Q. 'वाशिंगटन सहमति' से 'व्यावहारिक समन्वयवाद' की ओर संक्रमण वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में एक मौलिक बदलाव को दर्शाता है, जो मुक्त बाजार निरंकुशता की विफलताओं और भू-राजनीतिक संरक्षणवाद के उदय से प्रेरित है। भारत जैसी विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में राज्य की बदलती भूमिका के संदर्भ में इस कथन का मूल्यांकन कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)

March 14, 2026

GS Paper IIIndian EconomyInternational Relations

प्रश्न की मुख्य माँग

  • वॉशिंगटन सहमति से व्यावहारिक मिश्रित दृष्टिकोण तक: वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में परिवर्तन का उल्लेख कीजिए।
  • भारत जैसे विकासशील देशों में राज्य की बदलती भूमिका की चर्चा कीजिए।
  • आगे की राह सुझाइए।

उत्तर

वॉशिंगटन सहमति शब्द का प्रयोग वर्ष 1989 में जॉन विलियमसन द्वारा किया गया था, जिसमें उदारीकरण, निजीकरण और विनियमन-उन्मूलन पर बल दिया गया। हालाँकि, वैश्विक आर्थिक संकटों, बढ़ती असमानता और भू-राजनीतिक विखंडन के कारण अब एक अधिक व्यावहारिक और मिश्रित नीति दृष्टिकोण की ओर झुकाव देखा जा रहा है, जिसने भारत जैसे देशों में विकास प्रक्रिया में राज्य की भूमिका को पुनर्परिभाषित किया है।

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वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में परिवर्तन: वॉशिंगटन सहमति से व्यावहारिक मिश्रित दृष्टिकोण तक

  • मुक्त-बाजार नीतियों के प्रभाव में गिरावट: एक समान रूप से लागू की गई राजकोषीय कठोरता, विनियमन-उन्मूलन और निजीकरण जैसी नीतियाँ विकासशील देशों की विविध सामाजिक और संस्थागत परिस्थितियों के अनुरूप नहीं रही हैं।
    • उदाहरण: अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं के संरचनात्मक समायोजन कार्यक्रम।
  • वित्तीय संकटों से प्राप्त सीख: इन संकटों ने अनियंत्रित पूँजी प्रवाह और अत्यधिक उदारीकरण की कमजोरियों को उजागर किया।
    • उदाहरण: वर्ष 1997 का एशियाई वित्तीय संकट।
  • रणनीतिक औद्योगिक नीति का उदय: अब सरकारें केवल बाजार पर निर्भर न रहकर घरेलू उद्योगों और तकनीकी क्षमता को बढ़ावा दे रही हैं।
    • उदाहरण: महामारी के बाद आपूर्ति शृंखला व्यवधानों के संदर्भ में विभिन्न देशों की औद्योगिक नीतियाँ।
  • भू-राजनीतिक संरक्षणवाद: वैश्विक प्रतिस्पर्द्धा के कारण देश चयनात्मक संरक्षणवाद और घरेलू उत्पादन को प्रोत्साहित कर रहे हैं।
    • उदाहरण: निर्यात प्रतिबंध, उत्पादन का पुनर्स्थापन और प्रौद्योगिकी नियंत्रण।
  • व्यावहारिक नीति बहुलता: अब एक ऐसा दृष्टिकोण उभर रहा है, जिसमें बाजार, राज्य हस्तक्षेप और सामाजिक सुरक्षा उपायों का संतुलित संयोजन किया जा रहा है।
    • उदाहरण: वैश्विक आर्थिक मंचों में चर्चा किए जाने वाले मिश्रित नीति ढाँचे।

