Q. यातायात जुर्माने को अक्सर निवारक हस्तक्षेप के बजाय केवल दंडात्मक उपायों के रूप में देखा जाता है। मोटर वाहन (संशोधन) अधिनियम, 2019 के आलोक में इस कथन का परीक्षण कीजिए। भारत में सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली मौतों को कम करने के लिए व्यापक उपाय सुझाएँ। (15 अंक, 250 शब्द)

प्रश्न की मुख्य माँग

  • मोटर वाहन (संशोधन) अधिनियम, 2019 के दंडात्मक प्रावधानों का उल्लेख कीजिए।
  • निवारक भूमिका को स्पष्ट कीजिए।
  • भारत में सड़क दुर्घटनाओं को कम करने के लिए समग्र उपाय सुझाइए।

उत्तर

भारत में यातायात जुर्मानों को अक्सर केवल दंडात्मक दृष्टि से देखा जाता है। हालाँकि, मोटर वाहन (संशोधन) अधिनियम, 2019 के तहत ये जुर्माने एक व्यापक निवारक भूमिका भी निभाते हैं। असुरक्षित व्यवहार को हतोत्साहित करके, ये सड़क दुर्घटनाओं और मृत्यु दर को कम करने में महत्त्वपूर्ण योगदान देते हैं।

मोटर वाहन (संशोधन) अधिनियम, 2019 के दंडात्मक प्रावधान

  • उच्च दंड: यातायात उल्लंघनों पर जुर्मानों में उल्लेखनीय वृद्धि की गई है।
    • उदाहरण: ओवरस्पीडिंग और नशे में ड्राइविंग जैसे अपराधों पर बढ़े हुए जुर्माने।
  • लाइसेंस निलंबन: गंभीर उल्लंघनों पर चालक को अयोग्य घोषित किया जा सकता है।
    • उदाहरण: खतरनाक ड्राइविंग या बार-बार उल्लंघन करने पर लाइसेंस निलंबन।
  • नशे में ड्राइविंग के नियम: शराब से संबंधित दुर्घटनाओं को रोकने के लिए कड़े दंड का प्रावधान।
    • उदाहरण: भारी जुर्माना और कारावास की व्यवस्था।
  • हेलमेट/सीट बेल्ट नियम: सुरक्षा मानकों के पालन को दंड के माध्यम से अनिवार्य किया गया है।
  • किशोर उत्तरदायित्व: नाबालिगों द्वारा किए गए अपराधों के लिए अभिभावकों को जिम्मेदार ठहराया जाता है।
    • उदाहरण: जुर्माना और वाहन पंजीकरण रद्द करने का प्रावधान (MV एक्ट, 2019)।

निवारक भूमिका 

  • व्यावहारिक निरोध: जुर्माने जोखिमपूर्ण ड्राइविंग के विरुद्ध मनोवैज्ञानिक रोक का कार्य करते हैं।
    • उदाहरण: जुर्माना भरने के बाद चालक असुरक्षित व्यवहार से बचने का प्रयास करते हैं।
  • जोखिम जागरूकता: उल्लंघन संभावित जानलेवा परिणामों के प्रति चेतावनी देते हैं।
    • उदाहरण: तेज गति और नशे में ड्राइविंग को घातक दुर्घटनाओं से जोड़ा जाता है।
  • व्यवहार निर्माण: नियमित प्रवर्तन से सुरक्षित ड्राइविंग की आदत विकसित होती है।
    • उदाहरण: समय के साथ हेलमेट और सीट बेल्ट के उपयोग में वृद्धि।
  • दुर्घटना में कमी: निरोधात्मक प्रभाव से दुर्घटनाओं की संख्या कम होती है।
    • उदाहरण: प्रतिवर्ष लगभग 1.7 लाख मौतें (सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय) प्रभावी प्रवर्तन की आवश्यकता को दर्शाती हैं।
  • कमजोर वर्गों की सुरक्षा: पैदल यात्रियों और दोपहिया चालकों के प्रति सुरक्षित व्यवहार को बढ़ावा मिलता है।
    • उदाहरण: बंगलूरू में लगभग 60% पीड़ित मोटरसाइकिल चालक और 30% पैदल यात्री हैं।

भारत में सड़क दुर्घटनाओं को कम करने के लिए समग्र उपाय

  • कड़ा प्रवर्तन: यातायात नियमों का सख्ती और निरंतरता के साथ पालन सुनिश्चित किया जाए।
    • उदाहरण: ई-चालान और स्वचालित निगरानी प्रणाली का उपयोग।
  • सड़क अभियांत्रिकी: सड़क डिजाइन में सुधार और दुर्घटना-प्रवण स्थलों (ब्लैक स्पॉट्स) को समाप्त करना।
    • उदाहरण: सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय का ब्लैक स्पॉट पहचान कार्यक्रम।
  • जन जागरूकता: विभिन्न जागरूकता अभियानों और शिक्षा के माध्यम से व्यवहार में परिवर्तन लाना।
    • उदाहरण: तेज गति और हेलमेट उपयोग पर केंद्रित सड़क सुरक्षा अभियान।
  • आपातकालीन देखभाल: ट्रॉमा केयर और त्वरित प्रतिक्रिया प्रणाली को सुदृढ़ करना।
    • उदाहरण: दुर्घटना पीड़ितों के लिए गोल्डन ऑवर योजना।
  • डेटा-आधारित नीति: लक्षित हस्तक्षेपों के लिए दुर्घटना डेटा का उपयोग।
    • उदाहरण: सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय की वार्षिक सड़क दुर्घटना रिपोर्ट के आधार पर नीति निर्माण।

निष्कर्ष

यातायात जुर्मानों को केवल दंडात्मक साधन के रूप में नहीं, बल्कि व्यवहार परिवर्तन के उपकरण के रूप में विकसित किया जाना चाहिए, जो एक व्यापक सड़क सुरक्षा तंत्र का हिस्सा हों। प्रौद्योगिकी, डेटा-आधारित प्रवर्तन और सुरक्षित अवसंरचना के समन्वित उपयोग से भारत सड़क दुर्घटनाओं में कमी और सुरक्षित गतिशीलता की दिशा में आगे बढ़ सकता है।

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