Q. गलवान संघर्ष (2020) के बाद भारत-चीन द्विपक्षीय संबंधों की बहाली एक जटिल प्रक्रिया बनी हुई है। विशेष रूप से वैश्विक विकास के संदर्भ में, भारत के साथ संबंधों को सामान्य बनाने के लिए चीन के हालिया प्रयास को प्रभावित करने वाले भू-राजनीतिक और आर्थिक कारकों की जाँच कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)

February 21, 2025

GS Paper IIIInternational Relations

प्रश्न की मुख्य माँग

  • इस बात पर प्रकाश डालिये कि गलवान संघर्ष (2020) के बाद भारत-चीन द्विपक्षीय संबंधों की बहाली एक जटिल प्रक्रिया बनी हुई है।
  • भारत के साथ संबंधों को सामान्य बनाने के लिए चीन के हालिया प्रयास को प्रभावित करने वाले भू-राजनीतिक कारकों का परीक्षण कीजिए, विशेष रूप से वैश्विक घटनाक्रम के संदर्भ में।
  • भारत के साथ संबंधों को सामान्य बनाने के लिए चीन के हालिया प्रयास को प्रभावित करने वाले आर्थिक कारकों का परीक्षण कीजिए, विशेष रूप से वैश्विक घटनाक्रम के संदर्भ में।

उत्तर

भारत-चीन द्विपक्षीय संबंधों में सीमा विवाद, आर्थिक संबंध और भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा की झलक मिलती है। गलवान में हुये संघर्ष के कारण दोनों देशों के बीच  संबंधों में दरार आईजिससे व्यापार, सैन्य सहयोग और कूटनीतिक जुड़ाव प्रभावित हुए। 2023 में द्विपक्षीय व्यापार 136 बिलियन डॉलर तक पहुंचने के बावजूद, अनसुलझे सीमा तनाव और रणनीतिक अविश्वास पूर्ण पैमाने पर सामान्यीकरण में बाधा बन रहे हैं।

गलवान संघर्ष (2020) के बाद भारत-चीन द्विपक्षीय संबंधों की पुनर्बहाली एक जटिल प्रक्रिया बनी हुई है

  • अनसुलझे सीमा मुद्दे: कूटनीतिक वार्ता के बावजूद, गलवान और देपसांग जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर सैनिकों की वापसी और गश्त के अधिकारों की बहाली पर स्पष्टता की कमी लगातार तनाव उत्पन्न करती है। 
    • उदाहरण के लिए: अक्टूबर 2024 के डी-एस्केलेशन समझौते में इस बात पर पारदर्शिता का अभाव था कि चीन ने अपने सैनिकों को 2020 से पहले की स्थिति में वापस बुला लिया है या नहीं, जिससे भारत की क्षेत्रीय अखंडता को लेकर चिंताएँ बढ़ गई हैं।
  • भिन्न रणनीतिक हित: भारत संबंधों को सामान्य बनाने से पहले यथास्थिति बहाल करने पर बल देता है जबकि चीन सीमा उल्लंघनों का समाधान किए बिना आगे बढ़ने पर जोर देता है।
  • सत्यापन योग्य समझौतों का अभाव: पिछले सीमा समझौतों के अनुपालन को सुनिश्चित करने के लिए कोई स्पष्ट तंत्र नहीं है, जिससे बार-बार उल्लंघन और अविश्वास की स्थिति उत्पन्न होती है। 
    • उदाहरण के लिए: 2020 का गतिरोध 1993 और 1996 के सीमा समझौतों जैसे पिछले समझौतों के बावजूद हुआ, जो कूटनीतिक प्रतिबद्धताओं को नज़रअंदाज़ करने की चीन की प्रवृत्ति को दर्शाता है।
  • भारत की भू-राजनीतिक नीति: भारत, चीन के साथ वार्ता करने को लेकर सतर्क है, जबकि अमेरिका, क्वाड और इंडो-पैसिफिक सहयोगियों के साथ भी अपने संबंधों को मजबूत कर रहा है, जिससे एक  संतुलन बना हुआ है। 
    • उदाहरण के लिए: भारत ने चीन के साथ कूटनीतिक चैनल बनाए रखते हुए बेसिक एक्सचेंज एंड कोऑपरेशन एग्रीमेंट (BECA) के तहत अमेरिका के साथ रक्षा सहयोग बढ़ाया है ।
  • पारदर्शी संचार का अभाव: भारत सरकार के सतर्क बयान और सैन्य वापसी की स्थिति पर सार्वजनिक रूप से चर्चा करने की अनिच्छा, वास्तविक प्रगति के संबंध में अनिश्चितता उत्पन्न करती है। 
    • उदाहरण के लिए: अक्टूबर 2024 के विदेश सचिव की ब्रीफिंग में ” सैनिकों के वापस लौटने की प्रक्रिया” का उल्लेख किया गया था, लेकिन प्रमुख संघर्ष स्थलों से चीनी सैनिकों की पूरी तरह वापसी की पुष्टि नहीं की गई थी ।