विकासशील अर्थव्यवस्थाओं (जैसे- भारत) में राज्य की बदलती भूमिका

  • रणनीतिक औद्योगिक प्रोत्साहन: राज्य अब घरेलू विनिर्माण और तकनीकी क्षमता को बढ़ावा देकर आयात पर निर्भरता कम करने की दिशा में सक्रिय भूमिका निभा रहा है।
    • उदाहरण: उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजना, जो इलेक्ट्रॉनिक्स और अर्द्धचालक क्षेत्रों में विनिर्माण को बढ़ावा देती है।
  • अवसंरचना-आधारित आर्थिक विकास: सार्वजनिक निवेश के माध्यम से सरकार आर्थिक विकास को गति देने और निजी निवेश को आकर्षित करने का कार्य कर रही है, बजाय केवल बाजार शक्तियों पर निर्भर रहने के।
    • उदाहरण: प्रधानमंत्री गति शक्ति राष्ट्रीय मास्टर प्लान के अंतर्गत अवसंरचना का विस्तार।
  • कल्याण और सामाजिक सुरक्षा: राज्य की भूमिका आय असमानता को कम करने और कमजोर वर्गों की सुरक्षा सुनिश्चित करने में अधिक महत्त्वपूर्ण हो गई है।
    • उदाहरण: आयुष्मान भारत योजना, जो कमजोर परिवारों को स्वास्थ्य बीमा प्रदान करती है।
  • डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना: सरकारें ऐसे डिजिटल मंच विकसित कर रही हैं, जो समावेशी बाजार और कुशल सेवा वितरण को संभव बनाते हैं।
    • उदाहरण: आधार आधारित डिजिटल तंत्र, जो प्रत्यक्ष लाभ अंतरण को सक्षम बनाता है।
  • व्यापार और आर्थिक सुदृढ़ता: अब नीतियाँ उदारीकरण और संतुलित संरक्षण दोनों का संयोजन अपनाती हैं, ताकि महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों में घरेलू क्षमता को मजबूत किया जा सके।
    • उदाहरण: मेक इन इंडिया पहल, जो घरेलू उत्पादन को प्रोत्साहित करती है और आयात निर्भरता कम करने का प्रयास करती है।

आगे की राह

  • संतुलित राज्य–बाजार साझेदारी: बाजार की दक्षता के साथ राज्य के रणनीतिक समर्थन (अवसंरचना, प्रौद्योगिकी और मानव पूँजी) का समन्वय आवश्यक है।
  • परिस्थिति-विशिष्ट नीतियाँ: नीतियों का निर्माण घरेलू संस्थागत क्षमता और विकासात्मक प्राथमिकताओं के अनुसार होना चाहिए, न कि सार्वभौमिक मॉडल के आधार पर।
  • मजबूत नियामक क्षमता: राज्य की विकासात्मक भूमिका को प्रभावी बनाने के लिए पारदर्शी विनियमन और सुशासन सुनिश्चित करना आवश्यक है।
  • समावेशी और सतत् विकास: औद्योगिक विस्तार के साथ कल्याण, रोजगार सृजन और जलवायु संतुलन को एकीकृत करना होगा।
  • बहुध्रुवीय विश्व में वैश्विक सहयोग: उभरते वैश्विक आर्थिक नियमों को आकार देने के लिए G-20 जैसे मंचों के माध्यम से सक्रिय भूमिका निभानी होगी।

निष्कर्ष

वॉशिंगटन सहमति का पतन वैश्विक आर्थिक शासन में एक व्यापक परिवर्तन को दर्शाता है, जो अब अधिक व्यावहारिक और संदर्भ-आधारित दृष्टिकोण की ओर अग्रसर है। भारत जैसे देशों के लिए यह परिवर्तन राज्य की विकासात्मक भूमिका को सशक्त करता है, जहाँ बाजार तंत्र के साथ रणनीतिक हस्तक्षेप का संतुलन स्थापित करते हुए लचीलापन, समानता और दीर्घकालिक आर्थिक संप्रभुता सुनिश्चित की जा सकती है।

The transition from the ‘Washington Consensus’ to ‘Pragmatic Eclecticism’ reflects a fundamental shift in the global economic order, driven by the failures of free-market absolutism and the rise of geopolitical protectionism. Evaluate this statement in the context of the changing role of the state in developing economies like India. in hindi

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