Q. मध्य-शक्ति मध्यस्थता का उदय पश्चिमी प्रभुत्व से अधिक बहुलवादी वैश्विक व्यवस्था की ओर परिवर्तन का प्रतीक है। एक राजनयिक संतुलनकर्ता और संघर्ष मध्यस्थ के रूप में भारत की बढ़ती भूमिका के संदर्भ में इस कथन का विश्लेषण कीजिए। (10 अंक, 150 शब्द)

October 22, 2025

GS Paper IIInternational Relations

प्रश्न की मुख्य माँग

  • कूटनीति और संघर्ष मध्यस्थ के बीच संतुलन बनाने में एक मध्यम शक्ति देश के रूप में भारत की भूमिका।
  • कूटनीतिक संतुलन और संघर्ष मध्यस्थता में भारत के समक्ष आने वाली चुनौतियाँ

उत्तर

जैसे-जैसे पश्चिमी प्रभुत्व कम हो रहा है, भारत जैसे मध्यम शक्ति वाले राष्ट्र व्यवहारिक कूटनीति और क्षेत्रीय विश्वसनीयता के माध्यम से बहुध्रुवीय वैश्विक व्यवस्था को आकार दे रहे हैं। भारत की गुटनिरपेक्षता और संतुलित विदेश नीति की परंपरा उसे एक स्थिरता प्रदाता शक्ति बनाती है।
इसकी बढ़ती मध्यस्थता की भूमिका वैश्विक मामलों में भारत की रणनीतिक स्वायत्तता और नैतिक नेतृत्व दोनों को दर्शाती है।

कूटनीति और संघर्ष मध्यस्थता में संतुलन साधने वाली मध्यम शक्ति के रूप में भारत की भूमिका

कूटनीतिक संतुलन 

  • रणनीतिक स्वायत्तता:  भारत प्रतिद्वंद्वी शक्तियों जैसे अमेरिका, रूस, और ईरान के साथ स्वतंत्र संबंध बनाए रखता है, जिससे वह ध्रुवीकृत वैश्विक व्यवस्था में लचीलापन बनाए रख सके।
    • उदाहरण: रूस- यूक्रेन संघर्ष पर भारत का तटस्थ रुख, जबकि अमेरिका और रूस दोनों के साथ संबंधों को सुदृढ़ करना।
  • वैश्विक उत्तर और दक्षिण के बीच सेतु: भारत स्वयं को ग्लोबल साउथ के प्रतिनिधित्व के रूप में प्रस्तुत करता है और वैश्विक शासन संरचनाओं में न्यायपूर्ण सुधारों की वकालत करता है।
    • उदाहरण: वर्ष 2023 के G20 शिखर सम्मेलन की मेजबानी, जिसमें ऋण राहत और समावेशी विकास पर बल दिया गया।
  • क्षेत्रीय स्थिरता को प्रोत्साहित करना: भारत BIMSTEC और IORA जैसी पहलों के माध्यम से क्षेत्रीय सहयोग को बढ़ावा देता है, बिना प्रभुत्व जमाए संतुलित कूटनीति का प्रदर्शन करता है।
    • उदाहरण: हिंद महासागर क्षेत्रीय देशों के साथ भारत की सक्रिय साझेदारी, ताकि चीन के समुद्री प्रभाव को संतुलित किया जा सके।

संघर्ष मध्यस्थता

  • ऐतिहासिक शांति स्थापना भूमिका: भारत ने एशिया में विभिन्न संघर्षों में संवाद और संयुक्त राष्ट्र सिद्धांतों के आधार पर मध्यस्थता की है।
    • उदाहरण: कोरियाई युद्ध के दौरान मध्यस्थता प्रयास और अफ्रीका तथा पश्चिम एशिया में शांति स्थापना मिशन।
  • उपमहाद्वीपीय जुड़ाव: भारत अपने पड़ोसी देशों में राजनीतिक सुलह को प्राथमिकता देता है, हस्तक्षेप की बजाय संवाद को बढ़ावा देता है।
    • उदाहरण: श्रीलंका (वर्ष 1987) में भारत के शांति प्रयास और नेपाल व मालदीव में लोकतांत्रिक पुनर्स्थापना के लिए समर्थन।
  • घरेलू संघर्ष समाधान से प्राप्त विश्वसनीयता: भारत का पूर्व उग्रवादी समूहों के एकीकरण में अनुभव शांति निर्माण के लिए एक व्यवहारिक उदाहरण प्रस्तुत करता है।
    • उदाहरण: मिजोरम और असम में हुए शांति समझौते, जिन्होंने उग्रवादियों को मुख्यधारा की राजनीति में लाया।

भारत की कूटनीतिक संतुलन और मध्यस्थता में चुनौतियाँ 

  • पक्षपात की धारणा: अमेरिका और इजराइल जैसे कुछ देशों के साथ भारत के घनिष्ठ संबंध, कुछ संघर्षों में विपरीत पक्षों का भरोसा घटा सकते हैं।
  • बाहरी संघर्षों में सीमित प्रभाव: सैन्य या सुरक्षा गारंटी की कमी भारत की अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता क्षमता को सीमित करती है।
  • क्षेत्रीय अस्थिरता: पाकिस्तान और चीन के साथ लगातार सीमा तनाव भारत की तटस्थ शांति भूमिका को प्रभावित करते हैं।
  • संस्थागत सीमाएँ: समर्पित कूटनीतिक तंत्र और अनुसंधान क्षमता की कमी के कारण दीर्घकालिक मध्यस्थता पहलें कमजोर पड़ती हैं।
  • भूराजनीतिक प्रतिस्पर्द्धा: चीन और तुर्किए जैसे अन्य मध्यम शक्तियों की प्रतिस्पर्द्धी महत्वाकांक्षाएँ एशिया और अफ्रीका में भारत की कूटनीतिक भूमिका को चुनौती देती हैं।

निष्कर्ष

भारत की मध्यस्थता की प्रभावशीलता इस बात पर निर्भर करती है कि वह अपनी संस्थागत क्षमता, क्षेत्रीय सहभागिता, और रणनीतिक तटस्थता को कैसे सशक्त बनाता है।
नैतिक अधिकार और व्यवहारिक कूटनीति को एकसाथ मिलाकर भारत एक सहयोगी, बहुध्रुवीय वैश्विक व्यवस्था को आकार दे सकता है, जो शांति और समावेशिता पर आधारित हो।

The rise of middle-power mediation marks a shift from Western dominance to a more pluralistic global order. Analyse this statement in the context of India’s growing role as a diplomatic balancer and conflict mediator. in hindi

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