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Q. भारतीय संविधान की अक्सर 'उधार का संविधान' कहकर आलोचना की जाती है, फिर भी राज्य और समाज के बीच संबंधों के प्रति अपने दृष्टिकोण में यह पश्चिमी संविधानवाद से काफी अलग है। परिवर्तनकारी संविधानवाद की अवधारणा के संदर्भ में चर्चा कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)

November 27, 2025

GS Paper IIIndian Polity

प्रश्न की मुख्य माँग

  • लोग भारत के संविधान को “उधार का संविधान’ क्यों कहते हैं? 
  • संविधान कैसे अद्वितीय है- समाज को आकार देना (परिवर्तनकारी संविधानवाद)।

उत्तर

परिवर्तनकारी संविधानवाद (Transformative Constitutionalism) की अवधारणा यह दर्शाती है कि एक संविधान केवल सीमाएँ निर्धारित करने वाला दस्तावेज नहीं है, बल्कि समाज को पुनर्निर्मित करने का एक उपकरण है। भारत के संविधान को अक्सर ‘उधार का संविधान’  कहा जाता है, क्योंकि इसमें वैश्विक संस्थागत मॉडलों को अपनाया गया है। हालाँकि, संरचनात्मक उधारी के स्थान पर यह संविधान परिवर्तनकारी संवैधानिकता का प्रतीक है, जिसका उद्देश्य समाज को बदलना, असमानताओं को समाप्त करना और न्याय, स्वतंत्रता तथा समानता को आगे बढ़ाना है।

क्यों लोग भारत के संविधान को ‘उधार का संविधान’ कहते हैं

  • संस्थागत रूपों को अपनाना: संविधान निर्माताओं ने कई विशेषताओं को अपनाया, जो पूर्व उपनिवेशी या विदेशी संविधानों में निहित थीं, जिससे इसे ‘उधार का संविधान’ कहा गया।
    • उदाहरण: भारत ने संसदीय प्रणाली और प्रशासनिक ढाँचे को ‘भारत सरकार अधिनियम’ से अपनाया।
  • सार्वभौमिक उदार अधिकार संबंधी परंपराओं का उपयोग: मौलिक नागरिक-राजनीतिक अधिकार वैश्विक उदार संवैधानिक परंपराओं से भी लिए गए, केवल स्वदेशी प्रथाओं से नहीं।
    • उदाहरण: अनुच्छेद-14 (कानून के समक्ष समानता) और अनुच्छेद-15 (भेदभाव निषेध) अंतरराष्ट्रीय कानूनी समानता मानकों से मेल खाते हैं।
  • उपनिवेशी विरासत से संरचनात्मक रूपरेखा: संविधान के कई भाग स्वतंत्रता पूर्व कानून और उपनिवेशी प्रशासनिक ढाँचे पर आधारित हैं।
    • उदाहरण: भाग III के मौलिक अधिकार राज्य की पूर्व-उपनिवेशी नौकरशाही और प्रशासनिक संरचना के साथ लागू होते हैं।
  • मूल स्वदेशी कानूनी संस्कृति का सीमित प्रभाव: कई प्रावधान वैश्विक और परंपरागत मॉडल पर आधारित हैं, जिससे यह ‘उधार का संविधान’ प्रतीत होता है।
  • संकलन की प्रकृति: संविधान विश्व के सर्वोत्तम अभ्यासों का संकलन प्रतीत होता है।
    • उदाहरण: उदार अधिकारों और सामाजिक न्याय उपायों का सम्मिलन विभिन्न संवैधानिक परंपराओं का समन्वय दर्शाता है।

संविधान कैसे अद्वितीय है (समाज को आकार देना)

  1. सामाजिक-आर्थिक असमानताओं का समाधान: संविधान यह मानता है कि भेदभाव केवल राज्य द्वारा नहीं, बल्कि सामाजिक तत्त्वों से भी उत्पन्न हो सकता है।
    • उदाहरण: अनुच्छेद-15(2) निजी व्यक्तियों द्वारा सार्वजनिक स्थानों में भेदभाव को रोकता है।
  2. सकारात्मक कार्रवाई के माध्यम से सामाजिक न्याय: पिछड़े वर्गों के लिए विशेष प्रावधान ऐतिहासिक अन्याय और संरचनात्मक असमानताओं को सुधारने के लिए अनुमति देते हैं।
    • उदाहरण: अनुच्छेद-15 और 16 सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों, अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षण प्रदान करते हैं।
  3. सांस्कृतिक, धार्मिक और भाषायी बहुलता की सुरक्षा: संविधान समूह-विशिष्ट अधिकारों की रक्षा करता है और विविधता को मान्यता देता है।
    • उदाहरण: अनुच्छेद-25–30 धार्मिक और भाषायी अल्पसंख्यकों को अपनी संस्कृति को मानने, संस्थान संचालित करने और पहचान बनाए रखने की अनुमति देते हैं।
  4. परिवर्तनशील और जीवंत दस्तावेज: न्यायिक व्याख्या और संवैधानिक नैतिकता के माध्यम से संविधान सामाजिक यथार्थ के अनुसार बदलता है और प्रगतिशील सामाजिक परिवर्तन को सक्षम बनाता है।
  5. अधिकार, कर्तव्य और सामाजिक न्याय का संतुलन: संविधान केवल राज्य की अधिकता को सीमित नहीं करता, बल्कि सामाजिक अन्याय को सुधारने के लिए राज्य को सशक्त बनाता है।

निष्कर्ष

भारत का संविधान अंतरराष्ट्रीय ढाँचों से प्रेरित होने के बावजूद अपने परिवर्तनकारी उद्देश्य के कारण विशिष्ट है। यह सामाजिक सुधार को सशक्त बनाता है, विविधता की रक्षा करता है और संवैधानिक नैतिकता के माध्यम से विकसित होता है। अतः इसे केवल ‘उधार का संविधान‘ नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण का मूल प्रकल्प मानना उचित है, जो भारत को एक न्यायसंगत और समावेशी समाज की ओर ले जाता है।

The Indian Constitution is often criticized as a ‘borrowed bag’, yet it departs significantly from Western constitutionalism in its approach to the relationship between the State and Society. Discuss with reference to the concept of transformative constitutionalism. in hindi

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