प्रश्न की मुख्य माँग
- अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स (UPFs) तथा भ्रामक विज्ञापनों से उत्पन्न सार्वजनिक स्वास्थ्य जोखिम
- खाद्य उद्योग की स्व-नियमन व्यवस्था की सीमाएँ
- कानूनी रूप से बाध्यकारी नियमों एवं प्रभावी नीति उपायों की आवश्यकता
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उत्तर
परिचय
अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स (Ultra-Processed Foods – UPFs) का तीव्र प्रसार, जिन्हें टेलीविजन, सोशल मीडिया तथा इंफ्लुएंसर विज्ञापनों के माध्यम से व्यापक रूप से प्रचारित किया जाता है, भारत में मोटापा, मधुमेह तथा गैर-संचारी रोगों में वृद्धि के साथ जुड़ा हुआ है। यद्यपि सरकार द्वारा राष्ट्रीय बहु-क्षेत्रीय कार्य योजना, 2017–2022 जैसी पहलें की गई हैं, तथापि खाद्य कंपनियों द्वारा स्व-नियमन पर्याप्त सिद्ध नहीं हुआ है। सर्वोच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 21 के अंतर्गत स्वास्थ्य के अधिकार (Right to Health) को सुदृढ़ करते हुए ‘फ्रंट-ऑफ-पैक लेबलिंग’ तथा विज्ञापन मानकों को और कठोर बनाने की आवश्यकता पर बल दिया है।
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सार्वजनिक स्वास्थ्य जोखिम और विज्ञापन संबंधी चुनौतियाँ
- भ्रामक विपणन: अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स (UPFs) में “बेक्ड”, “मल्टी-ग्रेन” जैसे आकर्षक दावे किए जाते हैं, जबकि उनमें उच्च मात्रा में चीनी, नमक या वसा की वास्तविक सामग्री छिपाई जाती है।
- उदाहरण: वर्ष 2026 के एक यूट्यूब विज्ञापन में बेक्ड चिप्स के प्रचार के दौरान माल्टोडेक्सट्रिन और इमल्सिफायर्स जैसे प्रमुख तत्वों को छिपाया गया।
- बाल केंद्रित विज्ञापन प्रभाव: टीवी, सोशल मीडिया और इंफ्लुएंसर अभियानों के माध्यम से बच्चों एवं किशोरों में इन उत्पादों की खपत बढ़ रही है।
- उदाहरण: भारत में वर्ष 2025–26 में जंक फूड विज्ञापनों पर लगभग ₹170 करोड़ खर्च किए जाने की रिपोर्ट दर्ज की गई।
- स्वास्थ्य पर प्रभाव: अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स (UPFs) का सेवन मोटापा, उच्च रक्तचाप, टाइप-2 डायबिटीज तथा हृदय रोगों से संबंधित है।
- उदाहरण: द लैंसेट सीरीज ऑन अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स (UPFs) (2025) में औद्योगिक रूप से प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों द्वारा स्वस्थ आहार के प्रतिस्थापन के साक्ष्य प्रस्तुत किए गए हैं।
स्व-नियमन की सीमाएँ
- स्वैच्छिक आचार संहिता: स्व-नियमन अक्सर प्रभावी नहीं होता क्योंकि इसमें प्रवर्तन और पारदर्शिता की कमी होती है।
- उदाहरण: FSSAI द्वारा खाद्य लेबलों पर “100% शुद्ध ” या “100% प्राकृतिक” जैसे दावों पर व्यापक प्रतिबंध लगाया गया, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि कंपनियाँ उपभोक्ताओं को आकर्षित करने हेतु “हेल्थ-वॉशिंग (health-washing)” जैसे भ्रामक दावों का प्रयोग करती थीं, जब तक कि उन्हें कानूनी रूप से रोका नहीं गया।
- भ्रामक प्रचार और सेलिब्रिटी समर्थन: स्व-नियमन प्रणाली सेलिब्रिटी विज्ञापनों या इन्फ्लुएंसर्स द्वारा किए जाने वाले भ्रामक प्रचार को प्रभावी रूप से नियंत्रित नहीं कर पाती, विशेषकर जब ये कमजोर और संवेदनशील वर्गों को लक्षित करते हैं।
सशक्त नियामक ढाँचे की आवश्यकता
- कानूनी रूप से बाध्यकारी विज्ञापन प्रतिबंध: बच्चों को लक्षित करने वाले विज्ञापनों पर प्रतिबंध या सख्त सीमाएँ लागू की जानी चाहिए तथा पोषण संबंधी जोखिमों का अनिवार्य प्रकटीकरण सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
- उदाहरण: 2024–26 के दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने उपभोक्ताओं को सूचित विकल्प उपलब्ध कराने हेतु फ्रंट-ऑफ-पैक लेबलिंग की आवश्यकता पर बल दिया।
- समेकित नीतिगत दृष्टिकोण: विनियमन को जन-जागरूकता, स्कूल-आधारित हस्तक्षेपों तथा हाई फैट, शुगर एंड सॉल्ट (HFSS) पर कराधान जैसे राजकोषीय उपायों के साथ जोड़ा जाना चाहिए।
- उदाहरण: चिली और मेक्सिको ने स्वैच्छिक आचार संहिता की तुलना में बाध्यकारी नियमों के माध्यम से अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स (UPF) उपभोग में प्रभावी कमी प्रदर्शित की है।
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निष्कर्ष
स्वास्थ्य का अधिकार (Right to Health) केवल स्व-नियमन तक सीमित नहीं रह सकता, बल्कि इसके लिए सक्रिय राज्य हस्तक्षेप आवश्यक है। अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स (UPFs) से उत्पन्न स्वास्थ्य जोखिमों को नियंत्रित करने हेतु सशक्त कानूनी ढाँचा, फ्रंट-ऑफ-पैक लेबलिंग, विज्ञापन प्रतिबंध तथा राजकोषीय एवं शैक्षिक उपाय अनिवार्य हैं। ये कदम बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के साथ-साथ भारत में सुरक्षित, जागरूक और संधारणीय खाद्य उपभोग संस्कृति को बढ़ावा देंगे।