निरस्त किया गया।
  • संवैधानिक नैतिकता के साथ सामंजस्य: न्यायालय हाशिए पर स्थित समूहों के संरक्षण हेतु रूपांतरणकारी संवैधानिकता का आह्वान करते हैं।
    • उदाहरण: शायरा बानो (2017) में तीन तलाक को मनमानेपन और लैंगिक अन्याय के आधार पर निरस्त किया गया।
  • सामुदायिक स्वायत्तता और मौलिक अधिकारों का संतुलन: अनुच्छेद 26 के अंतर्गत धार्मिक संप्रदायों के अधिकार संरक्षित हैं, किंतु वे मौलिक अधिकारों के अधीन हैं।
    • उदाहरण: एनसीटी दिल्ली बनाम भारत संघ (2018) में संवैधानिक नैतिकता को संस्थागत प्रभुत्व पर वरीयता दी गई, जिसे अधिकारों के संतुलन के संदर्भ में तुलनात्मक रूप से लागू किया जा सकता है।

निष्कर्ष

EPR सिद्धांत (ERP Doctrine) का उद्देश्य धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा करना था, किंतु इस प्रक्रिया में न्यायालय प्रायः धर्मशास्त्रीय व्याख्या के जटिल क्षेत्र में उलझ गए। इसके विपरीत, बहिष्करण-विरोधी रूपरेखा गरिमा, समानता और संवैधानिक नैतिकता को केंद्र में रखकर अधिक संवैधानिक रूप से सुदृढ़ दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है। सिद्धांतगत “अनिवार्यता” से ध्यान हटाकर अधिकार-आधारित क्षति पर केंद्रित यह दृष्टिकोण धर्मनिरपेक्ष संवैधानिक व्यवस्था में सामुदायिक आस्था और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मध्य बेहतर संतुलन स्थापित करता है।

The Supreme Court’s reliance on the ‘Essential Religious Practices’ (ERP) test has often forced it into a theological role. This undermines the secular ethos of our Constitution. Critically examine this statement in light of the proposed ‘Anti-Exclusion’ test. How can the new framework better balance communitarian faith with individual dignity? in hindi

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