भारत के साथ संबंधों को सामान्य बनाने के चीन के हालिया प्रयास को प्रभावित करने वाले भू-राजनीतिक कारक

  • ट्रम्प का  चुनाव जीतना और अमेरिका-चीन तनाव: नवंबर 2024 में अमेरिकी राष्ट्रपति के रूप में डोनाल्ड ट्रम्प की वापसी के साथ, चीन को नए सिरे से अमेरिकी दबाव का सामना करना पड़ रहा है, जिससे भारत के साथ संबंधों को स्थिर करने के लिए रणनीतिक बदलाव हो रहा है। 
    • उदाहरण के लिए: वर्ष 2025 का भारत-चीन समझौता ट्रम्प की चुनावी जीत के तुरंत बाद हुआ, जो वर्ष 1989 में तियानमेन स्क्वायर की घटना के बाद चीन के पिछले सामान्यीकरण प्रयासों को दर्शाता है ।
  • चीन में आर्थिक मंदी: चीन की धीमी होती अर्थव्यवस्था और घटते वैश्विक व्यापार के कारण उसके आर्थिक हितों को बनाए रखने के लिए भारत सहित क्षेत्रीय संबंधों को स्थिर करना आवश्यक हो गया है। 
    • उदाहरण के लिए: चीन की वर्ष 2024 की GDP वृद्धि दर धीमी होकर 4.5% हो गई, जिससे उसके नेतृत्व को व्यापार और निवेश के लिए भारत के बड़े उपभोक्ता बाजार के साथ आर्थिक सहयोग करने के लिए प्रेरित होना पड़ा।
  • आंतरिक मुद्दों से रणनीतिक ध्यान हटाना: युवा बेरोजगारी और रियल एस्टेट संकटों पर असंतोष सहित बढ़ते घरेलू असंतोष के साथ, चीन बाहरी कूटनीतिक जीत चाहता है।
  • भारत के बढ़ते वैश्विक प्रभाव का मुकाबला करना: BRICS, G-20 और QUAD में भारत की बढ़ती भूमिका, चीन के प्रभुत्व के लिए खतरा है, जिसके कारण बीजिंग भारत को पश्चिम देशों के साथ पूरी तरह से जुड़ने से रोक रहा है। 
    • उदाहरण के लिए: चीन ने भारत की वर्ष 2023 G-20 अध्यक्षता का समर्थन किया, लेकिन QUAD में भारत की भागीदारी का विरोध किया, जो भारत के वैश्विक रुख को आकार देने के उसके प्रयासों को दर्शाता है।
  • क्षेत्रीय स्थिरता पर चिंता: रूस-यूक्रेन और इजरायल-फिलिस्तीन जैसे चल रहे संघर्षों ने वैश्विक अस्थिरता को बढ़ा दिया है, जिससे चीन भारत के साथ एक और संभावित संघर्ष को लेकर चिंतित है। 
    • उदाहरण के लिए: चीन अपने ताइवान रुख को लेकर पश्चिमी देशों के विरोध का सामना कर रहा है और भारत के साथ तनाव कम करके दो मोर्चों पर कूटनीतिक संकट को रोकना चाहता है।

भारत के साथ संबंधों को सामान्य बनाने के चीन के हालिया प्रयास को प्रभावित करने वाले आर्थिक कारक

