Q.
जहाँ हरित क्रांति ने भारत की 'खाद्य सुरक्षा' (पेट भरण) को सफलतापूर्वक सुनिश्चित किया, वहीं इसके गहन रासायनिक मॉडल ने गंभीर पारिस्थितिक और स्वास्थ्य संकटों को जन्म दिया है, जिसका प्रतीक पंजाब की 'कैंसर ट्रेन' है। इस कथन का आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिए। पुनर्योजी कृषि द्वारा संचालित 'पोषण सुरक्षा' (पोषण भरण) की दिशा में नीतिगत बदलाव इस विरोधाभास का स्थायी समाधान कैसे प्रस्तुत कर सकता है? (15 अंक, 250 शब्द)
October 28, 2025
GS Paper IIIIndian Economy
प्रश्न की मुख्य माँग
- हरित क्रांति ने खाद्य सुरक्षा में किस प्रकार मदद की।
- हरित क्रांति के गहन रासायनिक मॉडल द्वारा उत्पन्न चुनौतियाँ।
- पुनर्योजी कृषि की ओर नीतिगत बदलाव किस प्रकार एक स्थायी समाधान प्रस्तुत कर सकता है?
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उत्तर
1960 के दशक की हरित क्रांति ने भारत को खाद्यान्न-अभावी देश से खाद्यान्न-समृद्ध राष्ट्र में परिवर्तित कर दिया। यह परिवर्तन उच्च उत्पादक किस्मों (HYVs) और कृत्रिम उर्वरकों के प्रयोग से संभव हुआ। हालाँकि, इस रासायनिक-आधारित मॉडल ने गंभीर पारिस्थितिकी और स्वास्थ्य संबंधी दुष्प्रभाव उत्पन्न किए।
हरित क्रांति द्वारा खाद्य सुरक्षा में योगदान
- फसल उत्पादन और उत्पादकता में वृद्धि: उच्च उत्पादक किस्मों (HYVs) के प्रयोग से गेहूँ और धान का उत्पादन अभूतपूर्व रूप से बढ़ा, जिससे भारत ने राष्ट्रीय खाद्य आत्मनिर्भरता प्राप्त की।
- अकाल और भुखमरी से सुरक्षा: कृषि-विज्ञान में तकनीकी प्रगति ने संकट के समय लाखों लोगों को अकाल से बचाया।
- उदाहरण: नॉर्मन बोरलॉग के अनुसंधान के लिए उन्हें वर्ष 1970 का नोबेल शांति पुरस्कार प्रदान किया गया।
- सिंचाई और उर्वरक उपयोग का विस्तार: सिंचाई अवसंरचना और कृत्रिम उर्वरक उत्पादन के विकास ने उच्च उत्पादकता को बनाए रखा।
- उदाहरण: हेबर-बॉश प्रक्रिया ने बड़े पैमाने पर उर्वरक उत्पादन संभव बनाया।
- ग्रामीण रोजगार और आर्थिक विकास: कृषि उत्पादकता में वृद्धि से ग्रामीण रोजगार सृजन हुआ और औद्योगिकीकरण को प्रोत्साहन मिला।
- उदाहरण: 1970–80 के दशक में कृषि आय में वृद्धि से ग्रामीण अर्थव्यवस्था सुदृढ़ हुई।
- सार्वजनिक खरीद प्रणाली द्वारा खाद्य सुरक्षा: न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP), बफर स्टॉक, और सार्वजनिक वितरण प्रणाली ने खाद्य मूल्य स्थिर किए और आयात पर निर्भरता कम की है।
रासायनिक-प्रधान मॉडल से उत्पन्न चुनौतियाँ
- मृदा ह्रास और पोषक असंतुलन: नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश के अत्यधिक प्रयोग से मृदा जैविक कार्बन घट गया है।
- उदाहरण: भारत में औसत मृदा जैविक कार्बन 0.3% से भी कम है, जबकि विशेषज्ञ 1% की अनुशंसा करते हैं।
- भूजल का दोहन और प्रदूषण: अत्यधिक सिंचाई और उर्वरक अपवाह से भूजल प्रदूषण और दोहन दोनों बढ़े।
- उदाहरण: हरियाणा जल संसाधन प्राधिकरण (HWRA), जून 2024 की रिपोर्ट के अनुसार 2,246 गाँव “रेड कैटेगरी” में आ चुके हैं, जहाँ भूजल 30 मीटर से नीचे चला गया है।
- स्वास्थ्य संकट और पारिस्थितिक प्रभाव: कीटनाशक के दीर्घकालिक प्रभावों से कैंसर और अन्य रोगों में वृद्धि हुई।
- उदाहरण: पंजाब की “कैंसर ट्रेन” इस संकट का प्रतीक बन चुकी है।
- एकल फसलीकरण और जैव विविधता का क्षरण: लगातार गेहूँ और धान की कृषि से दलहन एवं तिलहन फसलें हाशिए पर चली गईं, जिससे पारिस्थितिक संतुलन बिगड़ा।
- जलवायु पर प्रभाव: उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग से ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन बढ़े, जिससे वैश्विक तापन में योगदान हुआ।
पुनर्योजी कृषि की ओर नीतिगत बदलाव कैसे एक स्थायी समाधान प्रदान करता है
- मृदा स्वास्थ्य की बहाली: प्राकृतिक इनपुट्स और फसल विविधीकरण से मृदा जैविक पदार्थ बढ़ाकर उपजाऊपन पुनर्स्थापित किया जा सकता है।
- उदाहरण: विशेषज्ञ पंजाब, हरियाणा और राजस्थान की भूमि में 1% से अधिक मृदा कार्बन स्तर बढ़ाने की सिफारिश करते हैं।
- पोषण सुरक्षा का संवर्द्धन: दलहन और तिलहन की खेती को प्रोत्साहन देने से आहार विविधता और नाइट्रोजन स्थिरीकरण दोनों को लाभ होता है।
- उदाहरण: ₹11,440 करोड़ मिशन फॉर सेल्फ रिलाइंस इन पल्सेज (वर्ष 2025–31) का लक्ष्य 350 लाख टन उत्पादन तक पहुँचना है।
- रासायनिक निर्भरता में कमी: संतुलित पोषक प्रबंधन और जैविक कृषि पद्धतियाँ उर्वरक उपयोग घटाती हैं और प्रदूषण पर नियंत्रण करती हैं।
- जलवायु लचीलापन: स्वस्थ मृदा अधिक कार्बन अवशोषित करती है, जिससे सूखा-प्रतिरोध और जलवायु अनुकूलता बढ़ती है।
- सहयोग एवं नवाचार: नीतियाँ, उत्पाद, अभ्यास और साझेदारी मिलकर दीर्घकालीन कृषि परिवर्तन सुनिश्चित कर सकती हैं।
- उदाहरण: ग्लोबल एग्जेलरेट (Global AgXelerate) जैसे प्लेटफॉर्म और एग्वाया (AgVaya) और ICRIER के मध्य साझेदारी कृषि-नवाचार और वैश्विक बाजार संबंधों को बढ़ावा देती है।
निष्कर्ष
भारत को अब “पेट भरने” से “पोषण प्राप्त करने” की दिशा में बढ़ना होगा। पुनर्योजी, जलवायु-लचीली कृषि को कृषि अनुसंधान (Agri-R&D), फसल विविधीकरण और किसान सशक्तिकरण के माध्यम से बढ़ावा देना ही सतत् एवं पोषण-सुरक्षित विकास का मार्ग है।