प्रश्न की मुख्य माँग
- दबाव डालने तथा एस्केलेशन (संघर्ष की तीव्रता) के प्रबंधन के उपकरण के रूप में मिसाइलें।
- चीन की मिसाइल श्रेष्ठता के विरुद्ध भारत की तैयारी।
- एक संरचनात्मक सुधार के रूप में यूनिफाइड रॉकेट फोर्स (URF) की आवश्यकता।
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उत्तर
परिचय
पारंपरिक मिसाइल प्रणालियों ने युद्ध को एक संकुचित, तीव्र गति वाले दबाव-आधारित सामरिक परिदृश्य में परिवर्तित कर दिया है, जहाँ सीमित हमले भी पूर्ण युद्ध के बिना राजनीतिक परिणामों को प्रभावित कर सकते हैं। चीन की पश्चिमी थिएटर में मिसाइल-केंद्रित रणनीति ने भारत के साथ एक महत्त्वपूर्ण असंतुलन उत्पन्न किया है, विशेषकर हिमालयी क्षेत्र में।
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दबाव निर्माण के साधन के रूप में चीन की मिसाइल श्रेष्ठता एवं भारत का क्षमता संबंधी अंतराल
- दबावकारी संघर्ष की तीव्रता में वृद्धि हेतु व्यापक तैनाती: चीन ने भारत के सामने 200+ से अधिक पारंपरिक मिसाइल लॉन्चर तैनात किए हैं, जिससे तीव्र हमलों की क्षमता प्राप्त होती है।
- उदाहरण: DF-26 दोहरी क्षमता मिसाइल गहरे रणनीतिक लक्ष्यों को निशाना बनाने में सक्षम है, जिससे परमाणु अस्पष्टता बनी रहती है और एस्केलेशन का जोखिम बढ़ता है।
- स्तरीय लक्ष्यीकरण हेतु विविध मिसाइल पोर्टफोलियो: चीन के पास DF-15B, DF-16, DF-21C जैसी मिसाइलें तथा DF-26 जैसी रणनीतिक मिसाइलें मौजूद हैं।
- उदाहरण: DF-21C प्रारंभिक संघर्ष के घंटों में अरुणाचल प्रदेश स्थित भारतीय अग्रिम ठिकानों को निशाना बना सकती है।
- हाइपरसोनिक लाभ एवं कम प्रतिक्रिया समय: DF-100 एवं हाइपरसोनिक ग्लाइड व्हीकल्स (HGVs) जैसी प्रणालियाँ पहचान से प्रहार के मध्य का समय अत्यंत कम कर देती हैं, जिससे “नो-वॉर्निंग स्ट्राइक” क्षमता विकसित होती है।
- उदाहरण: DF-17 हाइपरसोनिक ग्लाइड क्षमता के माध्यम से पारंपरिक वायु रक्षा परतों को बायपास कर सकती है।
- पीएलए रॉकेट फोर्स का एकीकृत सिद्धांत: पीएलए रॉकेट फोर्स इंटेलिजेंस, सर्विलांस एवं रिकॉनिसेंस (ISR), लक्ष्य निर्धारण और स्ट्राइक समन्वय को एकीकृत कमान संरचना के अंतर्गत संचालित करती है, जिससे त्वरित एवं समन्वित हमला क्षमता सुनिश्चित होती है।
भारत की तैयारी: शक्तियाँ एवं संरचनात्मक सीमाएँ
- विश्वसनीय लेकिन विखंडित मिसाइल इनवेंटरी: भारत के पास मुख्यतः पारंपरिक मिसाइल शस्त्रागार है, जिसमें प्रलय (सेमी-बैलिस्टिक मिसाइल), ब्रह्मोस (सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल) तथा नवीनतम लॉन्ग-रेंज लैंड अटैक क्रूज मिसाइल (LRLACM) शामिल हैं।
- उदाहरण: ब्रह्मोस उच्च सटीकता के साथ लक्ष्यभेदी प्रहार करने में सक्षम है, किंतु इसकी बड़े पैमाने पर एक साथ मिसाइल प्रहार की क्षमता सीमित है।
- रियल-टाइम लक्ष्य निर्धारण एवं ISR एकीकरण की कमजोरी: सैटेलाइट-टू-शूटर लूप (Satellite-to-Shooter Loop) की सीमित क्षमता के कारण त्वरित प्रतिक्रिया और स्ट्राइक क्षमता प्रभावित होती है।
- उदाहरण: गतिशील लक्ष्य निर्धारण में देरी से PLA के मोबाइल ठिकानों पर प्रभावी हमला सीमित हो जाता है।
- भंडार एवं उत्पादन सीमाएँ: मिसाइलों की सीमित संख्या तथा धीमी उत्पादन क्षमता दीर्घकालिक सैन्य अभियानों को संचालित करने की क्षमता को सीमित करती है।
- रॉकेट फोर्स सिद्धांत का अभाव: भारत में मिसाइल संपत्तियाँ अभी भी तीनों सेनाओं (थल सेना, नौसेना एवं वायु सेना) के मध्य विभाजित हैं, जिससे एकीकृत नियंत्रण एवं रणनीतिक समन्वय की कमी बनी रहती है।
यूनिफाइड रॉकेट फोर्स (URF) के गठन का औचित्य
- समय-संवेदी मिसाइल युद्ध हेतु केंद्रीकृत कमान: एकीकृत कमान संरचना के अंतर्गत त्वरित निर्णय-निर्माण सुनिश्चित होता है, जिससे मिसाइल युद्ध में प्रतिक्रिया समय कम किया जा सकता है।
- रणनीतिक, परिचालन एवं सामरिक लक्ष्यीकरण का एकीकरण: URF एक साथ PLA की तिब्बत/शिनजियांग स्थित अवसंरचना एवं युद्धक्षेत्रीय संपत्तियों को निशाना बनाने की क्षमता प्रदान करता है।
- उदाहरण: कोरला–कुनमिंग कॉरिडोर पर प्रहार करने की क्षमता, जिससे पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) की लॉजिस्टिक्स व्यवस्था प्रभावित हो सकती है।
- पारस्परिक असुरक्षा के माध्यम से बेहतर प्रतिरोध: यह संरचना चीन के लिए विश्वसनीय प्रतिशोध सुनिश्चित करती है, जिससे वह परमाणु सीमा से नीचे दबाव नहीं बना पाता है।
- उदाहरण: पश्चिमी थिएटर कमांड की संपत्तियों पर काउंटर-वैल्यू स्ट्राइक क्षमता।
- सैद्धांतिक स्पष्टता एवं पूर्व-निर्धारित अधिकार: उच्च गति वाले मिसाइल संघर्षों में निर्णय प्रक्रिया की देरी को कम करने हेतु स्पष्ट सिद्धांत एवं पूर्व-प्राधिकृत अधिकार आवश्यक हैं।
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निष्कर्ष
चीन की मिसाइल श्रेष्ठता ने दबाव-आधारित रणनीति को शांतिकाल–युद्धकाल की निरंतरता वाली चुनौती के रूप में पुनर्परिभाषित कर दिया है। भारत के लिए इस असमानता को कम करने हेतु क्षमता एकीकरण तथा यूनिफाइड रॉकेट फोर्स (URF) के माध्यम से संरचनात्मक सुधार आवश्यक हैं, ताकि संकुचित एवं तीव्र गति वाले युद्धक्षेत्र में विश्वसनीय प्रतिरोधक क्षमता सुनिश्चित की जा सके।