प्रश्न की मुख्य माँग
- संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में स्थायी सदस्यता हेतु भारत की योग्यताएँ एवं योगदान।
- UNSC सुधार से संबंधित संरचनात्मक एवं प्रक्रियात्मक चुनौतियाँ।
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उत्तर
परिचय
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में स्थायी सदस्यता हेतु भारत का दावा उसके जनसंख्या-आधारित महत्त्व, आर्थिक शक्ति, सैन्य क्षमता तथा मानकात्मक योगदान पर आधारित है। लगभग 1.4 अरब जनसंख्या (विश्व की लगभग एक-छठा भाग), 2026 तक $20 ट्रिलियन (PPP) से अधिक अनुमानित GDP तथा संयुक्त राष्ट्र शांति स्थापना अभियानों में सबसे बड़े योगदानकर्ताओं में से एक होने के कारण भारत वैश्विक शांति एवं सुरक्षा में उत्तरदायित्व एवं क्षमता दोनों का प्रतिनिधित्व करता है।
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स्थायी सदस्यता हेतु भारत का पक्ष
- जनसांख्यिकीय एवं आर्थिक महत्त्व: भारत विश्व की एक बड़ी जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करता है तथा व्यापार, प्रौद्योगिकी एवं ऊर्जा बाजारों में प्रभाव डालने वाला एक प्रमुख आर्थिक शक्ति केंद्र है।
- उदाहरण: अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन में नेतृत्व तथा G20 अध्यक्षता के दौरान भारत की भूमिका वैश्विक सहभागिता को दर्शाती है।
- सैन्य एवं रणनीतिक योगदान: भारत के पास एक विश्वसनीय न्यूक्लियर ट्रायड (Nuclear Triad) है, सशक्त सशस्त्र बल हैं, तथा वर्ष 1948 से ही संयुक्त राष्ट्र शांति अभियानों में सक्रिय भागीदारी रही है।
- उदाहरण: शांति स्थापना अभियानों में भारतीय सैनिकों की उच्च संख्या में वीरगति भारत की प्रतिबद्धता को दर्शाती है।
- मानकात्मक नेतृत्व एवं वैश्विक शासन में भूमिका: भारत बहुपक्षीयता, समुद्री सुरक्षा तथा सतत् विकास का समर्थक है।
- उदाहरण: हिंद महासागर क्षेत्र में सुरक्षा सहयोग एवं UNCLOS मानकों के पालन में सक्रिय भूमिका।
UNSC सुधारों के समक्ष संरचनात्मक चुनौतियाँ
- P5 की सीमित सहमति: सुरक्षा परिषद के विस्तार हेतु स्थायी सदस्यों (P5) की सहमति आवश्यक है, जिनमें से कई अपनी शक्ति में कमी के कारण विस्तार के प्रति अनिच्छुक रहते हैं।
- वीटो एवं सर्वसम्मति की समस्या: संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद-108 के अनुसार, किसी भी संरचनात्मक संशोधन हेतु महासभा के दो-तिहाई बहुमत के साथ-साथ सभी पाँच स्थायी सदस्यों की पुष्टि आवश्यक होती है, जिससे P5 को चार्टर सुधार पर वास्तविक पूर्ण वीटो अधिकार प्राप्त हो जाता है।
- उदाहरण: किसी एक सदस्य द्वारा भी प्रस्तावित निर्णय, जैसे प्रतिबंध समिति के निर्णय या अध्यक्षीय वक्तव्य, अवरुद्ध किया जा सकता है।
- समान प्रतिनिधित्व की जटिलता: एशिया, अफ्रीका एवं अन्य क्षेत्रों के बीच संतुलन स्थापित करते हुए परिषद की कार्यकुशलता बनाए रखना एक बड़ी चुनौती है।
- उदाहरण: G4 समूह द्वारा प्रस्तावित छह नए स्थायी सदस्य (एशिया एवं अफ्रीका से दो-दो) का विचार पूर्ण P5 एवं क्षेत्रीय समर्थन के अभाव में अभी तक स्वीकार नहीं हो पाया है।
आगे की राह
- बहुपक्षीय समर्थन: UNSC सुधार के लिए G4 तथा सहयोगी गठबंधनों को मजबूत किया जाए ताकि वैश्विक राजनीतिक समर्थन जुटाया जा सके। “मिनीलेटरल से मल्टीलेटरल (Minilateral-to-Multilateral)” कूटनीतिक रणनीति को सक्रिय किया जाए, जिसमें क्षेत्रीय एवं अंतर-क्षेत्रीय गठजोड़ों का सहयोग शामिल हो।
- उदाहरण: L.69 समूह तथा C-10 (अफ्रीकी संघ की दस सदस्यीय समिति) जैसे समूहों के साथ समन्वय।
- वीटो सुधार: नए स्थायी सदस्यों के लिए वीटो अधिकार को सीमित या सुधारने की वकालत की जाए, ताकि परिषद की कार्यकुशलता बनी रहे।
- सक्रिय कूटनीति: भारत को अपनी शांति स्थापना, जलवायु परिवर्तन एवं विकास संबंधी योगदानों को उजागर करते हुए मानक-आधारित कूटनीति अपनानी चाहिए।
- समावेशिता: क्षेत्रीय एवं समानता संबंधी चिंताओं के समाधान हेतु पारदर्शी एवं समावेशी वार्ता तंत्र को संस्थागत रूप दिया जाए।
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निष्कर्ष
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में भारत की स्थायी सदस्यता एक विश्वसनीय, प्रतिनिधिक एवं प्रभावी वैश्विक शासन प्रणाली के लिए अत्यंत आवश्यक है। संरचनात्मक बाधाओं को दूर करने हेतु गठबंधन निर्माण, प्रक्रियात्मक सुधार तथा भारत के मानकात्मक एवं परिचालन योगदानों को प्रभावी रूप से प्रस्तुत करना आवश्यक है, जिससे बहुध्रुवीय वैश्विक व्यवस्था में वैश्विक शासन की वैधता को सुदृढ़ किया जा सके।