  • निर्यात वृद्धि में गिरावट: कमजोर वैश्विक माँग और व्यापार प्रतिबंधों के कारण, चीन की निर्यात-संचालित अर्थव्यवस्था को  नुक्सान का सामना करना पड़ा है, जिससे भारत एक संभावित वैकल्पिक बाजार बन गया है। 
    • उदाहरण के लिए: वर्ष 2023 में , चीन के निर्यात में 4.6% की गिरावट आई, जबकि भारत की अर्थव्यवस्था 7.6% की दर से बढ़ी जिससे यह चीनी उद्योगों के लिए एक आकर्षक व्यापार भागीदार बन गया।
  • विनिर्माण मंदी और आपूर्ति श्रृंखला जोखिम: चीन की जीरो-COVID नीति के प्रभाव, पश्चिमी आपूर्ति श्रृंखला विविधीकरण के साथ मिलकर, विदेशी निवेश को कम कर रहे हैं जिससे चीन को स्थिर व्यापार भागीदारों की तलाश करने के लिए मजबूर होना पड़ा है। 
    • उदाहरण के लिए: एप्पल और सैमसंग ने उत्पादन-लिंक्ड प्रोत्साहन (PLI) योजना के तहत भारत में विनिर्माण को स्थानांतरित कर दिया है, जिससे इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादन में चीन का प्रभुत्व कम हो गया है।
  • रियल एस्टेट और ऋण संकट: एवरग्रांडे के पतन के कारण चीन के संपत्ति क्षेत्र के संकट ने निवेशकों में अनिश्चितता उत्पन्न कर दी है, जिससे बीजिंग को क्षेत्रीय सहयोग के माध्यम से आर्थिक विश्वास का पुनर्निर्माण करने के लिए मजबूर होना पड़ा है। 
  • उदाहरण के लिए: वर्ष 2024 में एवरग्रांडे के लिक्विडेशन ने चीन की वित्तीय अस्थिरता को और खराब कर दिया, जिससे भारत सहित स्थिर व्यापार संबंधों की तत्काल आवश्यकता हो गई।
  • अमेरिका-चीन व्यापार युद्ध और टैरिफ: चीनी वस्तुओं पर बढ़ते अमेरिकी टैरिफ ने पश्चिमी बाजारों तक चीन की पहुंच सीमित कर दी है, जिससे क्षेत्रीय व्यापार साझेदारी की ओर झुकाव बढ़ा है। 
    • उदाहरण के लिए: अमेरिका ने चीनी तकनीकी निर्यात पर 25% टैरिफ लगाया, जिससे चीन को भारतीय स्टार्टअप और उपभोक्ता बाजारों में निवेश बढ़ाने के लिए प्रेरित किया।
  • भारत का आर्थिक उत्थान और बाजार की संभावना: भारत का बढ़ता मध्यम वर्ग और डिजिटल अर्थव्यवस्था, चीन को एक विशाल उपभोक्ता आधार प्रदान करती है, जिससे सामान्य संबंध आर्थिक रूप से लाभकारी होते हैं। 
    • उदाहरण के लिए: Xiaomi और Vivo जैसी चीनी कंपनियाँ भारत के स्मार्टफोन बाज़ार पर हावी हैं, जो भू-राजनीतिक तनावों के बावजूद भारतीय उपभोक्ताओं पर चीन की निर्भरता को उजागर करती है।

कूटनीति और व्यावहारिकता के माध्यम से दोनों देशों के संबंध को संतुलित करने हेतु  दीर्घकालिक क्षेत्रीय स्थिरता अति आवश्यक है। भारत को आर्थिक प्रत्यास्थता, रणनीतिक गठबंधन और सैन्य तैयारियों का लाभ उठाते हुए, क्षेत्रीय अखंडता सुनिश्चित करते हुए, एक संतुलित जुड़ाव का प्रयास करना चाहिए। बहुपक्षीय मंचों द्वारा सुदृढ़ एक नियम-आधारित व्यवस्था, विश्वास-निर्माण तंत्र को बढ़ावा दे सकती है। भविष्य के संबंध आपसी आर्थिक हितों और रणनीतिक दूरदर्शिता पर निर्भर करते हैं, जो एक संतुलित, सहयोगी एशिया को आकार देते हैं।

The restoration of India-China bilateral relations post-Galwan clashes (2020) remains a complex process. Examine the geopolitical and economic factors influencing China’s recent push to normalize relations with India, particularly in the context of global developments. in hindi

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